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चुनाव में आप्रवासन है संवेदनशील विषय | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आप्रवासन ब्रिटन की राजनीति में बड़ा ही संवेदनशील विषय है. सरकार इसे देश के लिए ज़रूरी और फ़ायदेमंद मानती है जबकि विपक्ष का कहना है कि अगर समय रहते इसे नियंत्रित न किया गया तो ये सार्वजनिक सेवाओं पर भारी बोझ बन जाएगा. ब्रिटन में आकर बसने वालों का एक लंबा इतिहास रहा है. यहाँ का समाज विविध और बहुसांस्कृतिक है. लेकिन इन चुनाव में आप्रवासन और शरण प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं. पूरे देश में आप्रवासन के स्तर और उसके प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है. कंज़र्वेटिव पार्टी चाहती है कि आप्रवासन को सीमित किया जाए और शरणार्थियों के लिए कोटा निर्धारित हो. पार्टी के नेता माइकल हॉवर्ड का कहना है, " मैं समझता हूं कि ब्रिटन के लिए सबसे अच्छा ये होगा कि आप्रवासन नियंत्रण व्यवस्था ऐसी हो जो काम करती हो, न्यायपूर्ण हो और जिसकी सीमाएँ निर्धारित की जाएं. जब से टोनी ब्लेयर सत्ता में आए हैं आप्रवासन में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है." मांग सैरा लंदन के उस इलाक़े में काम करती हैं जहाँ जातीय अल्पसंख्यक बहुत हैं और उनका कहना है कि आप्रवासन सीमित होना चाहिए. उनका कहना है, "ब्रिटन एक छोटा सा द्वीप है, हम आप्रवासियों के बोझ तले दबे जा रहे हैं. मेरे ख़्याल से यहाँ ऑस्ट्रेलिया जैसी व्यवस्था होनी चाहिए जहाँ लोगों को योग्यता के आधार पर आने दिया जाता है. मैं ये नहीं कहती कि हमें अपनी सीमाएँ बंद कर देनी चाहिए. लेकिन हर किसी को यहाँ आकर बसने, काम करने और भत्ते लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए." उत्तरी लंदन के एडी ज़फ़र क़रीब 30 साल पहले ब्रिटन आए थे लेकिन वे भी चाहते हैं कि इस दिशा में सख़्ती बरती जाए. उन्होंने बताया, "इसको बड़ी सख़्ती से कंट्रोल करना चाहिए क्योंकि तमाम लोग अर्थव्यवस्था को बेहतर नहीं करते. उनमें से चंद लोग होंगे जो क्वालिफ़ाइड हैं, डॉक्टर हैं या और पेशेवर लोग हैं वो तो उसमें योगदान दे सकते हैं लेकिन ये सरकार को देखना चाहिए कि जो हमारे काम के लोग हैं मुफ़ीद हैं उन्हे बुलाना चाहिए." दावा ब्रिटेन की सत्ताधारी लेबर पार्टी ने नारा दिया था कि वह आप्रवासन को ब्रिटन के लिए कारगर बनाएगी. उसका दावा है कि ब्रिटन को आप्रवासियों की ज़रूरत है और वो देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. बॉलैन इससे सहमत हैं लेकिन एक सीमा तक.
उनका कहना है, "हाँ, शायद हमें यहाँ लोगों की ज़रूरत है. जैसे बिजली का काम करने वाले, नलसाज़ यहाँ कम हैं. अगर लोग ऐसे यहाँ आकर काम करना चाहते हैं तो ठीक है, लेकिन तभी जब वो अपना और अपने परिवार जनों का भरण-पोषण कर सकें." लिबरल डेमोक्रेट का कहना है कि लेबर पार्टी और कंज़र्वेटिव पार्टी आप्रवासन के विषय पर वाकयुद्ध में उलझे हैं जबकि ये एक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषय है. पार्टी के नेता चार्ल्स कैनेडी कहते हैं, " हम चाहते हैं कि आप्रवासन का स्तर पार्टी राजनेताओं से अलग, एक स्वतन्त्र आयोग द्वारा तय किया जाना चाहिए. ब्रिटन में जिस क्षेत्र में कार्यकुशल लोगों की कमी है उसका पता लगाया जाए कोटा तय किया जाए और उसे न्यायपूर्ण ढंग से लागू किया जाए." फ़ायदा पिछले छ सालों से ब्रिटन में कोई डेढ़ लाख लोग हर साल आ रहे हैं. अमरजीत चड्ढा साउथहॉल में कपड़े का व्यापार करती हैं, वो कहती हैं कि लोग यहाँ के क़ानून का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहे हैं. उनका कहना है, "आप ब्रॉडवे पर जाकर देख लें 99 प्रतिशत लोग अफ़ग़ानिस्तान से नहीं आए हैं दिल्ली से आए हैं. मगर वो उधर क्लास लेकर थोड़ा भाषा सीखकर आते हैं और ग़लत सलत बोलकर यहाँ रह जाते हैं. पैसे ले रहे हैं सरकार से. आराम की ज़िंदगी है. भारत में लोग आठ आठ लाख रुपए देकर वीज़ा लेकर यहाँ आ जाते हैं पता नहीं कौन देता है उन्हे वीज़ा." आप्रवासन से ही जुड़ा विषय है ब्रिटन में शरण लेने वालों का. ब्रिटन ने संयुक्त राष्ट्र के 1951 में तैयार किए गए शरणार्थी समझौते पर हस्ताक्षर कर रखे हैं लेकिन कंज़र्वेटिव पार्टी चाहती है कि इससे हाथ खेंच लेने की ज़रूरत है. जबकि संयुक्तराष्ट्र का कहना है कि ब्रिटन में शरण लेने वालों की संख्या पूरे यूरोप से कम है. प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के दावे से आम लोगों की राय भिन्न है. उन्हे लगता है कि उनके आम ज़िंदगी पर इसका असर पड़ रहा है. सन 2001 में हुई जनगणना के अनुसार इंगलैंड और वेल्स में 87.5 प्रतिशत लोग गोरे हैं और स्कॉटलैंड में ये प्रतिशत 98 है. फिर भी यहाँ के लोग, विदेशियों की बढ़ती संख्या से चिंतित हैं. कारण सबके अलग-अलग हैं, कुछ सोचते हैं कि वो हमारी नौकरियाँ ले रहे हैं, कुछ कहते हैं कि वो देश पर बोझ हैं, और कुछ मानते हैं कि इनसे ब्रिटन की सांस्कृतिक तस्वीर बदल रही है. |
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