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क्यों नाकाम हुई जी-4 देशों की कोशिशें?

जी-4 देशों के नेता
यदि अफ़्रीकी यूनियन का समर्थन मिलता तो स्थायी सदस्यता पाने का रास्ता आसान होता
भारत, ब्राज़ील, जापान और जर्मनी की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों के तौर पर दाख़िल होने की कोशिश को नाकाम कर दिया गया है. इन देशों का गुट जी-4 कई महीनों से इस कोशिश में जुटा हुआ था.

अमरीका और चीन ने 'कॉफ़ी क्लब' के नाम से जाने जाते दूसरे गुट के साथ मिलकर ये सुनिश्चित कर दिया है जी-4 देशों की पहल रास्ते में ही रोक दी जाए.

'कॉफ़ी क्लब' सर्वसम्मति से फ़ैसला लिए जाने के लिए एकता बनाने की बात कर रहा था जबकि जी-4 देश दाख़िले के लिए प्रस्ताव पर मतदान के पक्ष में थे.

संयुक्त राष्ट्र के हाल के इतिहास में सुरक्षा परिषद में प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए ये सबसे गंभीर प्रयास था.

इसके तहत छह स्थायी और चार ग़ैर-स्थायी सदस्यों को सुरक्षा परिषद में शामिल करने का लक्ष्य था.

महत्वपूर्ण है कि अमरीका-ब्रिटेन के संयुक्त राष्ट्र की मत के बिना इराक़ पर युद्ध करने के फ़ैसले से सुरक्षा परिषद का प्रभाव पर असर पड़ा है.

व्यवहारिक गठबंधन

जी-4 एक व्यवहारिक गठबंधन था और अपने आप में अनूठा भी था क्योंकि इसमें दो विकासशील देश और दो विकसित देश अपने बल पर सुरक्षा परिषद में दाख़िल होने की कोशिश कर रहे थे.

 एक ओर तो अलजीरिया और जिम्बाब्वे जैसे देशों का अपना एजेंडा था कि अफ़्रीका को सुरक्षा परिषद में दो स्थान न मिलें और दूसरी ओर अमरीका और चीन ने जी-4 के प्रस्ताव के ख़िलाफ़ अभियान चलाया
भारतीय कूटनीति के वरिष्ठ विश्लेषक

उन्हें ये भी विश्वास था कि वे 53 सदस्यों की अफ़्रीकन यूनियन के साथ तालमेल बिठा पाएँगे क्योंकि 191 सदस्यों वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा में जी-4 देशों को अपना प्रस्ताव पारित करवाने के लिए दो तिहाई बहुमत चाहिए था, इसलिए अफ़्रीकन यूनियन का समर्थन अत्यावश्यक था.

इसके बिना जी-4 की कोशिशों के कामयाब होने की थोड़ी बहुत ही या फिर कोई भी उम्मीद नहीं थी.

एक ओर तो अलजीरिया और जिम्बाब्वे जैसे देशों का अपना एजेंडा था कि अफ़्रीका को सुरक्षा परिषद में दो स्थान न मिलें और दूसरी ओर अमरीका और चीन ने जी-4 के प्रस्ताव के ख़िलाफ़ अभियान चलाया.

चीन ने तो सार्वजनिक तौर पर जापान और अफ़्रीकी देशों के ख़िलाफ़ रुख अपनाया और अमरीका ने पर्दे के पीछे रहकर जी-4 के ख़िलाफ़ काम किया.

उसने बार-बार ज़ोर देकर कहा कि सुरक्षा परिषद के विस्तार में सर्वसम्मति से ही चलना एकमात्र रास्ता है.

अफ़्रीकन यूनियन ने अद्दीस अब्बाबा में अगस्त में अपनी विशेष शिखर बैठक में जी-4 देशों के साथ समझौता करने से इनकार कर दिया.

उनका कहना था कि जब भी, और जैसे भी अफ़्रीकन यूनियन सुरक्षा परिषद की सदस्यता पाती है, उसके पास वीटो का अधिकार अवश्य होना चाहिए.

कोइज़ुमी और मनमोहन सिंह
जापान और भारत के अलावा जी-4 में जर्मनी और ब्राज़ील भी शामिल हैं

उनका ये भी कहना था कि इसके अतिरिक्त अफ़्रीकन यूनियन को एक ग़ैर-स्थायी सदस्य की सीट भी मिलनी चाहिए.

नीयत का सवाल

ये स्पष्ट है कि आज की दुनिया में, सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य अमरीका, चीन, रूस, फ़्रांस और ब्रिटेन नहीं चाहते कि सुरक्षा परिषद के नए सदस्यों के पास वीटो का अधिकार हो.

अफ़्रीकन यूनियन ने वीटो पर जो रुख़ अपनाया उससे जी-4 और उसकी इस मुद्दे पर संयुक्त पहल असंभव हो गई.

अफ़्रीकन यूनियन की शिखर वार्ता के बाद, संयुक्त राष्ट्र में चीन के राजदूत वैंग गुआँग ने कहा, "मुझे लगता है कि ख़बर अच्छी है. अफ़्रीकी देश अपनी एकता बनाए रखना चाहते हैं और इसीलिए मैं मानता हूँ कि जी-4 का कोई भविष्य नहीं है."

नाइजीरिया और दक्षिण अफ़्रीका ने ख़ुद को अफ़्रीका से प्रतिनिधि बताया और बाक़ी के प्रमुख अफ़्रीकी देशों ने पूरी तरह चीन और अमरीका के साथ काम करते हुए ये सुनिश्चित किया कि जी-4 के साथ समझौते की कोई उम्मीद न बचे.

सुरक्षा परिषद में अफ़्रीका का अख़िरकार प्रतिनिधित्व कौन करेगा इस मुद्दे पर मतभेद रहे.

ये तो स्पष्ट है कि जी-4 को भारी धक्का लगा है लेकिन अफ़्रीका का भी नुकसान हुआ है.

इस तरह सुरक्षा परिषद में प्रतिनिधित्व न रखने वाले दुनिया के केवल एकमात्र महाद्वीप, अफ़्रीका ने शायद वहाँ दाख़िला पाने का सबसे बड़ा मौका गँवा दिया है.

यदि जी-4 और अफ़्रीकन यूनियन का गठबंधन बनता तो संभव है कि समझौते के रूप में लाए जाने वाला प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र महासभा में पारित हो जाता.

पिछले साल संयुक्त राष्ट्र में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
भारत को इस बार फ़्रांस सहित 30 देशों का समर्थन हासिल था

प्रकिया तो ये है कि प्रस्ताव महासभा में पारित होने के बाद भी सुरक्षा परिषद के पाँचों स्थायी सदस्यों सहित संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों में से दो-तिहाई देशों को पारित करना होता है.

अमरीकी रुख़

जी-4 देशों का अनुमान था कि अमरीका और चीन जैसे देशों को संयुक्त राष्ट्र के दो-तिहाई देशों को 'ना' कहने में कठिनाई होगी.

कुछ समय से जी-4 देश दक्षिण अफ़्रीका और नाइजीरिया से बातचीत कर रहे थे ताकि जी-4 को जी-6 बनाया जा सके लेकिन उन देशों ने सैद्धांतिक फ़ैसला किया कि अफ़्रीकन यूनियन के इस बारे में विचार बनाने से पहले वे जी-6 नहीं बनाएँगे.

भारत ने जी-4 का सदस्य बनकर अपना कोई नुकसान नहीं किया. यदि जी-4 का प्रस्ताव पारित हो भी जाता तब भी अलग-अलग देश पर मतदान होना था.

इस सारी प्रक्रिया में भारत ने 30 देशों का समर्थन जुटाया था जिनमें फ़्रांस और कैरिबियाई देश भी थे.

महत्वपूर्ण है कि अनेक दबावों के बावजूद भारत, ब्राज़ील, जर्मनी और जापान ने एकजुटता दिखाई.

अमरीका ने सार्वजनिक तौर पर जापान को समर्थन दिया और ये भी कहा था कि भारत के लिए समर्थन जुटाया जा सकता है यदि वह जी-4 छोड़ दे लेकिन भारत जी-4 का सदस्य बने रहने पर कायम रहा.

अमरीका संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने एक वोट के आधार पर ये तो नहीं सुनिश्चित कर सकता कि सुरक्षा परिषद में कौन पहुँचेगा और कौन बाहर रहेगा लेकिन अमरीका ने एक बार फिर दिखा दिया है कि उसकी दिलचस्पी इसी में है कि अलग-अलग विचारों वाले विभिन्न देश सुरक्षा परिषद में शामिल न हों.

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