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भारत-अमरीका संबंध पर भारतीय लोगों की राय | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय मूल के लोगों में भारत-अमरीका संबंधों को लेकर उत्साह तो है लेकिन कुछ लोग यह भी मानते हैं कि दोनों देशों के बीच कुछ मुद्दे ऐसे हैं जो दोनों देशों के मधुर संबंधों में आड़े आते हैं. अमरीका में दस लाख से ज़्यादा भारतीय मूल के लोग रहते हैं, इनमें से ज़्यादातर लोग शिक्षित हैं और अच्छी नौकरियाँ करते हैं. एसोसिएशन ऑफ़ इंडियंस इन अमरीका नाम के संगठन के पूर्व अध्यक्ष पीयूष अग्रवाल कहते हैं, "देखिए अभी तो दोनों नेताओं को एक-दूसरे को समझना है, उसके बाद कूटनीति और दूसरे मुद्दों पर बातचीत करनी चाहिए." अमरीका में ही रहने वाले महात्मा गाँधी के पोते अरूण गाँधी दो मज़बूत जनतंत्रों के बीच अच्छे रिश्ते होने की कामना करने के साथ ही अमरीका को शक की नज़र से भी देखते हैं. वे कहते हैं, "अमरीका को अपना फायदा जहाँ दिखता है वहीं वो अपने रिश्ते ठीक करता है, भारत से शायद उसे उतना फायदा नहीं होता इसलिए उसके रिश्ते भारत से नरम-गरम होते रहते हैं." मुद्दे यहाँ भारतीय मूल के ऐसे लोग भी बड़ी तादाद में हैं जो ये कहते हैं कि अमरीका को भारत में सांप्रदायिकता फैलाने वाली पार्टियों के प्रति कड़ा रवैया अपनाना चाहिए. अमरीका में भारतीय मुसलमानों की एक संस्था से जुड़े शेख़ उबैद का कहना है कि बुश को भारत के अलग-अलग नेताओं में फ़र्क़ भी समझना चाहिए. उबैद कहते हैं, "बुश को ग़लतफ़हमी हो गई थी कि वाजपेयी और आडवाणी जैसे नेता और उनकी पार्टी से अमरीका को फायदा होगा, अब मनमोहन सिंह से मिलने के बाद शायद उन्हें एहसास हो जाए किस पार्टी के सरकार में रहने से फायदा होगा." इसके अलावा लोगों का ख़याल है कि कुछ मुद्दे अब भी सुलझ नहीं पाएँगे, जैसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का भारत का दावा. अमरीका ने अभी तक इस मुद्दे पर भारत का समर्थन नहीं किया है. पिछले 40 वर्षों से अमरीका में रह रहे शिकागो यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर भारतीय मूल के मोहम्मद नईम कहते हैं, "संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का दावेदार जापान भी है इसलिए अमरीका इस मामले में भारत से कोई वादा करने की स्थिति में नहीं है. बुश इस मामले पर चुप ही रहेंगे." कई सवाल भारत-अमरीका संबंधों के बीच हर बार पाकिस्तान ज़रूर आ जाता है, पाकिस्तान को ग़ैर-नैटो मित्र देश का दर्जा दिए जाने को लेकर भारतीय मूल के लोगों में मायूसी है. इसके अलावा, अमरीकी कंपनियों का भारत की ओर रूख़ करना यानी आउटसोर्सिंग अमरीका में रहने वाले भारतीयों के लिए सिरदर्द बन गया है, अब अमरीका में बेरोज़गारी के लिए भारत जैसे देशों को ज़िम्मेदार ठहराया जाने लगा है. इसके असर के बारे में जॉर्जिया यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्री राजीव धवन कहते हैं, "यहाँ आजकल आउटसोर्सिंग को लेकर अमरीकी लोग भारत से आने वाले लोगों से नाराज़ हैं, भारत के लोगों को काम करने के लिए वीज़ा मिलने में दिक्कत हो रही है. इससे व्यापारी यहाँ कम आएँगे और दोनों देशों के बीच व्यापार में कमी आएगी." अमरीका की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के दक्षिण एशियाई मामलों के प्रोफ़ेसर डी सरदेसाई कहते हैं कि दोनों देशों के संबंधों में काफ़ी सुधार आया है, "मैंने आज तक कभी भारत और अमरीका के बीच इतने अच्छे संबंध नहीं देखे जितने पिछले चार वर्षों में हुए हैं. अब काँग्रेस सरकार को इसे आगे बढ़ाना चाहिए." अब आतंकवाद के विरूद्ध जंग में और विज्ञान के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ रहा है और उम्मीद की जा रही है कि संबंध और बेहतर ही होंगे. |
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