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गुरुवार, 02 जून, 2005 को 16:09 GMT तक के समाचार
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यूरोपीय संविधान : सवाल-जवाब
यूरोपीय संविधान
यूरोपीय संघ के संविधान पर और यूरोपीय संघ का विस्तार करने पर तो फ़्रांस के नीस शहर में 2001 में संधि हो गई थी और फ़्रांस, जर्मनी और नीदरलैंड जैसे देश तो इस तरह के समझौतों के लिए सबसे आगे थे, फिर इन देशों के लोग इन फ़ैसलों के विरोध में क्यों उठ खड़े हुए हैं?

इन्हीं कुछ सवालों के जवाब तलाश करने की कोशिश की शिवकांत ने.

जवाब: फ़्रांस और नीदरलैंड के जनविरोध की जड़ें खोजने के लिए हमें यूरोपीय संधियों के इतिहास में झाँक कर देखना होगा, ख़ासकर यूरोप के एकीकरण और यूरोप की साझी मुद्रा 'यूरो' का रास्ता खोलने वाली मास्त्रिख़्त संधि में, जिसपर 1992 में दस्तख़त किए गए थे.

फ़्रांस और नीदरलैंड के जनमतसंग्रहों के दौरान जितने भी मतदाताओं की राय ली गई थी, उनमें से अधिकांश को ये शिकायत थी कि साझी मुद्रा यूरो को चालू करने और यूरोप का विस्तार करने जैसे अहम फ़ैसलों के लिए न यूरोपीय संघ के अधिकारियों ने उनकी राय ली और न ही उनकी अपनी सरकारों ने लोगों की चिंताओं पर ध्यान दिया.

लेकिन मास्त्रिख़्त संधि का इन जनमतसंग्रहों से क्या संबंध है? ये तो यूरोपीय संविधान के बारे में है.

जवाब: यही बात तो यूरोप की सरकारों की समझ में नहीं आई. दरअसल, यूरोपीय संघ यूरोप के धनी देशों का एक तरह का क्लब रहा है. जब तक साझा मंडी बनने से सभी देशों का व्यापार बढ़ता रहा और आर्थिक प्रगति होती रही, तब तक तो सभी यूरोपीय संघ के गुण गा रहे थे. लेकिन ज्यों ही अर्थव्यवस्था की गाड़ी रुकने लगी और आर्थिक मंदी से बेरोज़गारी बढ़ने लगी, लोगों को इस क्लब में बुराइयाँ नज़र आने लगीं.

जब तक इन देशों की अपनी अलग-अलग मुद्राएँ थीं तब तक तो सरकारें या उनके राष्ट्रीय बैंक मंदी आने पर ब्याज दरें घटा कर अर्थव्यवस्था में नई जान फूँक सकते थे और बेरोज़गारी पर लगाम कस सकते थे. लेकिन अब यूरो मुद्रा को अपनाने वाले यूरोपीय देशों का एक बैंक है, जो किसी एक देश की बजाय सभी सदस्य देशों के आर्थिक हालात देख कर ब्याज दर निर्धारित करता है. तो अगर फ़्रांस, जर्मनी और नीदरलैंड में मंदी भी आ जाए, बेरोज़गारी बढ़ने लगे और लोग ब्याज दरें घटाने की गुहार लगाने लगें, तो भी यूरोपीय बैंक तब तक कुछ नहीं करेगा जबतक सभी देशों में वैसे हालात न बन जाएँ. पिछले पाँच सालों से यही हो रहा है।

क्या यही एकमात्र कारण है या इस मोहभंग के और भी कुछ कारण हैं?

जवाब: नहीं, कारण तो बहुतेरे हैं. लोगों को इस बात का भी डर है कि यूरोपीय संघ के नए सदस्य देशों के विकास का ख़र्च भी अंततः उन्हीं को भरना पड़ेगा. इसलिए यूरोप के धनी देशों के लोग पूर्वी यूरोप के पोलैंड और हंगरी जैसे अपेक्षाकृत ग़रीब देशों को इतनी जल्दी सदस्यता दे दिए जाने और तुर्की की सदस्यता पर विचार करने से ख़ुश नहीं हैं. तुर्की को लेकर ये चिंता भी है कि वह एक बड़ी आबादी वाला मुस्लिम देश है.

कुछ लोग अंग्रेज़ी-अमरीकी यूरोप बनाम समाजवादी यूरोप का नारा लगा रहे हैं, उनकी क्या शिकायत है?

जवाब: उनकी शिकायत का आधार मज़दूरों और आम आदमी के कुछ मौलिक अधिकार हैं. दरअसल नए संविधान के मुताबिक यूरोप को अपने श्रम संबंधी क़ानूनों में सुधार करने होंगे और सेवाओं का बाज़ार खोलना होगा. इन सुधारों का दबाव अमरीका और उसका पिछलग्गू समझे जाने वाले ब्रिटन ने डाला था. इनका असर ये होगा कि फ़्रांस जैसे देशों को स्वास्थ्य और कृषि जैसी सेवाओं और दूसरे सार्वजनिक क्षेत्रों के दरवाज़े खोलने होंगे, और हड़ताल के अधिकार जैसे क़ानूनों से किनारा करना होगा. यूरोप के लोग इन परिवर्तनों से धबराते हैं क्योंकि इनसे बेरोज़गारी और सामाजिक असुरक्षा का ख़तरा और बढ़ता है. इसीलिए इनको एंग्लो-सैक्सन सुधार कहकर पुकारते हैं.

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