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स्थायी सदस्यता का इटली ने विरोध किया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संयुक्त राष्ट्र महासभा में सुरक्षा परिषद के संभावित सुधारों के मुद्दे पर गतिरोध तेज़ हो गया है. भारत, ब्राज़ील, जर्मनी, जापान और एक अफ़्रीकी देश ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता पाने के लिए एक संयुक्त अभियान छेड़ दिया है. जहाँ फ़्रांस सुरक्षा परिषद के विस्तार के पक्ष में है और उसने कहा है कि ब्रिटेन भी ऐसा ही चाहता है, वहीं इटली ने ऐसा किए जाने का विरोध किया है. इटली के प्रधानमंत्री फ़्रैंको फ़्रातीनी ने कहा है कि नए स्थायी सदस्य बनाए जाने से देशों में मतभेद बढ़ेंगे और संभावना है कि अरब देशों को इसमें जगह न मिले. इटली ने एक वैकल्पिक योजना के तहत आँशिक रूप से आठ स्थायी सदस्य बनाए जाने की बात कही है जो चार या पाँच साल सुरक्षा परिषद के सदस्य रहें.
जर्मनी के विदेश मंत्री जोश्का फ़िशर ने नए स्थायी सदस्य बनाए जाने का समर्थन करते हुए कहा था कि सुरक्षा परिषद को आधुनिक युग की वास्तविकता दर्शानी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र के महासचिव कोफ़ी अन्नान पहले से ही सुरक्षा परिषद के विस्तार के पक्ष में हैं ताकि वह अपना कामकाज बेहतर ढंग से कर सके. पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस विषय में आम सहमति अभी दूर की बात है. कोई भी परिवर्तन करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की महासभा के दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन ज़रूरी है और इन्हें पाँच स्थायी सदस्यों - अमरीका, ब्रिटेन, रूस, चीन और फ्रांस में से कोई भी वीटों कर सकता है. भारत स्थायी सदस्य बनने के लिए औपचारिक तौर पर दावेदारी पेश कर चुका है. भारत ने ब्राज़ील, जर्मनी और जापान के साथ मिलकर संयुक्त रूप से अपनी दावेदारी पेश की है. चारों देशों की ओर से जारी किए गए साझा बयान में कहा गया है,"सुरक्षा परिषद में 21वीं सदी में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सच्चाई झलकनी चाहिए". |
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