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इराक़ पर हमले का मामला गरमाया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी और कुछ अन्य समाचार माध्यमों ने एक दस्तावेज़ प्रकाशित किया है जिसे इराक़ पर हमले से ठीक पहले प्रधानमंत्री को दी गई ब्रितानी एटॉर्नी जनरल की राय बताया जा रहा है. ब्रितानी मंत्रियों ने इस दस्तावेज़ को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया था और इसमें एटॉर्नी जनरल लॉर्ड गोल्डस्मिथ ने सैनिक कार्रवाई की क़ानूनी वैधता पर सवाल उठाए हैं. चुनाव से ठीक पहले ब्रिटेन की दोनों प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने इस दस्तावेज़ का जमकर राजनीतिक इस्तेमाल शुरू कर दिया है. इस दस्तावेज़ को एटॉर्नी जनरल की तरफ़ से प्रधानमंत्री को भेजी गई क़ानूनी सलाह का सारांश बताया जा रहा है.
सात मार्च 2003 को भेजी गई सलाह में इराक़ के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ने से पहले संयुक्त राष्ट्र के दूसरे प्रस्ताव को पारित कराए जाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया है. इस सलाह के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर तक पहुँचने के दो सप्ताह बाद ही ब्रिटेन और अमरीका के नेतृत्व में गठबंधन सेना ने इराक़ पर हमला कर दिया था. इस दस्तावेज़ में लॉर्ड गोल्डस्मिथ ने कहा है कि इराक़ के मामले में संयुक्त राष्ट्र का पहला प्रस्ताव बहुत स्पष्ट नहीं है इसलिए सबसे सुरक्षित वैधानिक तरीक़ा होगा कि दूसरा प्रस्ताव पारित कराया जाए. ताज़ा बयान एटॉर्नी जनरल ने यह ज़रूर कहा है कि पिछले प्रस्तावों को आधार बनाकर इराक़ के ख़िलाफ़ एक मज़बूत मामला तैयार किया जा सकता है लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि ऐसा करने के लिए ठोस सबूतों की ज़रूरत होगी.
दस्तावेज़ के समाचार माध्यमों में आने के बाद बुधवार की रात एटॉर्नी जनरल ने एक बयान जारी करके कहा है कि सरकार अब तक इराक़ मामले पर जो कुछ कहती रही है वह इस दस्तावेज़ के अनुरूप ही है, उन्होंने अपनी यह राय भी दोहराई है कि इराक़ पर हमला क़ानूनी दृष्टि से सही था. इस दस्तावेज़ के मीडिया में आने के बाद टोनी ब्लेयर सरकार के वरिष्ठ मंत्री जैक स्ट्रॉ ने कहा कि अंतिम क़ानूनी सलाह 7 मार्च को नहीं बल्कि 17 मार्च को आई थी जिसे कैबिनेट को सौंपा गया था और संसद में भी इसकी सूचना दी गई थी. जैक स्ट्रॉ ने कहा, "सात मार्च और 17 मार्च के बीच एटॉर्नी जनरल की ईमानदारी और उनकी क़ानूनी राय में कोई तब्दीली नहीं आई थी, लेकिन जैसा मैंने इस वर्ष 25 मार्च को संसद को बताया था, स्थितियों और सबूतों में परिवर्तन आया था. एक तो सद्दाम हुसैन ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव की अवहेलना की थी, दूसरे फ्रांस ने किसी अन्य प्रस्ताव की संभावना से इनकार कर दिया था, इसलिए दूसरा प्रस्ताव लाने की बात ही अप्रासंगिक हो गई थी क्योंकि हमें पता चल गया था कि हम दूसरा प्रस्ताव नहीं ला सकते." लेकिन इस सफ़ाई से विपक्षी कज़र्वेटिव पार्टी के नेता माइकल हॉवर्ड संतुष्ट नहीं हैं, वे कहते हैं, "हमें अब पता है कि सात मार्च को एटॉर्नी जनरल ने जो राय दी थी वह एहतियात और चेतावनियों से भरी थी. यह स्पष्ट है और प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि इसके दस दिन बाद 17 मार्च को जब एटॉर्नी जनरल ने अपनी राय कैबिनेट को दी तो उसमें उनकी राय बदली हुई नहीं थी. लेकिन अब साफ़ है कि एटॉर्नी जनरल की सलाह बदली है, हमें यह बताया जाए कि क्या बदला है और उसे किसने बदला है." दूसरे प्रमुख विपक्षी दल लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने माँग की है कि इस मामले पर प्रधानमंत्री स्थिति को स्पष्ट करने के लिए विस्तृत बयान दें. मामला साफ़ तौर पर तूल पकड़ता दिख रहा है और इसका असर चुनाव पर पड़ेगा, इस संभावना से कोई इनकार नहीं कर सकता. |
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