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महात्मा गांधी के सत्याग्रह को सौ साल बीतने के बाद उनकी पुण्यतिथि के मौक़े पर एक नज़र इस बात पर कि सत्याग्रह को भारतीय समाज ने कितना समझा और अब वह कितना प्रासंगिक है. बीबीसी हिंदी की विशेष प्रस्तुति. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक ओर सत्याग्रह शताब्दी का आयोजन हुआ तो दूसरी ओर गांधी के रास्ते पर चलते लोगों की उपेक्षा. तो आयोजन क्या रस्म अदायगी भर था? | सत्याग्रह की कोई उम्र नहीं होती, कोई पार्टी नहीं होती, वह जीतता-हारता नहीं. लेकिन पद्मभूषण शशि भूषण का कहना है कि अब यह रामलीला हो गया है. | इतिहास में दर्ज है कि महात्मा गांधी के रहते हुए उनके बिना और उनके बाद भी सत्याग्रह होते रहे हैं. और यह मामला सिर्फ़ भारत तक सीमित नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||