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मंगलवार, 13 सितंबर, 2005 को 20:06 GMT तक के समाचार
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प्रभावी कौन? संयुक्त राष्ट्र या अमरीका

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद
अमरीका पर संयुक्त राष्ट्र को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे है
अफ़ग़ानिस्तान से तालेबान की सत्ता उखाड़ने के तुरंत बाद दुनिया के सबसे ताक़तवर देश अमरीका की निगाहें इराक़ की ओर घूमीं. लेकिन कुछ ही समय में ये स्पष्ट हो गया कि अमरीका और यूरोपीय देशों के बीच की खाई अतलांतिक महासागर से भी चौड़ी थी.

इराक़ पर वर्ष 2003 में हमला करने में अमरीका को संयुक्त राष्ट्र का समर्थन नहीं मिला. 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध' छेड़ने का ऐलान करने वाले राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की तिलमिलाहट कुछ इन शब्दों में ज़ाहिर हुई.

संयुक्त राष्ट्र पर सीधी चोट करते हुए उन्होंने कहा था, "सद्दाम हुसैन के बारे में संयुक्त राष्ट्र बिलकुल बेअसर रहा है. संयुक्त राष्ट्र के सामने सवाल यह है कि क्या आप लीग ऑफ़ नेशंस के रास्ते जाएँगे या आप शांति क़ायम करने के लिए एक प्रभावशाली संगठन साबित होंगे?"

राष्ट्रपति बुश का कहना था, "संयुक्त राष्ट्र और सद्दाम हुसैन को ख़ुद अपना भाग्य तय करना है. अगर संयुक्त राष्ट्र कार्रवाई नहीं करता और अगर सद्दाम हुसैन हथियार नहीं डालते तो अमरीका उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करेगा.”

संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार करके अमरीका और ब्रिटेन ने इराक़ पर हमला बोल दिया. इसी के साथ संयुक्त राष्ट्र और अमरीका के बीच तनाव का एक नया अध्याय शुरू हुआ.

गंभीर मतभेद

 सद्दाम हुसैन के बारे में संयुक्त राष्ट्र बिलकुल बेअसर रहा है. संयुक्त राष्ट्र के सामने सवाल यह है कि क्या आप लीग ऑफ़ नेशंस के रास्ते जाएँगे या आप शांति क़ायम करने के लिए एक प्रभावशाली संगठन साबित होंगे
राष्ट्रपति जॉर्ज बुश
फ़्रांस, जर्मनी, रूस और चीन के साथ-साथ कई अन्य देश इस हमले के ख़िलाफ़ एकजुट थे. फ़्रांस के राष्ट्रपति ज़्याक शिराक ने पूरे ज़ोर से अमरीका का विरोध किया.

शिराक ने कहा, “संयुक्त राष्ट्र अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुज़रा है. संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र और ताक़त के इस्तेमाल को लेकर बहस है. सुरक्षा परिषद की संस्तुति के बिना शुरू किए गए युद्ध से संयुक्त राष्ट्र में बहुपक्षीय प्रणाली को धक्का लगा है.”

सीधे तौर पर फ़्रांस के राष्ट्रपति ने अमरीका के रवैये पर हमला किया. उस समय स्थिति ये हो गई थी कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान तक का विश्वास डगमगा गया था.

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव कोफ़ी अन्नान ने इस बारे में कहा था, “घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है. अब तो मुझे इस बात पर भी भरोसा नहीं है कि सहस्राब्दि लक्ष्यों को लेकर आम सहमति है या नहीं.
जिन मुद्दों को हल करने के लिए ये संगठन बनाया गया था, अब उन्हें लेकर सदस्य देश पूरी तरह बँट चुके हैं.”

जिसकी लाठी उसकी भैंस?

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या संयुक्त राष्ट्र सिर्फ़ बहस-मुबाहिसे का अड्डा भर रह गया है और क्या वहाँ भी वही कहावत लागू होती है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस? भारत के पूर्व विदेशमंत्री यशवंत सिन्हा सहमत हैं.

कोफ़ी अन्नान, संयुक्त राष्ट्र महासचिव
कोफ़ी अन्नान: इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को हिलाकर रख दिया

यशवंत सिन्हा का कहना है, "एक सर्वशक्तिशाली देश है अमरीका और वो जो चाहे अपने मित्र देशों के साथ मिलकर कर सकता है. इसमें संयुक्त राष्ट्र को कहीं न कहीं पूरी तरह निर्रथक बनाने का प्रयास है."

विश्लेषक मानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार करके अमरीका की मुश्किलें बढ़ी ही हैं, कम नहीं हुईं.

जर्मनी में भारत के पूर्व राजदूत एके ग्रोवर मानते हैं, "अमरीका चला तो गया इराक़, लेकिन वहाँ क्या हालत हो रही है? अगर सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव होता तो अन्य देशों की फ़ौजें भी इराक़ में होती. अब अमरीका भी सोच रहा है कि हम कहाँ फँस गए हैं."

लेकिन संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि रह चुके हामिद अंसारी मानते हैं कि इस अंतरराष्ट्रीय पंचायत के निर्माण में अमरीका की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता.

हामिद अंसारी कहते हैं, "ये तनाव आज से नहीं काफ़ी पहले से हैं. मगर संयुक्त राष्ट्र बनाने में अमरीका का काफ़ी बड़ा हाथ था. चाहे अमरीका ने सदा कोशिश की है कि वह संयुक्त राष्ट्र को अपने ढंग से चलाए लेकिन संयुक्त राष्ट्र के ढाँचे में क्षमता है कि संयुक्त राष्ट्र के फ़ैसले लोकतांत्रिक तरीके से किए जा सकें. महासभा को यदि अधिकार दिया जाए कि सुरक्षा के मामले में वह अपनी राय सुरक्षा परिषद को दे तो दुनिया में तबदीली हो सकती है."

हाल ही में अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने तमाम विरोधों के बावजूद जॉन बॉल्टन को संयुक्त राष्ट्र में अमरीका का राजदूत नियुक्त कर दिया.

बॉल्टन को संयुक्त राष्ट्र की खिल्ली उड़ानेवाला माना जाता है. संयुक्त राष्ट्र की सहस्राब्दि सभा में उन्होंने अपने ये विचार छिपाए भी नहीं.

 संयुक्त राष्ट्र जिस काम के लिए बनाया गया था उसे जानबूझकर पूरी तरह बदल दिया गया है. पिछले 25 साल से योजनाबद्ध कोशिश हुई है, संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र में जो आधिकार और जो कार्यक्षेत्र निश्चित किए गए थे, उन्हें सुधार के नाम पर सीमित कर दिया गया है
पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे

बॉल्टन ने कहा, “ये भी संयुक्त राष्ट्र में कथित आम बहस की परंपरागत शुरुआत है. 1995 में पचास साल मनाए गए लेकिन उसमें भी ऐसा कुछ ख़ास नतीजा नहीं निकला- यानी बड़ी-बड़ी बातें बहुत होती हैं... ठोस काम कम होता है.”

भारत के पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे संयुक्त राष्ट्र में अमरीका के प्रभाव के प्रबल विरोधी हैं. उनका कहना है कि सुधार की सब बातें संयुक्त राष्ट्र को कमज़ोर करने के लिए की जा रही हैं.

पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे कहते हैं, "संयुक्त राष्ट्र जिस काम के लिए बनाया गया था उसे जानबूझकर पूरी तरह बदल दिया गया है. पिछले 25 साल से योजनाबद्ध कोशिश हुई है, संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र में जो आधिकार और जो कार्यक्षेत्र निश्चित किए गए थे, उन्हें सुधार के नाम पर सीमित कर दिया गया है."

इस श्रंखला की अगली कड़ी में बात करेंगे कि संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तावित सुधारों की.

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