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गांधी के बिना भी होते रहे हैं सत्याग्रह | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
साधारण आदमी जब-जब मुसीबत में पड़ता है तब-तब वह किसी सत्याग्रह के आधारभूत सिद्धांतों को लेकर और स्थानीय तरीक़ों का इस्तेमाल करके उसका हल निकालने की कोशिश करता है. या दूसरे तरीक़े से कहें तो जब राजनीतिक दल और मज़दूर संगठनों आदि से बात नहीं बनती तब समाज अपने तरह से विरोध करने का रास्ता ढूँढ़ता है. यही कारण है कि सत्याग्रह महात्मा गांधी के बिना भी बहुत हुए हैं और उनके परिणाम भी सकारात्मक रहे हैं. दरअसल सत्याग्रह एक फिज़ा से पैदा होता है. जब आदमी को धकेलकर एकदम किनारे कर दिया जाता है और वह किसी बिल्ली की तरह कोने में दुबका दिया जाता है तब उसे अपनी ताक़त का ख़याल आता है. कई सत्याग्रह जिस समय गांधी सत्याग्रह कर रहे थे उसी समय बंगाल के इलाक़े में 30 के दशक में ही कम से कम 13 महत्वपूर्ण सत्याग्रह हुए थे. कुछ उदाहरण देखें तो 1921 में कोंटेई में एक सत्याग्रह हुआ था. कोंटेई आजकल बांग्लादेश में है. वहाँ धीरेंद्र सस्माल ने यूनियन बोर्ड क़ानून में सुधार के ख़िलाफ़ सफल आंदोलन किया था. इसी तरह बाँधाबिला में पंचायत की जगह यूनियन बोर्ड बनाने का विरोध हुआ था. और ऐसा भी नहीं है कि सत्याग्रह सिर्फ़ राजनीतिक मामलों में हुए थे. तारकेश्वर नाम की जगह में एक सत्याग्रह तीर्थयात्रियों ने किया था जो वहाँ के महंत के ख़िलाफ़ था. इसका नेतृत्व स्वामी सच्चिदानंद ने किया था और उन्होंने गिरफ़्तारी देकर अपना विरोध दर्ज करवाया था. गांधी जी के जीवन काल में ही सरदार वल्लभभाई पटेल के बारदोली सत्याग्रह को कौन भुला सकता है. उस आंदोलन में सरदार पटेल ने गांधी को आने से मना कर दिया था. और यह तथ्य सब जानते हैं कि उस आंदोलन की सफलता के कारण मुहावरा भी बना, 'राजनीति का बारदोलाइकरण' समकालीन सत्याग्रह हालांकि गांधी के बाद के समय में सत्याग्रह का स्वरुप बदला लेकिन सत्याग्रह ख़त्म नहीं हुए. गांधीवादियों ने कालांतर में सत्याग्रह के मानी ही बदलने की कोशिश की और उसका वृहद रुप छोटा करके उसे संकुचित करने की कोशिश की. उदाहरण स्वरुप 1979 में सर्वसेवा संघ ने एक सत्याग्रह किया था. उसे नाम दिया गया था, 'ध्यानाकर्षण सत्याग्रह'. इसमें तत्कालीन सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ आंदोलन करने की जगह सिर्फ़ ध्यानाकर्षण की बात कही गई थी. लेकिन सत्याग्रह सिर्फ़ गांधीवादियों तक तो सीमित था नहीं. इसके कई बड़े उदाहरण हैं. एक उदाहरण है नेत्रहार का. वहाँ सरकार एक सैनिक छावनी बनाना चाहती है. हालांकि सरकार कहती रही कि वह छावनी नहीं बनाएगी लेकिन काम चलता रहता था. स्थानीय लोगों ने 1964 में इसका विरोध शुरु किया था और 1993 में इसने एक बड़ा रुप ले लिया. यह आँदोलन छिटपुट रुप से आज भी जारी है. सरकार वहाँ छावनी नहीं बना सकी है. ऐसा ही एक उदाहरण उड़ीसा के बलियापाल का है. वहाँ सरकार मिलाइल रेंज बनाना चाहती थी लेकिन स्थानीय लोगों के सत्याग्रह ने इसे बनने नहीं दिया. 1983 से 1986 तक गंधमर्दन पर्वत से बॉक्साइट निकालने का काम इसलिए नहीं हो सका क्योंकि स्थानीय लोगों ने सरकार को चुनौती दी कि ट्रकें उन्हें रौंदती हुई चली जाएँ. विदेशों में भी ऐसा नहीं है की सत्याग्रह भारत भर में सीमित रहा है. गांधी का नाम लेकर या इसके बिना भी सत्याग्रह पूरी दुनिया में हुए हैं और होते रहते हैं.
1944 से 1948 तक जब नात्सी हमले हो रहे थे, तब पूर्वी यूरोप ने जिस तरह अहिंसक नागरिक आंदोलनों से उसे रोका वह सत्याग्रह का एक बड़ा अध्याय है. तंज़ानिया में जब प्रशासन का ढाँचा बनाने की बात आई तो लोगों ने गांधी की पंचायत शैली पर ही वहाँ 'उजामा' का गठन किया गया. लुथवानिया में 1990 में एक सत्याग्रह हुआ था. और सबसे ताज़ा उदाहरण मिलता है पड़ोसी देश पाकिस्तान से जहाँ पंजाब प्रांत में चार लाख किसानों ने सैनिक सरकार को टैक्स देने से इनकार कर दिया. (सुपरिचित चिंतक और लेखक देवदत्त की विनोद वर्मा से हुई बातचीत के आधार पर) | इससे जुड़ी ख़बरें 'रामलीला हो गया है अब सत्याग्रह'24 जनवरी, 2007 | पत्रिका 'महात्मा गांधी थे सबसे बड़े प्रवासी'07 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस गांधी का अस्थिवाहक ट्रक फिर चलेगा18 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस चर्चिल की मंशा थी, 'गांधी मरें तो मरें'01 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस क्यों ग़लत लग रही है गाँधी की सीख12 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस गाँधी की प्रासंगिकता पर बहस शुरू12 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस लक्ज़मबर्ग, आतंकवाद और गाँधी | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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