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पुलिस की तलाशी से परेशान एशियाई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ग्यारह सितंबर को अमरीका में हुए हमलों के बाद से ब्रिटेन में बसे बहुत सारे एशियाई मूल के लोगों को लगता है कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है. ब्रिटेन में इंग्लैंड और वेल्स के सरकारी आँकड़े बताते हैं कि 'आतंकवाद विरोधी क़ानूनों' के तहत पुलिस के पूछताछ अभियान बढ़े हैं. इनके तहत एक साल पहले 744 लोगों की तुलना में 2002-2003 में 2989 एशियाइयों को रोका गया. गोरे लोगों की तुलना में काले लोगों से पूछताछ होने का अनुपात छह गुना ज़्यादा है. लोगों को रास्ते में रोककर पूछताछ के जो अधिकार पुलिस को दिए गए हैं उन्हें लेकर विवाद रहा है. सरकार का मानना है कि चरमपंथी हमलों की आशंका के कारण सभी समुदाय के लोगों से पूछताछ की घटनाएँ बढ़ी हैं. इस्लामी चरमपंथ धारणा ये है कि चरमपंथी हमलों का ख़तरा इस्लामिक चरमपंथियों से है, जिनमें से अधिकतर एशियाई देशों से आते हैं. पुलिस के प्रवक्ता ग्लेन स्मिथ का कहना है कि पूछताछ के लिए रोके जाने वाले एशियाइयों की संख्या में बढ़ोत्तरी अभी भी तुलनात्मक रुप से कम है. पहले एक दिन में जहाँ दो लोगों को रोका जाता था, वह संख्या अब बढ़कर आठ हो गई है. हालांकि मुस्लिम नेताओं का कहना है कि जिस समुदाय के लोगों को चरमपंथ से निपटने के लिए साथ लेना ज़रूरी है, ये कार्रवाई उन्ही लोगों को मुख्यधारा से दूर कर रही है. इन आंकड़ों के बाद सरकार ने एक कार्यदल बनाने की घोषणा की है, जिसमें स्थानीय समुदाय के लोग शामिल होंगे. ये कार्यदल पुलिस पर नज़र रखेगा और अगले साल अप्रैल से पुलिस को हर व्यक्ति को रोकने और उससे पूछताछ करने के कारणों का विवरण रखना होगा. |
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