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यूरोपीय संविधान पर चिंताएँ और ढांढस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
फ्रांस और नीदरलैंड में हुए जनमतसंग्रहों में यूरोपीय संविधान को नामंज़ूर किए जाने के बाद इस मुद्दे पर चिंता बढ़ने लगी है और जर्मनी और फ्रांस के नेताओं ने कहा है कि यूरोप के भविष्य पर चर्चा के लिए बर्लिन में शनिवार को अहम बैठक होगी. उधर यूरोपीय संघ के मौजूदा अध्यक्ष लक्ज़मबर्ग के विदेश मंत्री जीं एसलबोर्न ने यूरोपीय नेताओं से अनुरोध किया है कि वे यूरोपीय संविधान पर फ्रांस और नीदरलैंड के नतीजों से घबराएँ नहीं और संयम से काम लें. एसलबोर्न ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि यूरोपीय संघ को लोगों की राय पर आवश्यक रूप से ध्यान देना चाहिए और अन्य देशों में भी यूरोपीय संविधान पर रायशुमारी का क्रम जारी रहना चाहिए. फ्रांस ने और नीदरलैंड ने इसी सप्ताह जनमतसंग्रह कराए थे जिनमें बहुमत में लोगों ने प्रस्तावित यूरोपीय संविधान को नामंज़ूर कर दिया. यूरोप भर में अब यह चर्चा ज़ोर पकड़ रही है कि क्या यूरोपीयसंविधान को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाना चाहिए. ब्रसेल्स में बीबीसी संवाददाता विलियम होर्सली का कहना है कि बर्लिन में शनिवार को होने वाली बैठक सप्ताहांत पर रात्रि भोज पर होगी लेकिन राष्ट्रपति ज़्याक शिराक का बर्लिन जाना काफ़ी महत्वपूर्ण होगा. शिराक जर्मन चांसलर गैरहर्ड श्रोडर से मुलाक़ात करना यह ज़ाहिर करता है कि वह 'यूरोप का मोटर' होने के अपने दावों को फिर से जीवित करना चाहते हैं. शिराक कह चुके हैं कि फ्रांस के लोगों की चिंताओं और अपेक्षाओं संबंधी सवालों के जवाब यूरोप के स्तर पर ही दिए जाने चाहिए. फ्रांस और जर्मनी एक साथ मिलकर यूरोपीय मुद्रा - यूरो के मज़बूत दायरे में आते हैं लेकिन ये दोनों ही देश कम आर्थिक विकास दर और बेरोज़गारी की ख़राब स्थिति से परेशान हैं. उनकी नीतियाँ नाकाम हो रही हैं. नीदरलैंड सरकार ने ख़ुद को इन दोनों ही देशों की महत्वकांक्षाओं से अलग कर लिया है. अब यह मुद्दा ब्रिटेन में भी गरमा गया है और यूरोपीय संविधान पर जनमत संग्रह कराया जाए या नहीं, इस मुद्दे पर अगले सप्ताह कुछ घोषणा हो सकती है. ब्रिटेन अब किसी वैकल्पिक कार्यक्रम की तरफ़ देख रहा है. |
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