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यक़ीन नहीं आ रहा था...

धमाकों की शिकार एक बस
उस दिन मैं सुबह छह बजे ही ऑफ़िस आ चुका था.

साढ़े नौ बजे समाचार एजेंसियों पर देखा कि भूमिगत रेल में कुछ परेशानी हुई है और कुछ सेवाएँ रद्द की जा रही हैं.

फिर धीरे-धीरे जब बस में हुए विस्फोट की जानकारी और तस्वीरें आनी शुरू हुईं तब भी ये विश्वास करना मुश्किल हो रहा था कि ये बम हमला हो सकता है.

उसके बाद तो दिल्ली और लंदन ऑफ़िस के सहयोगियों के फ़ोन आने शुरू हुए, वे सभी सहयोगियों की कुशलक्षेम पूछ रहे थे.

दूसरी तरफ़ भारत के समाचार चैनलों के फ़ोन आ रहे थे ताज़ा जानकारी पाने के लिए.

एक अन्य सहयोगी अपूर्व कृष्ण उसी समय ऑफ़िस पहुँचे मगर चूँकि ज़्यादातर लोग रास्ते में ही रुके हुए थे और वे कब तक पहुँचेंगे इसका उन लोगों को कोई अंदाज़ा भी नहीं था.

इसलिए कार्यक्रम कैसे प्रसारित होगा इसकी भी चिंता थी.

धीरे-धीरे लोग आने शुरू हुए और कार्यक्रम प्रसारित हुआ.

शाम होते-होते शहर सामान्य होने की ओर रफ़्तार पकड़ चुका था, हालाँकि यातायात पूरी तरह बहाल नहीं होने के कारण हम घर देर से ही जा सके.

मगर जाते समय भी हम देख पा रहे थे कि हमले के बावजूद लोग धैर्य बनाए हुए थे और तत्पर एक दूसरे की मदद करने को.

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