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ब्रिटेन में इराक़ बना चुनावी मुद्दा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब्रिटेन में चुनाव के एक हफ़्ते पहले ही इराक़ का मामला फिर उठ गया है और इराक़ पर हमले की वैधता पर सवाल उठने लगे हैं. प्रधानमंत्री से सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या इराक़ के मामले में सरकार के मुख्य क़ानूनी सलाहकार ने पहले इराक़ पर हमले के ख़िलाफ़ राय दी थी और बाद में अपना मन बदला था? उल्लेखनीय है कि ब्रिटेन में पाँच मई को आम चुनाव होने जा रहे हैं और अब तक इराक़ चुनाव मुख्य चुनावी मुद्दा नहीं था. हालांकि प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने सारे आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि इराक़ पर हमले को लेकर क़ानूनी राय एकदम स्पष्ट थी. उन्होंने इस बात से इंकार किया है कि सरकार ने कभी एटॉर्नी जनरल गोल्डस्मिथ पर कोई दबाव डाला था. पिछले सप्ताहांत पर 'मेल ऑन संडे' समाचार पत्र ने कहा था कि एटॉर्नी जनरल गोल्डस्मिथ ने पहले संदेह व्यक्त किया था कि संयुक्त राष्ट्र में दूसरा प्रस्ताव पारित किए बिना इराक़ पर हमला किया जा सकता है. विपक्ष का दबाव उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र के कुछ सदस्यों के विरोध को देखते हुए अमरीका और ब्रिटेन ने दूसरे प्रस्ताव का विचार छोड़ दिया था और इसके बिना ही इराक़ पर हमला शुरु कर दिया गया था. ब्रिटेन के विपक्षी दलों में लिबरल डेमोक्रेट का कहना है कि इस मामले की खुली जाँच होनी चाहिए. ब्रिटेन की यही एक पार्टी थी जिसने इराक़ पर हमले का खुला विरोध किया था. इस पार्टी के प्रमुख चार्ल्स कैनेडी ने कहा है कि इराक़ पर हमले से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटेन की छवि ख़राब हुई. दूसरी ओर कंज़रवेटिव पार्टी ने हालांकि इराक़ पर हमले का समर्थन किया था लेकिन अब वे टोनी ब्लेयर के ख़िलाफ़ हैं. कंज़रवेटिव पार्टी के प्रमुख माइकल हॉवर्ड कहते हैं कि इराक़ पर हमले के कारणों को लेकर प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर झूठ बोलते रहे हैं. दूसरी ओर सत्ताधारी लेबर पार्टी अब जनता का ध्यान आर्थिक मुद्दों की ओर मोड़ने की कोशिशों में लगी हुई है. लेबर पार्टी मानती है कि आर्थिक मुद्दों पर उन्होंने जो काम किया है वह पार्टी की धरोहर है. |
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