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गंजापन और ब्रिटेन के चुनाव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चुनावों में अर्थव्यवस्था, विदेश नीति या घरेलू नीतियों का अच्छा ख़ासा प्रभाव पड़ता है लेकिन ब्रिटेन के चुनावों में विभिन्न उम्मीदवारों के गंजेपन का भी प्रभाव पड़ रहा है. शायद यही कारण है कि चुनाव से पहले के सर्वेक्षणों में टोनी ब्लेयर को बढ़त दी जा रही है. कुछ लोगों का मानना है कि लिबरल डेमोक्रेट पार्टी के नेता के सर पर घने बाल उन्हें उन मतदाताओं के मत दिला सकते हैं जो लेबर और कंज़रवेटिव की नीतियों पर विचार कर रहे हैं. यह सुनने या पढ़ने में बेवकूफ़ी भरा लगे लेकिन एक सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है कि कम बाल नुकसानदेह हो सकते हैं. 1990 के दशक में किए गए एक शोध में पता चला कि अमरीका में राष्ट्रपति बनने वाले नेताओं में से कम ही ऐसे थे जिनके सर पर घने बाल नहीं थे. घने बाल वालों की संख्या गंजों से चार गुना अधिक थी. बालों का प्रभाव पिछले दिनों ब्रिटेन में भी ऐसा ही एक सर्वेक्षण किया गया. इसके अनुसार कंज़रवेटिव नेता जॉन मेजर के बाल भले ही सफेद हों लेकिन उनके बाल नील किनॉक और विलियम हेग से अधिक थे लेकिन अब लेबर नेता टोनी के पास ख़ासे अच्छे बाल हैं. पिछली बार जब कोई गंजा नेता ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बने थे , वो थे 1951 में विंस्टन चर्चिल. लेकिन उनके ख़िलाफ़ जो नेता खड़े थे उनके भी बाल कम ही थे और वो नेता थे क्लीमेंट एटली. लेकिन क्या बालों का इतना फ़र्क पड़ता है. ब्रिटेन में मूंछों वाले अंतिम प्रधानमंत्री हुए थे हैराल्ड मैकमिलन जो 1960 के दशक में इस पद पर थे. दाढ़ी रखने वाले अंतिम प्रधानमंत्री हुए 1922 में डेविड लॉयड जॉर्ज. शायद लेबर पार्टी ने 1997 में इन्हीं बातों पर पूरी तरह से विचार किया होगा और जीत पाने में सफलता हासिल की. पार्टी की छवि संवारने वाली बारबरा फोलेट ने सभी नेताओं को मूंछ और दाढ़ी कटाने की भी सलाह दी और इसका निशाना बने ज्यौफ़ हून, एलस्टर डार्लिंग और पीटर मंडेलसन. पत्रकार जोनाथन मैटलैंड मानते हैं कि जिस तरह पार्टियों की नीतियां बदलती हैं उसी तरह नेताओं की छवि भी बदलती है. अपनी किताब किसे वोट दें में मैटलैंड लिखते हैं कि स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन ही महत्वपूर्ण नहीं बालों पर भी चुनाव जीते और हारे जाते हैं. उनका कहना है कि विभिन्न पार्टियों की नीतियों में फ़र्क इतना कम होता है कि मतदाता नेता की छवि पर ध्यान देने लगता है. वो कहते हैं कि ऐसे मतदाता जो अपने वोट के बारे में फ़ैसला अंतिम समय में करते हैं वो उसी को वोट देते हैं जिनकी छवि उन्हें पसंद आती है. छवि सुधारने की कवायद फेडरेशन ऑफ इमेज कंसल्टेंट्स की लियोनी राबर्ट्स मानती हैं कि राजनेताओं के चेहरे और उनके हावभाव इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं जितने होने नहीं चाहिए. वो कहती है " जिस किसी को भी देखकर ऐसा लगे की वो अपना ख्याल नहीं रखता, बाल मुड़े तुड़े हों, कपड़े ठीक न हों तो उसे कोई पसंद नहीं करता. " राजनेताओं के लिए एक ब्रांड इमेज बनाने की ज़रुरत होती है क्योकिं इससे विश्वास बढ़ता है. राबर्ट्स मानती हैं कि गंजेपन का सचमुच ब्रिटेन के चुनावों में बड़ा प्रभाव पड़ सकता है. वो कहती हैं कि बाल कम होने से लोग बूढ़े लगते हैं और कभी कभी बीमार भी दिखते हैं. एक अन्य इमेज विशेषज्ञ मैटलैंड कहते हैं कि छवि काफ़ी महत्वपूर्ण होती है. |
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