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मंगलवार, 13 सितंबर, 2005 को 22:33 GMT तक के समाचार
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ग़रीबी, विकास और संयुक्त राष्ट्र

अफ्रीका में कुपोषण का शिकार एक व्यक्ति
अमीर-ग़रीबों के बीच की खाई 10 साल पहले के मुक़ाबले और बढ़ी है
दुनिया के राष्ट्राध्यक्षों की न्यूयॉर्क में हो रही महापंचायत ऐसे समय हो रही है जब अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश 'आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध' में विजयी होना चाहते हैं.

लेकिन दुनिया के ग़रीब देश चाहते हैं कि विकास के प्रश्न को सबसे ऊपर रखा जाए ताकि भुखमरी, बेकारी और बीमारी जैसे मानवता के ज़हर को ख़त्म किया जा सके.

संयुक्त राष्ट्र की ही एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आज दुनिया के अमीर और ग़रीबों के बीच की खाई 10 साल पहले के मुक़ाबले और चौड़ी हो गई है.

आज दुनियाभर में भूख और कुपोषण के कारण हर साल 50 लाख बच्चे मर जाते हैं. लगभग 85 करोड़ जनता भूखी रहती है.

बढ़ती खाई

 सच तो यह है कि विश्व बाज़ार के विस्तार के साथ-साथ लोगों के बीच आय की असमानता बढ़ती जा रही है. शायद इसका एक कारण यह हो सकता है कि सामाजिक सुरक्षा का इंतज़ाम किए बिना बाज़ार के विस्तार पर ज़ोर दिया जा रहा है
संयुक्त राष्ट्र के उपमहासचिव
संयुक्त राष्ट्र में आर्थिक और सामाजिक मामलों के उप-महासचिव होसे एंतोनियो ओकाम्पो कहते हैं कि इसका कारण यह है कि कुछ लोग बहुत ज़्यादा कमाते हैं और कुछ की आमदनी बेहद कम है.

उन्होंने कहा, “सच तो यह है कि विश्व बाज़ार के विस्तार के साथ-साथ लोगों के बीच आय की असमानता बढ़ती जा रही है. शायद इसका एक कारण यह हो सकता है कि सामाजिक सुरक्षा का इंतज़ाम किए बिना बाज़ार के विस्तार पर ज़ोर दिया जा रहा है.”

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव कोफ़ी अन्नान ने इस साल की शुरुआत में एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें अगले 10 साल में ग़रीबी को 50 प्रतिशत घटाने के संकल्प लेने की बात थी.

इस रिपोर्ट में अमीर मुल्कों से गुज़ारिश की गई थी कि वो अपनी सालाना आय का 0.7 प्रतिशत ग़रीब मुल्कों को अनुदान में दें.

प्राथमिकता क्या है?

 आर्थिक क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को छीन लिया गया है और ये काम विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन को सौंप दिया गया है
पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे
आलोचक मानते हैं कि जहाँ पहले संयुक्त राष्ट्र आर्थिक नीतियों का नियामक बनता था, आज वो खुले बाज़ार की नीतियाँ लागू करवाने का औज़ार बनता जा रहा है.

सवाल ये है कि विश्व के ताक़तवर देशों के लिए ग़रीबी और विकास का मुद्दा ज़्यादा गंभीर है या आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध? क्या ग़रीबी और विकास के प्रश्न आज की इस दुनिया में संयुक्त राष्ट्र की प्राथमिकता बन सकते हैं?

भारत के पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे मानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र से आर्थिक मामलों की पहल जानबूझ कर छीन ली गई है.

पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे का मानना है, "आर्थिक क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को छीन लिया गया है और ये काम विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन को सौंप दिया गया है. जो इस संगठन का काम था विकास की नितियाँ कैसी हों, ऋण के बारे में सुझाव देने का, जो उसने निभाया 20-25 साल तक, वो भूमिका अब लगभग ख़त्म हो चुकी है."

संयुक्त राष्ट्र महासभा की 60वीं बैठक में अगड़े और पिछड़े मुल्कों के बीच अगर खींचतान हुई तो उसका केंद्र यही होगा- पहले विकास और ग़रीबी उन्मूलन या आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध.

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