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बुधवार, 14 सितंबर, 2005 को 23:51 GMT तक के समाचार
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चुनौतियों भरा है संयुक्त राष्ट्र का कल

फ़लूज़ा में अमरीकी सैनिक
संयुक्त राष्ट्र के सामने स्वायत्तता बचाए रखना और सदस्यों को संगठन के प्रति प्रतिबद्ध बनाना है
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में उद्देश्यों की घोषणा करते वक्त शुरु में ही यह बात साफ़ कर दी गई है कि मानव जाति को युद्ध की विभीषिका से मुक्ति दिलाना पहला लक्ष्य है.

जाहिर है कि युद्ध को जन्म देनेवाली और शांति को नष्ट करनेवाली परिस्थितियों को असंभव बनाना इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रयास है.

स्थापना के वक्त द्वितीय महायुद्ध की यादें ताज़ा थीं और उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष विश्व भर में व्याप्त था.

इन हालातों में शांति को संकटग्रस्त बनानेवाले कारण साफ़ पहचाने जा सकते थे.

पर कुछ ही दिनों में वह स्थिति बदलने लगी और शीत-युद्ध के दौर में लोगों के दिल और दिमाग़ को अपनी विचारधारा के पक्ष में जीतने की चुनौती बलवान बनी.

यह बात समझी जाने लगी कि यदि आर्थिक विकास की गति धीमी रही तो सामाजिक असंतोष और आक्रोश निरंतर बढ़ेंगे और हिंसक अराजकता और राजनीतिक उथल-पुथल शांति को जोखिम में डाल देंगे.

20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में संयुक्त राष्ट्र संगठन जिन चुनौतियों से जूझता रहा था, वह इन्हीं मुद्दों से जुड़ी थीं.

सुरक्षा परिषद सामूहिक सुरक्षा और शांति को अछूत रखने में व्यस्त थी तो विशेषज्ञ विभाग विकास की दिशा और गति को मनोनुकूल ढंग से प्रभावित करने में जुटे रहे.

लाभ-लागत की पड़ताल हम चाहे जैसे भी करें, इस बात को अस्वीकार करना कठिन है कि अंतरराष्ट्रीय रंगमंच पर राजनयिक एजेंडे को तय करने का काम संयुक्त राष्ट्र के संदर्भ में ही कमोवेश किया जाता रहा.

राष्ट्रहितों का टकराव दूर करने की कोशिश और सामुदायिक-सामूहिक हितों का एहसास करना भी इससे संभव हुआ.

नींव खोखली हो गई?

आज अतीत की उपलब्धियों से संतुष्ट होकर बैठे रहने से काम नहीं चल सकता.

कोफ़ी अन्नान, महासचिव-संयुक्त राष्ट्र.
अन्नान और कई देशों के विरोध के बावजूद अमरीका ने इराक़ पर अपना शक्ति-प्रदर्शन किया

जो चुनौतियाँ सामने मुँह बाए खड़ी हैं या तेज़ी से उभर रही हैं, वह काफ़ी जटिल हैं और नए किस्म की भी.

सबसे बड़ी बात यह है कि संप्रभु राज्यों की समानता और उनके प्रभुता क्षेत्र में किसी दूसरे के हस्तक्षेप के निषेध की अंतरराष्ट्रीय कानून सम्मत मान्यता का तेज़ी से क्षय हो रहा है.

कुछ विद्वानों की मान्यता है कि जिस अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था पर इस संस्था की नींव टिकी थी, वह खोखली हो चुकी है.

संस्था के चार्टर में स्पष्ट शब्दों में बल-प्रयोग का निषेध किया गया है.

इसके सिर्फ़ दो अपवाद स्वीकार किए गए हैं. आत्मरक्षा के लिए आक्रमण के विरुद्ध बल-प्रयोग और सामुहिक सुरक्षा अभियान के तहत सुरक्षा परिषद की सहमति के बाद.

हमले से पहले ही प्रहार

यदि हाल का अनुभव ध्यान में रखें तो यह बात छिपी नहीं रह सकती कि यह आदर्श अब शेष नहीं रह सकता.

इराक़ के मामले में सुरक्षा परिषद से अनुमति के अभाव में अमरीका को अपनी इच्छानुसार सैनिक हस्तक्षेप से नहीं रोका जा सका.

अमरीकी युद्धविमान
पिछले कुछ वर्षों में प्रतिबद्धताओं को प्रभावशाली स्थायी सदस्य देशों ने ध्वस्त किया है

कहने को तो यह हस्तक्षेप बहुराष्ट्रीय था पर यह दिखानेभर को ही अंतरराष्ट्रीय था.

राष्ट्रपति बुश ने इसी प्रकरण में यह बात भी बिना लाग-लपेट के कही कि जहाँ तक अमरीकी राष्ट्रहित का प्रश्न है, वह इसकी रक्षा के लिए कागज़ के किसी टुकड़े का इंतज़ार नहीं कर सकता. चाहे उसे भेजनेवाला संयुक्त राष्ट्र ही क्यों न हो.

उन्होंने आतंकवादी ख़तरे के संदर्भ में बचाव के लिए हमलावर पर 'हमले से पहले ही प्रहार' वाली रणनीति का प्रतिपादन किया है.

इसके बाद चार्टर की आत्मरक्षात्मक बल प्रयोग या सुरक्षापरिषद सम्मत सामुहिक बल प्रयोग की परिभाषा बुरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है.

मानवाधिकारों का मसला

दूसरी बात मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले में एकतरफ़ा हस्तक्षेप की है.

किसी भी राज्य में वंशनाशी नरसंहार या ऐसे ही किसी अन्य जघन्य अपराध के ख़ात्मे के बहाने कोई भी बलवान राज्य अपेक्षाकृत दुर्बल राज्य पर प्रहार कर सकता है.

यह सच है कि मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र का मंच बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है पर इस संस्था में चलनेवाले शक्ति संघर्ष की रस्साकसी से यह विषय भी अछूता नही रहा है.

नई सहस्राब्दी की चुनौतियों से जूझने के लिए यंसुक्त राष्ट्र ने एक नए कामकाज का मसौदा तैयार करने की कोशिश की थी.

मानवाधिकार आयोग का गठन उसी का अभिन्न हिस्सा था.

विडंबना यह है कि आज 53 सदस्यी इस आयोग के सदस्य चीन और क्यूबा जैसे देश भी हैं जिन्हें अमरीका और अन्य पश्चिमी राज्य मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए बड़े पैमाने पर ज़िम्मेदार समझते हैं.

ऐसा लगता है कि इस आयोग की सदस्यता सिर्फ़ अपने बचाव के लिए और विपक्षियों को संकोच में डालने के लिए रह गई हैं.

ग़लत मंसूबे

ताकतवर सदस्यों का प्रयत्न यह है कि इस विषय को भी सुरक्षा परिषद की निगरानी में सौंप दिया जाए ताकि आमसभा की चौकसी औऱ चौकीदारी के कारण उन्हें किसी अटपटी स्थिति का सामना न करना पड़े.

बड़ी कठिनाई से आतंकवाद की परिभाषा पर एक सहमति वर्षों की मेहनत के बाद सामने आई है पर अभी भी अनेक अफ़्रीकी-एशियाई देशों का मानना है कि अपनी भूमि पर विदेशी हमलावरों के विरुद्ध अपनी आज़ादी और आत्मनिर्णय के लिए हथियार उठानेवालों को आतंकवाद के दायरे से बाहर रखना चाहिए.

यह गुत्थी भी कम उलझी नहीं है कि यदि देश का कोई स्वदेशी तानाशाह भी बर्बर और मानवाधिकारों का निर्मम उल्लंघन करनेवाला हो तो उसके विरुद्ध हिंसा का प्रयोग किस हद तक आतंकवाद समझा जा सकता है?

जहाँ तक मासूम नागरिकों के हताहत होनेवाली कसौटी है, इसका प्रयोग सगभग असंभव हो चुका है क्योंकि आतंकवादियों का मुकाबला करने के लिए राज्य द्वारा बल प्रयोग में भी निहत्थे नागरिक बड़ी तादाद में हताहत होते हैं.

जिसकी लाठी, उसकी भैंस

अंत में घुमाफिराकर बात वहीं पहुँचती है कि जो पैसा फेंकता है, वही मनचाहा तमाशा देखता और दिखाता है.

आज अमरीका के हाथ में ही उस तिजोरी की चाबी है जो इस संस्था के हर्जे-ख़र्चे की भरपाई करती है इसीलिए अमरीकी राजदूत बॉल्टन के तेवर मालिक के भेजे सूबेदार जैसे नज़र आते हैं.

इसके फ़रमानों को महासचिव अनसुना नहीं कर सकते. यही सबसे बड़ी चुनौती है इस घड़ी अपनी स्वायत्तता और स्वाभिमान बचाए रखने की.

स्वाधीन संयुक्त राष्ट्र की सामुहिक हितों की रक्षा करते हुए शांति को बरकरार रख सकता है.

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