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ब्रितानी चुनाव: शिक्षा, स्वास्थ्य भी हैं अहम मुद्दे | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब्रिटन के चुनाव में स्वास्थ्य और शिक्षा ऐसे विषय हैं जो पार्टियों के भाग्य का फ़ैसला करते रहे हैं. सन 1945 में लेबर पार्टी ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा का वादा करके दूसरे महायुद्ध के हीरो विंस्टन चर्चिल को मात दी थी. वहीं टोनी ब्लेयर ने 1997 में 'शिक्षा-शिक्षा-शिक्षा' के मंत्र पर चुनाव जीता था. आज भी लेबर पार्टी सत्ता में है और उसने राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) में काफ़ी निवेश भी किया है लेकिन क्या आम लोग उससे संतुष्ट हैं? हमने स्वास्थ्य सेवाओं का जायज़ा लेने के लिए कुछ ऐसे लोगों से बात की जो अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे. लोगों की राय एक मतदाता मुश्ताक़ अहमद का कहना था, "आप बीमार आज हैं. डॉक्टर के पास जाएँ तो अपॉंटमैंट नहीं मिलती और अगर मिलती भी है तो दो हफ़्ते बाद की. ये जो घपले हो रहे हैं ये बहुत ग़लत हैं..." लेकिन एक अन्य मतदाता गेयना क्रॉफ़र्ड का कहना था, "मेरे ख़्याल से तो स्वास्थ्य सेवा अच्छी है, सबके लिए..." फ़ज़ल मिर्ज़ा का भी कहना था, "स्वास्थ्य सेवा अच्छी ख़ासी है. हाल में मेरा ऑपरेशन हुआ था - दिल की बाइपास सर्जरी. डॉक्टरों और नर्सों ने मेरी बहुत अच्छी तरह देखभाल की. मुझे तो कोई शिकायत नहीं है." उधर अमरजीत चढ्ढा का कहना था, "जब तक आपके पास स्वास्थ्य बीमा नहीं तब तक सर्जरी में जाना बेकार है. जाते हैं तो इतनी लम्बी वेटिंग लिस्ट है कि क्या बताऊं. मैं अपनी मिसाल देती हूं मुझे एक टैस्ट कराना था अभी तक चिट्ठी ही नहीं आई कि कब होगा." शिकायत का कारण यूरोपीय देश अपने सकल घरेलू उत्पाद का आठ प्रतिशत स्वास्थ्य सेवा पर ख़र्च करते हैं. ब्रिटन में इसका प्रतिशत 6.6 प्रतिशत आंका गया है. लेकिन लेबर पार्टी का दावा है कि वह उसमें निरंतर बढ़ोतरी कर रही है. प्रफुल्ल जीवन 1997 से पहले की कंज़र्वेटिव सरकार को एनएचएस के स्तर के लिए दोषी मानते हैं. उनका कहना है, "जिस हाल में टोरी पार्टी ने एनएचएस को छोड़ा था उसमें तबदीली लाने में बहुत वक्त लगने वाला था और ये जो आठ साल गुज़रे हैं, ये कम है. इससे भी ज़्यादा समय लगेगा उसे बेहतर बनाने में." क्या कारण है कि इतना निवेश करने के बाद भी लोगों को एनएचएस से शिकायत है? एक कारण तो ये है कि चिकिस्सा जगत में बड़ी तेज़ी से विकास हो रहा है जिसकी वजह से लोगों की अपेक्षाएं बढ़ती जा रही हैं. दूसरा ये कि ब्रिटन में बुज़ुर्गों का यानि वृद्ध लोगों का प्रतिशत बढ़ रहा है, जिनपर एनएचएस का बड़ा हिस्सा ख़र्च होता है. सैरा मानती हैं कि कमज़ोरी स्वयं एनएचएस के काम करने के तरीक़े में है. उनका कहना है, "मुझे नहीं लगता कि टोनी ब्लेयर ने अपना वादा पूरा किया है. मेरे विचार में नौकरशाही में ज़रूरत से ज़्यादा धन ख़र्च होता है. इसे चलाने में ज़्यादा लोग लगे हैं और अस्पतालों में कम. एनएचएस का स्तर निश्चय ही गिरा है." टोनी ब्लेयर एनएचएस में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत तक बढ़ाना चाहते हैं. कंज़र्वेटिव या टोरी पार्टी कहती है कि वह रोगियों को अधिक विकल्प देना चाहती है जबकि लिबरल डैमोक्रैट पार्टी ने वादा किया है कि बुज़ुर्गों और विकलांगों की देखभाल के लिए निशुल्क सेवा उपलब्ध कराएँगे. लेकिन मुश्ताक़ अहमद ऐसे वादों से प्रभावित नहीं हैं. उनका कहना है, "देखिए ये तो आने वाले समय की बात है कहने को तो सभी कहते हैं कि ये करेंगे वो करेंगे..." शिक्षा भी अहम मुद्दा 1997 में शिक्षा को एक अहम मुद्दा बनाने वाली लेबर पार्टी अब भी इस मुद्दे को उठा रही है. लेकिन आज बात हो रही है कि क्या अभिभावकों को अपने बच्चों के लिए सही स्कूल चुनने का अधिकार होना चाहिए, क्या स्कूलों में अनुशासन की कमी है और क्या शिक्षा का स्तर संतोषजनक है? एक मतदाता गेयना क्रॉफ़र्ड का कहना है कि उनकी भतीजी को अपने स्थानीय स्कूल में एडमिशन नहीं मिला. उनका कहना है, "मेरी भतीजी सात महीनों तक स्कूल नहीं जा सकी, हमें उसे घर पर ही पढ़ाना पड़ा और हमे किसी तरह की कोई सहायता भी नहीं मिली. उसे उस स्कूल में ऐडमिशन दिया जा रहा था जहां पहुँचने के लिए दो बसें बदलकर जाना पड़ता है. बताइए 11 साल की बच्ची के लिए क्या ये संभव है?" ब्रिटन में शिक्षा का बजट, सकल घरेलू उत्पाद का 4.4 प्रतिशत है. सरकार का दावा है कि पिछले आठ सालों में शिक्षकों की संख्या बहुत बढ़ी है और दसवीं और बारहवीं परीक्षाओं में छात्र और छात्राओं का प्रदर्शन बेहतर हुआ है. प्रफुल्ल जीवन लंदन में एक दुकान चलाते हैं और शिक्षा के स्तर से संतुष्ट हैं. वे कहते हैं, "एक स्कूल से दूसरा स्कूल अलग तो होगा, लेकिन शिक्षा का स्तर तो अच्छा है." लेकिन स्कूलों में अनुशासन एक बड़ा मसला है. शिक्षक और अभिभावक दोनों ही ये मानते हैं कि इस दिशा में सख़्ती होनी ज़रूरी है. प्रफुल्ल जीवन का कहना है, "मेरे विचार में स्कूलों में अनुशासन कड़ा होना चाहिए. आजकल के बच्चों में ज़रा भी तमीज़ नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि माँ-बाप को ज़्यादा ज़िम्मेदारी का ऐहसास नहीं है. सभी ऐसे नहीं हैं लेकिन कई एशियाई मूल के माँ-बाप ऐसे हैं. वो स्कूलों में होने वाली शिक्षकों और माँ-बाप की बैठक में नहीं आते." चीन में एक कहावत प्रचलित है - "अगर आप एक साल की योजना बना रहे हैं तो धान बोएँ, अगर दस साल की योजना बना रहे हैं तो पेड़ लगाएँ और अगर जीवन भर की योजना बना रहे हैं तो लोगों को शिक्षित बनाएँ." इस चुनाव में जीत किसी की भी हो शिक्षा एक दीर्घकालिक योजना रहेगी. |
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