| ब्रितानी चुनाव प्रचार ने तेज़ी पकड़ी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब्रिटेन में आम चुनाव के लिए प्रचार अभियान ने तेज़ी पकड़ ली है और यह आख़िरी पखवाड़े में प्रवेश कर गया है. चुनाव एक पखवाड़े बाद यानी पाँच मई को होना है. चुनावी बहस मुख्य रूप से आव्रजन (इमीग्रेशन), स्वास्थ्य और अपराध नियंत्रण के इर्दगिर्द घूम रही है. जनमतसंग्रहों के मुताबिक़ सत्तारूढ़ लेबर पार्टी को आसान बढ़त नज़र आ रही है और स्थिति 2001 के चुनाव जैसी ही लगती है लेकिन बीबीसी संवाददाता डेविड चज़ान का कहना है कि इस बार नस्लीय अल्पसंख्यक उम्मीदवारों की संख्या को लेकर काफ़ी अंतर है. इस चुनाव में पिछले चुनाव के मुक़ाबले क़रीब दो तिहाई ज़्यादा नस्लीय अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में हैं. मुख्य विपक्षी दल कंज़रवेटिव पार्टी 2001 के चुनाव में जितने नस्लीय अल्पसंख्यक उम्मीदवार खड़े किए थे, इस बार उनसे दोगुना उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. कंज़रवेटिव पार्टी अपना चुनावी अभियान मुख्य रूप से आव्रजन और देश की सीमाओं को और कड़ा किए जाने के इर्दगिर्द केंद्रित किए हुए हैं. उसने 39 नस्लीय अल्पसंख्यक उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं जबकि लेबर पार्टी ने 29 और तीसरे दल लिबरल डेमोक्रेट पार्टी ने 41. अल्पसंख्यकों के एक महासंघ ऑपरेशन ब्लैक वोट और अमरीकी नागरिक अधिकार प्रचारकर्ता जैसी जैक्सन ब्रिटेन के अनेक भागों का दौरा कर रहे हैं और लोगों तो वोट देने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं ताकि उनके मतों का असर नज़र आ सके. कार्यकर्ताओं का कहना है कि नस्लीय अल्पसंख्यकों को वोट दस प्रतिशत से ज़्यादा सीटों के नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं. लेकिन अनुमान लगाया गया है कि ब्रिटेन के नस्लीय अल्पसंख्यक समुदायों के सिर्फ़ तीन चौथाई लोगों ने ही मतदान के लिए अपना पंजीकरण कराया है. पिछले चुनाव में भी जो लोग मतदान के अधिकारी थे उनमें से आधे से भी कम ने ही अपने मताधिकार का प्रयोग किया था. |
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