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संयुक्त राष्ट्र में भारत के 60 साल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संयुक्त राष्ट्र के जन्म की प्रक्रिया युद्ध के दौरान शुरु हुई ताकि आने वाली पीढ़ियों को युद्ध के अभिशाप से बचाया जा सके. अपने ब्रितानी शासकों के आदेश पर ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए भारत ने भी द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लिया और 20 लाख भारतीय इस युद्ध में लड़े. नतीजा ये हुआ कि भारत 1945 में संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य बना. उस समय भी भारत ने आर्थिक और सामाजिक असमानताओं पर ध्यान केंद्रित किया जो युद्ध का कारण बनती हैं. स्वतंत्र भारत को संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्यों और सिद्धांतों को स्वीकार करने में कोई परेशानी नहीं हुई और इन्हें बढ़ावा भी दिया. पिछले 60 वर्षों में भारत की कोशिश रही है कि संयुक्त राष्ट्र के दो मुख्य लक्ष्यों - शांति बनाए रखने और सभी देशों की आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए सहयोग को बढ़ावा देने में संतुलन बनाकर चला जाए. साठ साल, देशों और संगठनों के जीवन में बहुत लंबा समय नहीं होता. लेकिन कारगुज़ारी का आकलन ज़रूर हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र में भारत का क्या अनुभव रहा है? क्या भारत की उम्मीदें पूरी हुई हैं? क्या भारत इस संदर्भ में असंतुष्ट है? अग्रणी भूमिका आकलन कई क्षेत्रों का किया जा सकता है और 'स्कोर कार्ड' हर क्षेत्र का अलग है. प्रमुख क्षेत्र हैं रंगभेद और उपनिवेशवाद का ख़ात्मा, विकास, सामाजिक और आर्थिक मुद्दे, शांति बनाए रखना, विश्व स्तर पर सामने आ रहे संकट और भारत की अपनी सुरक्षा और संप्रभुता के सवाल. इसी के साथ एक प्रमुख क्षेत्र है संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसियों के काम में योगदान. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के पहले कुछ दशकों में भारत ने दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद और दुनिया में उपनिवेशवाद ख़त्म करने के मुद्दों पर अग्रणी भूमिका निभाई. दोनो ही काम एक पथप्रदर्शक के थे, दोनो ही विषयों ने दुनिया की आत्मा को झकझोर दिया. दोनो ही मुद्दों पर तीखे विरोध का सामना करना पड़ा लेकिन भारत और उसके सहयोगी देशों को अंत में सफलता मिली. वर्ष 1945 तक पृथ्वी का 72 प्रतिशत भाग और दुनिया की 60 प्रतिशत जनसंख्या उपनिवेशवाद की शिकार थी. जब उपनिवेशवाद के ख़ात्मे की प्रक्रिया पूरी हुई तो 100 से ज़्यादा देशों को आज़ादी मिली.
फिर क्या था, संयुक्त राष्ट्र में केवल गोरे लोगों का दबदबा न रहा और दुनिया की विविधता संयुक्त राष्ट्र में भी झलकने लगी. अफ़्रीका और एशिया के अनेक देश इस संदर्भ में भारत की भूमिका को मानते हैं. विकास के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र में जैसे-जैसे देशों की सदस्यता बढ़ी वैसे ही रंगभेद और नसलवाद का समर्थन करने वाली सरकारों के ख़िलाफ़ अभियान में भी तेज़ी आई. पहले रोडेशिया में और फिर दक्षिण अफ़्रीका में. गाँधी जी का दक्षिण अफ़्रीका का अनुभव और दक्षिण अफ़्रीका के स्वतंत्रता संग्राम में उनकी अहिंसा की नीति के अपनाए जाने से भारतीयों ने भावुकता से उस संघर्ष को समर्थन दिया. विकास के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में जब विकासशील देश महज़ ख़ानापूरी कर रहे थे तो भारत ने गुटनिरपेक्ष देशों के संगठन (नैम) और जी-77 के देशों के संगठन के माध्यम से इस बहस का नेतृत्व किया. लेकिन विकसित देशों के जी-8 संगठन की हाल की बैठक से लगता है कि अब भी काफ़ी काम होना बाक़ी है. इन सब मुद्दों पर भारत का विरोध तो हुआ लेकिन उसके विचारों का सम्मान हुआ और बहुत बार उसके विचार माने भी गए. दूनिया में शांति, रक्षा के काम में भारत के काम को काफ़ी सराहा गया. शांति रक्षक शीत-युद्ध के दौरान तो किसी भी गुट से न जुड़े होने के कारण भारत की शांति रक्षा की भूमिका में काफ़ी माँग थी ही, लेकिन 1990 के बाद भारत के सुरक्षाबलों की कुशलता को देखते हुए यह माँग और बढ़ी. कोरिया, वियतनाम, कंबोडिया, लाओस, ग़ज़ा, साइनाई, कॉंगो, सोमालिया, अंगोला और सियरा लेयोन में भारतीय सुरक्षाबलों ने शांति रक्षकों का काम किया. संयुक्त राष्ट्र चार्टर की प्रस्तावना में सर्वसम्मति से अपनाए गए लक्ष्यों के बावजूद ये संगठन गहन राजनीतिक गतिविधियों और सत्ता का केंद्र बना रहता है. इसीलिए इसके फ़ैसलों में देशों के अपने हितों, सत्ता को ध्यान में रखते हुए रिश्ते और समझौते झलकते हैं. निराशा हाथ लगी यही कारण है कि ये संगठन अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है. 1970 के दशक के अंत से जानबूझकर संयुक्त राष्ट्र की बहुपक्षीय प्रणाली को कमज़ोर बनाने की कोशिशें हो रही हैं. इनके कारण ही भारत को भी कई बार धक्का लगा है. इस संदर्भ में तीन उदाहरण दिए जा सकते हैं - वर्ष 1948 में जम्मू-कश्मीर समस्या, वर्ष 1971 का पूर्वी पाकिस्तान का संकट और आतंकवाद. जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में भारत ये मुद्दा शिकायतकर्ता के रूप में सुरक्षा परिषद में ले गया था. लेकिन उसने पाया कि वहाँ फ़ैसलो तो शीत-युद्ध के गणित को ध्यान में रखकर किए जा रहे हैं. वर्ष 1971 में दमन के स्पष्ट सबूतों और भारत में भागकर पहुँचे एक करोड़ शरणार्थियों बावजूद संयुक्त राष्ट्र ने कई महीने तक कोई कार्रवाई नहीं की अंतत: भारत के ख़िलाफ़ ही मतदान किया चाहे युद्ध की शुरुआत पाकिस्तान ने की थी. हाल के वर्षों में भारत में सीमपार से आतंकवाद के बारे में भी ऐसी ही उदासीनता का रवैया देखने को मिला. एक ताज़ा उदाहरण सुरक्षा परिषद के विस्तार से संबंधित बहस को बार-बार टालने का है जो भारत के लिए चिंता का विषय है. चाहे ये आम तौर पर माना जा रहा है कि सुरक्षा परिषद अपनी आज की शक्ल में सदस्यों का प्रतिनिधित्व नहीं करती और इसीलिए उसकी वह वैधता नहीं जो होनी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र का विकल्प नहीं इन सब मुश्किलों और निराशाओं के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि संयुक्त राष्ट्र अब भी सबसे सार्थक मंच है जहाँ सबसे भले के लिए सब देशों के कार्यों के बीच तालमेल बिठा कर चला जा सकता है. इसका कोई विकल्प भी नहीं है. संयुक्त राष्ट्र के बिन दुनिया अराजकता वाली ख़तरनाक जगह बन जाएगी. काफ़ी प्रयास हुए हैं कि एक व्यापक मानव सुरक्षा एजेंडा बनाया जाए और अब चुनौती ये है इसे लागू करने के लिए आत्मशक्ति हो. ऐसी किसी भी कोशिश के लिए समानता ही आधार होगा. संयुक्त राष्ट्र के कामकाज में विभिन्न अंगों और शांति व विकास के बीच का संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है. आने वाले वर्षों में भारतीय प्रयास होगा कि संयुक्त राष्ट्र के व्यापक सुधारों का समर्थन किया जाए ताकि वह बहुपक्षीय, लोकतांत्रिक और पारदर्शी संगठन बने. तब ही संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के लिए इसके चार्टर के लक्ष्य और सहस्राब्दी विकास लक्ष्य व्यवहारिक रूप ले पाएँगे. |
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