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सोमवार, 25 अप्रैल, 2005 को 21:53 GMT तक के समाचार
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महत्वपूर्ण हैं ब्रितानी संसदीय चुनाव

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तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद लिए टोनी ब्लेयर जमकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं
ब्रिटेन का ये आम चुनाव बेहद महत्वपूर्ण दौर में हो रहा है. चुनावों पर इराक़ युद्ध की छाया तो है ही, पर काफ़ी लोग मानते हैं कि आख़िरकार राष्ट्रीय मुद्दे ही निर्णायक रहेंगे.

चुनाव कई और कारणों से भी दिलचस्प हो गया है, मसलन ये कि इस बार चुनाव क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी की बजाय कमी हुई है. अनुमान है कि इस बार 15 प्रतिशत मतदान डाक मतपत्र के ज़रिए होगा. विपक्षी कंज़रवेटिव पार्टी को लेबर का मुक़ाबला करने के लिए वाक़ई भगीरथ प्रयास करने की ज़रूरत पड़ रही है. लिबरल डेमोक्रेट पार्टी इराक़ पर हमला करने के ख़िलाफ़ थी, लेकिन अब उसके नेताओं का कहना है कि इराक़ का मुद्दा वो इसलिए ज़ोर शोर से नहीं उठा रहे क्योंकि इससे उनके विरोधी उन्हें एक मुद्दे की पार्टी कहना शुरू कर देंगे.

ब्रिटेन के इस चुनाव के उलझावपूर्ण मगर दिलचस्प पहलुओं को समझने के लिए मैंने बीबीसी के चुनाव संयोजक माइकेल डंकन से बात की.

पिछले कुछ सालों में दूसरे कई देशों की तरह ब्रिटेन में भी वोट डालने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है. ये गिरावट 1997 के मुक़ाबले 2001 के चुनावों में काफ़ी अधिक हुई थी. इस रुझान को देखते हुए सरकार ने मतदाताओं को डाक से वोट डालने की सुविधा दे दी लेकिन इस मुद्दे पर विवाद उठ खड़ा हुआ है. पूरे मामले के बारे में माइकेल डंकन बताते हैं-

"इस चुनाव में डाक-मतपत्र का मामला काफ़ी विवादपूर्ण हो गया है. दस साल पहले सिर्फ़ दो या तीन प्रतिशत लोग ही इसका इस्तेमाल करते थे. लेकिन जैसे जैसे चुनाव में लोगों की हिस्सेदारी कम होती गई, सरकार ने डाक मतपत्र की सुविधा शुरू की. इसके मुताबिक़ लोग डाक से अपना वोट पहले से ही डाल सकते हैं और मतदान के दिन उन्हें लाइन में खड़ा नहीं होना पड़ेगा. इसलिए अनुमान है कि डाक मतपत्रों का इस्तेमाल करने वाले मतदाताओं की संख्या इस चुनाव में कुल मिलाकर 15 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी.

लेकिन इसको भी लेकर विवाद छिड़ गया है क्योंकि एक तो लोगों को इस प्रक्रिया के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है. दूसरे कुछ समुदायों में परिवार का मुखिया अपने सब परिवार जनों की ओर से मतपत्र भर सकता है, जो इस देश में स्वीकार्य नहीं होगा."

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कंज़रवेटिव नेता माइकल हॉवर्ड सरकार पर वार करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते

एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि इस बार ब्रिटेन की संसद में कुल सदस्यों की संख्या 659 की बजाय 646 ही होगी और बहुमत के लिए 324 सीटों की ज़रूरत पड़ेगी. सीटें कम होने का कारण ये है कि स्कॉटलैंड से 72 की बजाय अब सिर्फ़ 59 सांसद की चुने जाएंगे. ऐसा क्यों?

"हर चुनाव क्षेत्र में लगभग समान जनसंख्या होनी चाहिए. लेकिन ऐसा है नहीं. उदाहरण के लिए स्कॉटलैंड में एक तो चुनाव क्षेत्रों में जनसंख्या कम है, दूसरे स्कॉटलैंड की अपनी अलग संसद है जो स्वास्थ्य जैसे कई मुद्दों के लिए ज़िम्मेदार है. इस तरह स्कॉटलैंड का प्रतिनिधित्व कुछ ज़्यादा है. इसलिए वहाँ चुनाव क्षेत्र कम किए गए. इंग्लैंड और वेल्स में फ़िलहाल चुनाव क्षेत्रों की संख्या उतनी ही रहेगी, लेकिन भविष्य में उनकी भी समीक्षा की जाएगी."

वर्ष 1911 से पहले ब्रिटेन की संसद का कार्यकाल सात साल हुआ करता था. लेकिन उसके बाद संसद पाँच साल के लिए चुनी जाने लगी. दिलचस्प बात ये है कि 1945 से अब तक सिर्फ़ दो बार ही ब्रितानी संसद पाँच साल पूरे कर पाई है.

मौजूदा संसद में सत्तारूढ़ लेबर पार्टी के 410, कंज़रवेटिव पार्टी के 164 और लिबरल डेमोक्रेट्स के 55 सदस्य हैं. हाल के मतदाता सर्वेक्षणों पर नज़र डालें तो लेबर पार्टी को अब भी विपक्षी कंज़रवेटिव पार्टी से आगे बताया जा रहा है. लेकिन सवाल है कि क्या कंज़रवेटिव पार्टी इतना स्विंग हासिल कर पाएगी जिससे वो सत्ता में आ सके?

"पिछले दिनों के मतदाता सर्वेक्षणों पर नज़र डालें तो लेबर पार्टी दूसरों से 5 से 9 प्रतिशत आगे हैं. इस सर्वेक्षणों के बारे में बात करना मुश्किल है. पिछले हफ़्ते के सर्वेक्षणों में लेबर पार्टी को 39 प्रतिशत, कंज़रवेटिव को 33 और लिबरल डेमोक्रेट पार्टी को 23 प्रतिशत सीटें दी गई थीं. कंज़रवेटिव पार्टी को लेबर से दो प्रतिशत मत ज़्यादा मिलें तो त्रिशंकु संसद आएगी और अगर उन्हें बहुमत में आना है तो उन्हें लेबर पार्टी से दस प्रतिशत ज़्यादा वोट चाहिए."

चार्ल्स केनेडी सँभल कर चल रहे हैं अपनी चालें

लिबरल डेमोक्रेट पार्टी और दूसरी पार्टियों की स्थिति कमोबेश पहले जैसी ही बताई जा रही है. इन क़यासों के बीच बार-बार ये सवाल उठ रहा है कि क्या आम मतदाता राजनीति से उचाट हो चुका है? आँकड़ों पर नज़र डालें तो 1997 में 1992 की अपेक्षा क़रीब तेईस लाख मतदाताओं ने वोट नहीं डाले. 2001 में 1997 के मुक़ाबले पचास लाख मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग नहीं किया. इस उदासीनता का क्या कारण है?

"मैं सोचता हूँ ये कहना ठीक नहीं है कि लोग राजनीति में दिलचस्पी नहीं रखते. शायद ये कहना ठीक होगा कि राजनीतिक पार्टियों से लोगों का मोहभंग हो गया है. इसलिए एक मुद्दे पर चलाए गए चुनाव अभियान में लोग ज़्यादा दिलचस्पी लेते हैं. जैसे पेंशन उपभोक्ताओं की लॉबी बहुत मज़बूत है. युद्ध विरोधी अभियान दो साल पहले काफ़ी मज़बूत था. समस्या ये है कि सभी पार्टियों को बड़े मुद्दों का ज़िक्र करना होता है. दिलचस्प बात ये है कि बड़े आर्थिक मुद्दों पर दोनों बड़ी पार्टियों के नज़रिए में कोई ख़ास बड़ा फ़र्क़ भी नहीं है."

शायद यही कारण है कि विरोधी पार्टियों को हर मुद्दे पर विरोधी मुद्रा में देखना चाह रहे मतदाता जब असल में ऐसा नहीं पाते तो ब्रिटेन के बादल और बरसात भरे मौसम में सिर्फ़ वोट डालने बाहर निकलने का मन नहीं बना पाते.

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