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बुधवार, 24 जनवरी, 2007 को 12:48 GMT तक के समाचार
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गांधी की वापसी

महात्मा गाँधी
गाँधी ने धीरे-धीरे करके अपने आपको पूरी तरह बदल लिया
आम लोगों की तरह मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने माता-पिता के दिए इसी नाम से साथ जीवन शुरू किया था.

इसी के साथ उन्होंने बैरिस्टरी पास की. दक्षिण अफ्रीका गए. वकालत शुरू की. वकालत चल निकली. गांधी कामयाब वकील बन गए. यह एक प्रतिभाशाली युवा वकील की कामयाबी थी.

उस ज़माने में अदालती दाँवपेंच से गांधी को पाँच हज़ार पाउंड सालाना की आमदनी होती थी. यह रकम बहुत बड़ी थी. अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1905-06 में एक पाउंड में सात तोला सोना मिलता था. यानी कि गांधी न केवल कामयाब थे बल्कि लखपती भी थे.

निहत्था विरोध

गांधी को यह सब मिलकर भी कुछ न मिला हुआ लगता था. बतौर बैरिस्टर गले में टाई और तीन पीस सूट गांधी पर फबता था, पर उन्हें जँचता नहीं था.

उनका मन कहीं और था. उनका विरोध साम्राज्यवाद की दमनकारी नीतियों से था. मन में कल्पना थी उस ताक़तवर शक्ति को हाथ उठाए बिना परास्त करने की.

बात लोगों को ज़्यादा समझ में नहीं आई. ताक़त के आगे निहत्था विरोध.

कुछ को यह तजवीज़ हास्यास्पद लगी. कुछ को अनूठी. गांधी ने जोहानसबर्ग की एंपायर थिएटर बिल्डिंग भाड़े पर ली. पैसे अपनी जेब से भरे.

तारीख़ तय की 11 सितंबर 1906. लोगों को आमंत्रित किया. एक शपथ-पत्र भरने को कहा. यह कि वे अहिंसा का रास्ता अपनाकर श्वेत साम्राज्यवादी शक्ति का विरोध करेंगे.

उस समय तक इस प्रतिरोध का कोई औपचारिक नाम नहीं था. गांधी ने कई नाम सोचे, पर वे संतुष्ट नहीं थे. अंत में उन्होंने एक प्रतियोगिता आयोजित की. प्रतिरोध का नामकरण करने की. इसका नाम अंत में ‘सदाग्रह’ चुना गया. गांधी ने उसे बदलकर ‘सत्याग्रह’ किया.

तब तक वे इसे ‘जीने और मरने की कला’ कहते थे.

परिवर्तनशील व्यक्तित्व

गांधी का व्यक्तित्व शुरू से परिवर्तनशील रहा. चाहे वह पोशाक का मामला हो, भोजन का या सोच का.

कई बार गांधी के आस-पास लोगों ने इस बदलाव में भूमिका निभाई. कई बार परिस्थितियों ने.

गांधी ने ऐशोआराम की ज़िंदगी हासिल करके छोड़ दी. सत्याग्रह के लिए. साम्राज्यवाद के विरोध में. भारत लौटे तो बैरिस्टर गांधी को पीछे छोड़ आए. कपड़े एक-एक कर कम होते गए. बाना संतों जैसा हो गया.

 मृत्यु सच नहीं है. उपस्थिति का अभाव मृत्यु है. विचार कोई इमारत, पेड़, पहाड़ नहीं है. वह अनुपस्थित रहकर उपस्थित रहता है. उसकी मृत्यु नहीं होती. गांधी लौटेंगे
रामचंद्र गांधी, 1995 में

आज़ादी के बाद आई पीढ़ी को गांधी के बिंब पुराने ज़माने के लगे. चरखा, तकली, सूत, खादी. शायद उन्हें लगा कि विरोध के ये हथियार नए ज़माने में कारगर नहीं होंगे.

उन्होंने सब छोड़ दिया या उसकी ओर ध्यान नहीं दिया. उन्होंने प्रतीक देखे, उसके पीछे भी भावना नहीं देखी.

वापसी

सत्याग्रह को हथियारों की होड़ और सबसे ताक़तवर बनकर उभरने की इच्छाओं के कारगर प्रतिकार का तरीका नहीं माना. लेकिन गांधी की वापसी हुई.

इतनी ज़ोरदार वापसी की हाल के इतिहास में दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती.

नई पीढ़ी की गांधी में दिलचस्पी की वजहें कम दिलचस्प नहीं हैं. आधुनिकतम शिक्षा से लैस, टेक्नालॉजी में दक्ष और वैज्ञानिक सोच के हामी ये युवा इससे ऊपर कुछ और चाहते हैं. ज़िंदगी को नया अर्थ देना. मानीखेज बनाना. ऐसे में उनके सामने गांधी आ खड़े होते हैं.

नई पीढ़ी शायद गांधीवाद को बेहतर समझ पा रही है.

उसे अपने सवालों के जवाब गांधी के पास आसानी से मिल जाते हैं. गांधी उसे पुरातनपंथी नहीं लगते.

गांधी की वापसी सारी दुनिया में हो रही है. वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद बहुत तेज़ी के साथ.

1995 में पाँचवीं कक्षा में मैंने बच्चों से गांधी के बारे में पूछा. एक भी छात्र गांधी के बारे कुछ न बता सका. उन्हें गांधी का पूरा नाम भी नहीं मालूम था.

महात्मा गांधी
गांधी के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ रही है

मैं उस घटना से बहुत निराश था. ख़ासतौर पर इसलिए कि वह स्कूल गुजरात में था. इसलिए भी कि गांधी उस गाँव में एक रात रुक चुके थे.

लौटकर मैंने यह वाक़या गांधी के पौत्र रामचंद्र गांधी को सुनाया.

प्रोफेसर रामू गांधी ने कहा, ‘‘मृत्यु सच नहीं है. उपस्थिति का अभाव मृत्यु है. विचार कोई इमारत, पेड़, पहाड़ नहीं है. वह अनुपस्थित रहकर उपस्थित रहता है. उसकी मृत्यु नहीं होती. गांधी लौटेंगे.’’

11 साल बाद रामू गांधी की बात सही साबित हुई.

गांधी के सत्याग्रह की शताब्दी पर एक सर्वेक्षण कराया गया. राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण. यह पता लगाने के लिए कि 21वीं सदी में गांधी के विचार कितने उपयोगी रह गए हैं. गांधी को लोग किस रूप में देखते हैं. ख़ासकर युवा.

19 राज्यों में लोगों से सवाल पूछे गए. सबकी उम्र 30 साल से कम. सर्वेक्षण के नतीजे चौंकाने वाले थे.

80 प्रतिशत से अधिक युवा गांधी के बारे में जानते थे. और अधिक जानना चाहते थे. 75 फीसदी गांधी पर कुछ न कुछ पढ़ चुके थे. इससे एक प्रतिशत अधिक युवा उन्हें अपना आदर्श मानते थे.

युवाओं के आदर्शों की लंबी सूची में गांधी सबसे ऊपर थे. यह निश्चित रूप से गांधी का लौटना है.

बकौल किशन पटनायक दुनिया विकल्पहीन कभी नहीं रही. गांधी सार्थक विकल्प की तरह अब पहले से भी अधिक ज़रूरी हैं.

युवावर्ग का गांधी की ओर झुकाव ऐसे भविष्य की ओर इशारा है जिसकी ज़रूरत आने वाली नस्लों को हमसे ज़्यादा होगी.

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