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मंगलवार, 13 सितंबर, 2005 को 20:58 GMT तक के समाचार
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पुराने ढ़ाँचे को सुधारने में कई अड़चनें

कोफ़ी अन्नान
अन्नान वर्तमान ढ़ांचे में सुधार करना चाहते हैं पर अमरीकी रुख़ से ऐसा होता नहीं लगता
संयुक्त राष्ट्र के साठ वर्ष पूरे होने पर इस संगठन के ढाँचे में सुधारों की बात एजेंडे में सबसे ऊपर है. एक बात पर तो लगभग पूर्ण सहमति है कि 60 वर्ष पहले तय की गई व्यवस्था अब बासी हो चुकी है.

नए ज़माने की नई चुनौतियाँ हैं और इन चुनौतियों का सामने दूसरे विश्वयुद्ध के यथार्थ को सामने रखकर नहीं किया जा सकता.

संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि रह चुके हामिद अंसारी कहते हैं, "उस समय की दुनिया दूसरी थी, जो देश थे उनका वज़न और था. अब 60 साल बाद स्थिति बदल गई है. अब सुरक्षा परिषद में ऐसे देश भी हैं जो सुरक्षा परिषद के मामलों में संयुक्त राष्ट्र की मदद करने की क्षमता रखते हैं. क्योंकि जब फ़ौज भेजने की ज़रूरत पड़ती है तो सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों को अन्य देशों के पास ही जाना पड़ता है."

हालांकि अलग अलग देशों के लिए संयुक्त राष्ट्र में सुधारों का अलग-अलग मतलब है.

अफ़्रीक़ी देशों के अलावा भारत, जापान, जर्मनी और ब्राज़ील संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता चाहते हैं तो अमरीका संयुक्त राष्ट्र को अपने अनुरूप ढालना चाहता है.

 मैं तो यह नहीं कहूँगा कि भारत के प्रयास सफल हो ही जाएँगे. अभी ये भी मानने को तैयार नहीं हूँ कि प्रयास निर्रथक हैं. भारत का रुख़ ही सही लोकतांत्रिक रुख़ है. चीन, अमरीका जैसे देश जो सर्वसम्मति की बात करते हैं वो सुधार नहीं होने देना चाहते
पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे

सुधार के मुद्दे पर विवाद इतना बढ़ चुका है कि न्यूयॉर्क में होने वाली 60वीं महासभा में भी कोई सहमति बन पाना मुश्किल नज़र आ रहा है.

अमरीका ने पानी फेरा

महासचिव कोफ़ी अन्नान की ओर से रखे गए सुधार के प्रस्तावों पर अमरीका के राजदूत जॉन बॉल्टन ने लगभग पानी फेर दिया है.

उन्होंने महासभा सत्र शुरु होने से कुछ ही दिन पहले 39 पन्नों के दस्तावेज़ में 500 सुधारों की पेशकश की है. मतलब ये कि सुधारों पर बहस शुरू होने से पहले ही लगभग टल गई है.

इस बाबत संयुक्त राष्ट्र में अमरीका के राजदूत जॉन बॉल्टन कहते हैं, "एक सबसे बड़ी समस्या ये है कि सरकारें मुद्दों पर सहमत तो हो जाती हैं, लेकिन बाद में वो उन्हें नज़रअंदाज़ कर देती हैं. हम ऐसा नहीं चाहते. हम एक ऐसा दस्तावेज़ तैयार करना चाहते हैं जो महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाए और लोग उसे मानें."

कोशिशें अब भी जारी हैं लेकिन अमरीका के इस रवैये के बाद संयुक्त राष्ट्र में सुधारों की बात कहीं मझधार में ही अटकती नज़र आ रही है.

हामिद अंसारी कहते हैं, "अमरीका की राजनीति और नेताओं में एक राय ऐसी है कि संयुक्त राष्ट्र में केवल पैसा ख़र्च होता है और बर्बाद होता है. यदि संयुक्त राष्ट्र को ज़्यादा ताकत दी गई तो अमरीका पर ही हमले होंगे. जो अमरीकी सांसद बाहर की दुनिया के बारे में कुछ नहीं जानते वो ऐसे कहते हैं.

 एक सबसे बड़ी समस्या ये है कि सरकारें मुद्दों पर सहमत तो हो जाती हैं, लेकिन बाद में वो उन्हें नज़रअंदाज़ कर देती हैं. हम ऐसा नहीं चाहते.
जॉन बॉल्टन, अमरीकी राजदूत
संयुक्त राष्ट्र के प्रशासन में तो हमेशा अमरीका का असर रहा है प्रबंधन के उपमहासचिव जो ख़र्चे आदि को देखते हैं वो हमेशा ही अमरीकी रहे हैं."

इस पूरी रस्साकशी में शायद सबसे ज़्यादा नुक़सान भारत और जी-चार के दूसरे सदस्यों को हुआ है.

भारत की उम्मीदें ख़त्म?

सुरक्षा परिषद में इन देशों की दावेदारी को अफ़्रीकी देशों का समर्थन नहीं मिल रहा.

अफ़्रीक़ी संघ ने स्पष्ट कर दिया है कि वो वीटो के अधिकार की माँग भी करेंगे, जबकि अमरीका ये अधिकार देने को तैयार नहीं है.

तो क्या अब भी कोई उम्मीद की किरण बची है? भारत के पूर्व विदेशमंत्री यशवंत सिन्हा कहते हैं, "उम्मीद पर तो दुनिया क़ायम है. लगता है कुछ धक्का लगा है क्योंकि उम्मीद थी कि अफ़्रीकी देश हमारे साथ मिलकर संयुक्त प्रस्ताव रखेंगे वो उन्होंने माना नहीं. यदि दोनो गुटों के एक जैसे प्रस्ताव बनते हैं और जिन्हें जोड़ दिया जाता है और दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन मिल पाता है तो आशा की किरण है."

पर भारत के पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे मानते हैं कि अब शायद उम्मीद कम है.

वे कहते हैं, "मैं तो यह नहीं कहूँगा कि भारत के प्रयास सफल हो ही जाएँगे. अभी ये भी मानने को तैयार नहीं हूँ कि प्रयास निर्रथक हैं. भारत का रुख़ ही सही लोकतांत्रिक रुख़ है. चीन, अमरीका जैसे देश जो सर्वसम्मति की बात करते हैं वो सुधार नहीं होने देना चाहते."

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अपनी अमरीका यात्रा के दौरान स्वीकार किया कि इस दावेदारी पर उन्हें अमरीका से ज़्यादा उम्मीद नहीं.

मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश
मनमोहन सिंह को भारतीय दावे के लिए अमरीकी सहयोग की अपेक्षा कम ही है.

मनमोहन सिंह ने कहा था, “आपने संयुक्त बयान में ध्यान दिया होगा कि अमरीका इस बात को मानता है कि नई प्रणाली में आज की स्थितियों का ध्यान रखा जाना चाहिए और भारत की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए. पर साथ ही राष्ट्रपति बुश ने मुझे बताया कि अमरीका के लिए संयुक्त राष्ट्र में सुधार की दूसरी प्राथमिकताएँ हैं जिन्हें पहले पूरा किया जाना चाहिए.”

यही नहीं पाकिस्तान और इटली जैसे देशों ने भी भारत की दावेदारी का विरोध करने का फ़ैसला किया है. पाकिस्तान के पूर्व विदेशमंत्री सरताज अज़ीज़.

यदि भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिलती है तो ये नहीं है कि एशिया का हित सुरक्षित हो गया. क्योंकि एशिया में भी मतभेद हैं. यदि दो सीटें मिले तो उन पर भी बारी-बारी से स्थायी सदस्यता मिलनी चाहिए.
भारत के आने से संतुलन नहीं बनेगा. भारत का नज़रिया और हो सकता है इसीलिए इस मामले पर सर्वसम्मति नहीं बन पा रही."

अब सवाल ये है कि इतनी विपरीत परिस्थितियों में जी-चार के देश अपने प्रस्तावों पर महासभा में मतदान के लिए ज़ोर डालेंगे. क्योंकि मतदान के बाद ही ये बात आगे बढ़ सकती है.

संयुक्त राष्ट्र के पूर्व उप महासचिव चिन्मय गरेखान मानते हैं कि भारत की दावेदारी टल सकती है लेकिन हमेशा के लिए नहीं.

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