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संयुक्त राष्ट्र: शीत-युद्ध के दौरान, उसके बाद | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
16 सितंबर, 1945. जापान के आत्मसमर्पण के साथ ही दुनियाभर में लाखों लोगों की बलि लेने वाली दूसरी बड़ी लड़ाई ख़त्म हुई. युद्ध के दैत्याकार जबड़े से बच निकले लोगों के होठों पर बस यही प्रार्थना थी - 'युद्ध नहीं... हरगिज़ नहीं.' जापान, जर्मनी और इटली को हराकर विजयी मगर थके हुए राष्ट्र इस संकल्प के साथ एकजुट हुए कि फिर युद्ध नहीं होना चाहिए. ये विजयी राष्ट्र थे - अमरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, चीन और फ़्रांस. ये देश संयुक्त राष्ट्र की सबसे ताक़तवर इकाई सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बने. इस तरह 24 अक्तूबर 1945 को जन्म हुआ संयुक्त राष्ट्र का और पहले महासचिव बने त्रिग्वॉ हाल्वदान ली. त्रिग्वा ली ने पद सँभालने के लिए रवाना होने से पहले त्रिग्वा ली ने लंदन में जो कुछ कहा – ऐसा लगता है कि वो आज ही की स्थितियों के बारे में बोल रहे थे. उनका कहना था, “दुनिया के लोगों को गंभीर समस्याएँ परेशान कर रही हैं. नज़रिए का फ़र्क़ है, स्वार्थ अलग अलग हैं – जिन्हें हल किया जाना ज़रूरी है. लाखों लाख लोग भुखमरी और बीमारी के कगार पर हैं. शीत-युद्ध का तनाव युनाइटेड नेशंस या संयुक्त राष्ट्र शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले 1 जनवरी 1942 को अमरीका के राष्ट्रपति फ़्रेंकलिन डी. रूज़वेल्ट ने किया था. उन्होंने चाहे जो सोचकर ये जुमला कहा हो, आने वाले वर्षों में ये स्पष्ट हो गया कि शांति स्थापित करने के इच्छुक ये राष्ट्र सिर्फ़ शाब्दिक अर्थ में ही संयुक्त या एकजुट थे. सोवियत संघ और अमरीका के बीच का तनाव दो विचारधाराओं का तनाव था जिसने शीत-युद्ध की शक्ल में अगले चार दशकों तक पूरी दुनिया को डेढ़ टाँग पर खड़ा रहने को मजबूर कर दिया. शीत-युद्ध का तनाव इतना गहरा था कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में उसकी अनुगूँज जब-तब सुनाई पड़ती थी. संयुक्त राष्ट्र महासभा में सोवियत संघ के नेता निकिता ख्रुश्चेव का वो भाषण अब इतिहास का हिस्सा है जिसमें उन्होंने मेज़ पर मुक्के मार-मारकर कथित अमरीकी साम्राज्यवाद और औपनिवेशिक दासता पर कुठाराघात किया. इस ऐतिहासिक भाषण में निकिता ख्रुश्चेव ने कहा कि औपनिवेशिक दासता को उसकी क़ब्र में पहुँचाया ही जाना चाहिए. हम इस धरती पर आपकी या ईश्वर की कृपा से ज़िंदा नहीं है. हम इस धरती पर ज़िंदा हैं सोवियत जनता के संघर्ष के कारण. तमाम दूसरे देशों की संघर्षरत जनता के कारण.
सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य देशों के पास वीटो का अधिकार होता है. यानी अगर इनमें से एक भी सदस्य किसी प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वोट देता है तो वो प्रस्ताव गिर जाता है. एक दूसरे को पटख़नी देने के लिए सोवियत संघ और अमरीका वीटो के अधिकार का बार-बार इस्तेमाल करते थे. संयुक्त राष्ट्र के पूर्व उपमहासचिव चिन्मय गरेखान का कहना है, "उससे ये असर पड़ा कि सुरक्षा परिषद का काम बीच में ही रुक गया क्योंकि एक पक्ष प्रस्ताव लाता था और दूसरा पक्ष उसे वीटो कर देता था. संयुक्त राष्ट्र जिस मकसद से बना था वह पूरा नहीं हो पा रहा था. सुरक्षा परिषद में सदा तनाव बना रहता था." सोवियत संघ के चरमराकर ढहने तक हालात इतने ख़राब हो गए थे कि 1986 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव हावियार पेरेज़ जे क्वेयार को सुरक्षा परिषद से सभी पाँचों सदस्यों से आपस में सहयोग करने की अपील करनी पड़ी. सफलता-विफलता सोवियत संघ और अमरीका के बीच शीतयुद्ध के दौरान तो सुरक्षा परिषद की गाड़ी का पहिया जैसे कीचड़ में फँस गया था, लेकिन क्या शीतयुद्ध के बाद सुरक्षा परिषद अपनी सभी ज़िम्मेदारियाँ ठीक ढंग से निभा पाया है? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की असफलताओं की लिस्ट में सबसे ऊपर है नाम आता है रुवांदा का, जहाँ 1994 में दस लाख लोगों का क़त्लेआम हुआ.
संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व विशेष प्रतिनिधि हामिद अंसारी मानते हैं, "बिलकुल ठीक है कि सुरक्षा परिषद ने कई जगहों पर काम नहीं किया...रुवांदा के बारे में सुरक्षा परिषद बैठी रही, उसने कुछ नहीं किया. ये इसलिए क्योंकि जो बड़े-बड़े देश वहाँ बैठे थे वो तैयार नहीं थे कि वे अपनी फ़ौज भेजें और हालात ठीक करें." हामिद अंसारी कहते हैं, "इसीलिए ये जज़्बा गहराई से सामने आया है कि संयुक्त राष्ट्र के काम करने के तरीके में तबदीलियाँ आनी चाहिए. दरवाज़ा खोलने की ज़रूरत है. पूरी व्यवस्था पर नज़र डालकर परिवर्तन लाना होगा. " संयुक्त राष्ट्र के उपमहासचिव रह चुके चिन्मय गरेखान भी रुवांदा की घटना को सुरक्षा परिषद के लिए शर्मनाक मानते हैं. उनका कहना है, "संयुक्त राष्ट्र की असफलताएं बड़ी-बड़ी हैं.... रुवंडा का घटनाक्रम तो शर्मनाक था. मैं नहीं मानता कि ये केवल संयुक्त राष्ट्र की ही असफलता थी. बड़ी शक्तियाँ - सबसे बड़ी शक्ति (अमरीका) ने जो अड़चनें खड़ी कीं वे भी इसके लिए ज़िम्मेदार थीं. सोमालिया में आज तक शांति नहीं है. वहाँ संयुक्त राष्ट्र ने बहुत मेहनत की लेकिन सरकार नहीं बन पाई और 1991-92 से ये सिलसिला चल रहा है." पर ये भी सच है कि शीत-युद्ध की बर्फ़ पिघलते-पिघलते कई मुद्दों पर सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों में सहयोग बढ़ा. इराक़-ईरान युद्ध, नामीबिया की आज़ादी और कम्बोडिया में शांतिवार्ता में सुरक्षा परिषद के पंचों ने लगभग एकराय ज़ाहिर की. चिन्मय गरेखान का कहना है, "इराक़ खाड़ी युद्ध के दौरान पहली बार हुआ कि संयुक्त राष्ट्र में बिना वीटो के डर के सुरक्षा परिषद ने काम किया. यदि सोवियत संघ रहता तो इराक़ पर प्रतिबंध लगाना और फिर उन्हें इतने साल लागू रखना मुश्किल होता." गरेखान मानते हैं कि सुरक्षा परिषद की असफलताओं के शोर में उसकी सफलताओं को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. गरेखान कहते हैं, "सफलताएं तो काफ़ी मिली हैं लेकिन दुनिया को इसके बारे में ज़्यादा मालूम नहीं है. मोज़ाम्बीक़ में गृह युद्ध का माहौल था अब वह प्रगतिशील देश है. गौटेमाला, इक्वेडोर में सालों से गृह युद्ध चल रहा था, हज़ारों लोग मारे जा रहे थे लेकिन अब वहाँ शांति है. कंबोडिया में हिंसा के दौर के बाद संयुक्त राष्ट्र ने चुनाव करवाए और शांति स्थापित हुई." लेकिन सुरक्षा परिषद के देशों की आपसी सहमति बहुत संतुलित नहीं रही. सोवियत संघ के न रहने से अमरीका का वज़न अचानक इतना बढ़ गया कि बाक़ी सभी देश उसके सामने एकदम भारहीन पिंडों की तरह निर्वात में तिरते नज़र आते हैं. |
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