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एफ़बीआई की नज़र दक्षिण एशियाई मुसलमानों पर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका में 'आतंकवाद' के ख़तरे के तहत अब दक्षिण एशियाई लोगों पर भी नज़र रखी जाने लगी है और अब भारतीय, पाकिस्तानी के साथ ही बांग्लादेशी लोग भी शक के दायरे में आ गए हैं. अमरीका की जाँच एजेंसी संघीय जाँच ब्यूरो, एफ़बीआई की नई चेतावनी के बाद ऐसे हालात पैदा हुए हैं. एफ़बीआई ने चेतावनी दी है कि अब अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी गुट अल-क़ायदा ग़ैर अरब लोगों को आतंकवादी गतिविधियों में शामिल करने की कोशिश कर रहा है. ये चेतावनी ऐसे समय में आई है जब अमरीकी आंतरिक सुरक्षा विभाग ने लोगों को बड़े आतंकवादी हमले होने की संभावना को देखते हुए सतर्क रहने को कहा है. अपनी साप्ताहिक रिपोर्ट में एफ़बीआई ने अमरीका भर में क़ानून लागू करने वाली क़रीब 18000 स्थानीय संस्थानों को इस बात से ख़बरदार किया है कि अब अल-क़ायदा संगठन अरब मूल के लोगों के अलावा ऐसे लोगों को शामिल करने पर ज़्यादा ध्यान दे सकता है जिनका संबंध दक्षिण एशिया या उत्तरी अफ़्रीका से है. इसके अलावा चेतावनी में ये भी कहा गया है कि अल-क़ायदा ग्रीन कार्ड धारकों या अमरीकी नागरिकता ले चुके लोगों को भी शामिल करने पर ज़ोर देगा. अमरीका में दक्षिण एशियाई मूल के क़रीब 20 लाख लोग रहते हैं. महिलाओं को लेने की कोशिश अल-क़ायदा संगठन को लगता कि एफ़बीआई का ज़्यादा ध्यान अरब मूल के लोगों पर है इसलिए अब दक्षिण एशियाई मूल के लोगों को साथ लेने की कोशिश हो रही है.
एफ़बीआई के अनुसार अल-क़ायदा अब पुरुषों के साथ ही महिलाओं को भी चरमपंथी बनाने की कोशिश कर रहा है. अमरीका में राष्ट्रपति पद के चुनाव नवंबर में होने हैं. इसके साथ ही डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी के बोस्टन और न्यूयॉर्क में होने वाले राजनीतिक सम्मेलन भी नज़दीक़ हैं. इसलिए सुरक्षा के बेहद कड़े इंतज़ाम किए गए हैं. एफ़बीआई ख़ासतौर पर दक्षिण एशियाई मूल के ऐसे लोगों पर ध्यान दे रही है जिन्होंने हाल में पाकिस्तान या अफ़ग़ानिस्तान की यात्रा की है. मगर इसके साथ ही अरब मूल के लोगों पर भी बराबर नज़र रखी जा रही है. इन सबके बाद लोगों में परेशानी साफ़ देखी जा सकती है. न्यूयॉर्क के एक इस्लामी केंद्र के अध्यक्ष मामून मरग़ूब पाकिस्तानी मूल के हैं और उनके अनुसार अब मुसलमानों पर किसी का यक़ीन नहीं रह गया है. मरग़ूब के अनुसार, "मुसलमान यहाँ अमरीका में समझता है कि उसे उसके मज़हब की वजह से डराया, धमकाया जा रहा है. मेरे घर पर एफ़बीआई के अधिकारी पाँच बार पूछताछ के लिए आ चुके हैं."
इसी सिलसिले में दक्षिण एशियाई मूल के मुसलमानों ने किताबें भी लिखी हैं जिसमें मुसलमानों की परेशानियों का ज़िक्र किया गया है. न्यूयॉर्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर महमूद ममदानी ने 'गुड मुस्लिम, बैड मुस्लिम' नाम से एक क़िताब लिखी है. वह अफ़्रीका में पैदा हुए हैं जहाँ उनका परिवार भारत से आकर बसा था. वह कहते हैं, "ये एक अजीब तरह का आकलन है कि जो बुश प्रशासन की नीतियों को माने वो अच्छा मुसलमान और जो ना माने वो ख़राब मुसलमान माना जाता है." एफ़बीआई की इस नई चेतावनी के नतीजे में होने वाली जाँच-पड़ताल के कारण दक्षिण एशियाई लोगों को अमरीका की रोज़ मर्रा की ज़िंदग़ी में अब और मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. |
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