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रविवार, 01 जनवरी, 2006 को 15:01 GMT तक के समाचार
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चर्चिल की मंशा थी, 'गांधी मरें तो मरें'
महात्मा गाँधी
गाँधी दूसरे विश्वयुद्ध में भारत को शामिल करने का विरोध कर रहे थे.
ब्रितानी कैबिनेट के हाल ही में प्रकाशित कागज़ातों से विंस्टन चर्चिल की उस मंशा का पता चलता है जिसके मुताबिक वो चाहते थे कि गांधी अगर भूख हड़ताल पर बैठते हैं तो उन्हें मरने देना चाहिए.

ऐसे कागज़ातों की एक प्रदर्शनी इन दिनों लंदन स्थित केव अभिलेखागार में चल रही है.

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे चर्चिल का मानना था कि महात्मा की छवि वाले गांधी अगर अंग्रेज़ी हुकूमत की गिरफ़्त में भूख हड़ताल पर बैठते हैं तो उनके साथ भी आम लोगों जैसा बर्ताव होना चाहिए.

हालाँकि उनके मंत्रियों ने उन्हें ऐसा न होने देने के लिए समझाया क्योंकि अगर गांधी की मृत्यु अंग्रेज़ी हुकूमत की गिरफ़्त में हो जाती तो वह एक बड़ी शहादत बन जाएगी.

गाँधी ने 1942 के विश्वयुद्ध में भारत को शामिल करने का विरोध किया था जिसके बाद उन्हें हवालात में डाल दिया गया था.

पक्ष और विपक्ष

 महात्मा गांधी की छवि कुछ धार्मिक हस्ती जैसी है इसलिए उनकी हमारी गिरफ़्त में मौत हमारे लिए एक बड़ी समस्या बन सकती है
सर स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स

ब्रिटेन शासित भारत के तत्कालीन वायसरॉय, लॉर्ड लिनलिथगो ने भी कहा था कि वो "मज़बूती के साथ गांधी के भूख से मरने की स्थिति के पक्ष में हैं."

पर कई वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने इस कद़म को ग़लत ठहराया.

पूर्व विदेश सचिव लॉर्ड हैलिफ़ैक्स ने तर्क रखा, "गांधी को मुक्त करने के चाहे जो भी नुक़सान हों पर उनको बंद रखना और भी ज़्यादा संकट पैदा कर सकता है."

वर्ष 1943 के जनवरी महीने में अधिकारियों ने तय किया कि गांधी को छोड़ दिया जाए, पर लोगों की नज़र में यह क़दम अंग्रेज़ों की सहानुभूति के रूप में सामने आना चाहिए ना कि दबाव के आगे अंग्रेज़ों के झुकने के जैसी.

हवाई जहाज़ निर्माण विभाग के तत्कालीन मंत्री सर स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स ने कहा था, "महात्मा गांधी की छवि कुछ धार्मिक हस्ती जैसी है इसलिए उनकी हमारी गिरफ़्त में मौत हमारे लिए एक बड़ी समस्या बन सकती है."

चर्चिल का मत

चर्चिल का मत इनसे अलग था.

चर्चिल का मत था कि गांधी को क़ैद में ही रखा जाए और वो जो करना चाहें, करने दिया जाए.

हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर उन्हें इसलिए छोड़ा जा रहा है क्योंकि वो भूख हड़ताल पर बैठ जाएँगे तो उन्हें तुरंत छोड़ देना चाहिए.

आख़िरकार 1944 में गांधी के ख़राब होते स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें छोड़ दिया गया क्योंकि ब्रितानी हुकूमत को डर था कि उनकी गिरफ़्त में गांधी की मौत एक संकट बन सकती थी.

महात्मा गांधी की 78 वर्ष की उम्र में 30 जनवरी 1948 को हत्या कर दी गई थी.

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