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संयुक्त राष्ट्र और अमरीका के संबंध
कॉलिन पॉवेल
पूर्व अमरीकी विदेश मंत्री कॉलिन पॉवेल ने इराक़ पर हमले के लिए ज़ोरदार केस पेश किया था
साठ वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र संघ घोषणा पत्र की पुष्टि करने वाले पहले कुछ देशों में अमरीका का नाम भी था. इन दोनों के रिश्तों में आए तनाव का बीबीसी ने विश्लेषण किया है.

यह सोचना विचित्र ही होगा कि उस देश को संयुक्त राष्ट्र संघ का विरोधी कहा जा रहा है जिस देश का नाम इस अंतरराष्ट्रीय संस्था की नींव रखने वालों में शामिल रहा हो.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीकी राष्ट्रपति रूज़वेल्ट ने ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ नाम रखा था, जब 26 देशों ने शक्तियों के ध्रुवीकरण के विरुद्ध लगातार एकजुट हो कर लड़ने की शपथ ली थी.

1945 में पचास देशों के प्रतिनिधि संयुक्त राष्ट्र संघ घोषणा-पत्र बनाने के लिए सैन फ़्रॉसिस्कों में इकट्ठा हुए थे. संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय न्यूयार्क में होना चाहिए, यह माँग इस योजना के प्रति अमरीका की कटिबद्धता और उसकी प्रमुख सदस्य बनने की इच्छा को दर्शाता था. लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति अमरीका का स्नेह धीरे-धीरे कम हो रहा है और इराक़ युद्ध से पहले तो यह ढहने के कगार तक पहुँच गया था.

इराक़ युद्ध पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अमरीका का समर्थन न करने से राष्ट्रपति बुश की नाराज़गी स्पष्ट रूप से झलकती थी. इराक़ में तेल के बदले अनाज कार्यक्रम की वित्तीय असफलता और डीआर कांगो में संयुक्त राष्ट्र संघ शांतिसेना के घोटाले ने अमरीकी प्रशासन और जनता में संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति विश्वास को और कम कर दिया है.

अमरीकी कांग्रेस ने भी इराक़ में तेल के बदले अनाज कार्यक्रम को केंद्रित कर संयुक्त राष्ट्र संघ प्रशासन के विरुद्ध कई तरह की पड़ताल शुरू कर दी हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ को अमरीका की ओर से दी जाने वाली वित्तीय सहायता को भी कम करने के प्रयास किए गए हैं.

बुश
बुश ने इराक़ पर कहा कि क्या संयुक्त राष्ट्र लीग ऑफ़ नेशंस की तरह निर्रथक बनना चाहता है

अमरीका प्रतिवर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ के बजट में 3 अरब डॉलर का योगदान करता है जो किसी भी देश से सबसे अधिक है. अब प्रश्न यह उठता है कि क्या अमरीका को इतनी बड़ी रक़म खर्च करने का उचित प्रतिफल मिल रहा है.

इन सब आलोचनाओं के बावजूद अमरीका का कहना है कि वो संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति प्रतिबद्ध है.

इराक़

इराक़ युद्ध के बाद कुछ अर्थों में इसे इस बात की स्वीकारोक्ति भी समझा जा सकता है कि अमरीका अकेले ही सब कुछ नहीं कर सकता. उसे नई चुनौतियों का सामना करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिल कर चलना पड़ेगा. भारी विनाश के हथियारों की चुनौती का सामना करने और स्वतंत्रता व प्रजातंत्र के संदेश को फैलाने के लिए उसे मिल कर काम करना होगा.

राष्ट्रपति बुश कुछ रिपब्लिकन सदस्यों की ओर से कोफ़ी अन्नान को हटाने के दबाव के आगे नहीं झुके हैं. डेमोक्रेट सांसद जॉर्ज मिशेल और रिपब्लिकन सांसद न्यूट गिंगरिच की अध्यक्षता वाले एक संयुक्त कार्यदल ने हाल ही मे यह कहा कि यदि संयुक्त राष्ट्र संघ को अपनी इन मुसीबतों से छुटकारा पाना है तो अमरीकी नेताओं को इसमें ज़रूरी परिवर्तन करने ही होंगे.

उधर उपमंत्री निकोलस बर्न्स ने अन्य मुद्दों की तुलना में संयुक्त राष्ट्र संघ सुधारों के मुद्दे पर अपना सबसे अधिक समय व्यतीत किया है. उन्होंने कुछ प्राथमिकताओं की सूची बनाई है जिसमें बजट और प्रबंधकीय सुधार, प्रभावी मानवाधिकार प्रक्रिया, शांति स्थापना के लिए आयोग और एक जनतंत्र कोष बनाने की बात कही गई है. अमरीकी प्रशासन संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद के पुर्नगठन के मामले को इन सबके बाद रखता है.

प्रशासन का मानना है कि सुरक्षा परिषद के विस्तार के प्रस्ताव पर इस समय मतदान नहीं होना चाहिए और उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि वो जापान, जर्मनी, भारत और ब्राज़ील द्वारा बनाए गए जी-4 गुट द्वारा सुरक्षा परिषद में सदस्यता हासिल करने के प्रयासों के ख़िलाफ़ वोट देगा.

हैरिटेज फ़ॉउंडेशन के नाइल गार्डिनर का कहना है कि राष्ट्रपति बुश द्वारा जॉन बोल्टन को संयुक्त राष्ट्र संघ का राजदूत नियुक्त किया जाना यह संकेत है कि अमरीका संयुक्त राष्ट्र संघ को चुस्त दुरुस्त करने को प्राथमिकता देता है. जॉन बोल्टन अमरीकी सीनेट से महत्वपूर्ण समर्थन पाने में असफल रहे तो राष्ट्रपति बुश ने अभूतपूर्व क़दम उठाते हुए ग्रीष्मावकाश में उनके नामांकन को पारित करवा लिया.

इस पर डैमोक्रेट और कुछ रिपब्लिकन सदस्यों ने खुले तौर पर सवाल खड़े किए कि किसी ऐसे व्यक्ति को राजदूत नियुक्त करने का फ़ैसला कहाँ तक उचित है जो पहले से ही संयुक्त राष्ट्र संघ का आलोचक रहा है.

बोल्टन ने एक बार कहा था, “संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी कोई चीज़ नहीं है” लेकिन अब उनका कहना है कि वो इस संस्था के भविष्य को ले कर प्रतिबद्ध हैं. लेकिन ब्रूकिंग्स संस्था के वरिष्ठ सदस्य इवो डालदेर का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र संघ मे सुधार ज़रुरी हैं इसके लिए साथ मिल कर काम करने की आवश्यकता होगी और यह प्रश्न अब भी मुँह बाएँ खड़ा है कि क्या जॉन बोल्टन इस काम के लिए सही व्यक्ति हैं.

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