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शुक्रवार, 26 जनवरी, 2007 को 10:25 GMT तक के समाचार
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गांधी के लौटने की बातें छोड़ो

महात्मा गाँधी
यह धारणा बनाई जा रही है कि महात्मा गांधी के प्रति भारत में नई रुचि पैदा हो रही है. लोग उन सब बातों को याद कर रहे हैं जो गांधी ने कहीं थीं और लोग अब उनके क़दमों पर चलना चाह रहे हैं.

हाल ही में एक अख़बार ने सर्वेक्षण करवाया और बताया कि देश में 46 प्रतिशत लोग गांधी को सबसे बड़ा ब्रांड एम्बेसडर मानते हैं.

जो अख़बार बाज़ार के लिए निकल रहे हैं, उनके लिए ब्रांड बड़ी चीज़ है. विचार, आदर्श और सिद्धांत का उनके लिए कोई मतलब नहीं है.

किसी विचार या सिद्धांत को ब्रांड में बदलना उसे बाज़ार की चीज़ बनाना है.

पूरे संसार को बाज़ार बनाकर मनुष्य के समाज को नहीं चलाया जा सकता. ऐसा गांधी जी ने भी कहा था और उनसे पहले के जितने विचारक हुए हैं, उन्होंने भी कहा था.

गांधी खड़े बाज़ार में..

लेकिन आज किसी भी प्रकार से गांधी को बाज़ार के अनुरुप बनाने की कोशिश क्यों हो रही है.

100 साल तक भारत का मध्यवर्ग इस अपराध बोध में रहा है कि जो कुछ हमारे पास खाने और मौज उड़ाने के लिए है वह हमारे देश के और लोगों के पास नहीं है और खाते, कमाते और मौज करते हुए भी उसे यह अपराधबोध था कि वह देश के सब लोगों को सुलभ नहीं है.

 पूरी 19वीं और 20वीं सदी आख़िरी आदमी को सत्ता पर बैठाने की सदी थी लेकिन 21वीं सदी की शुरुआत में आप किसकी बात करते हैं, आप प्रेमजी की बात करते हैं कि वह सबसे अमीर भारतीय है, आप लक्ष्मीनारायण मित्तल की बात करते हैं कि वह दुनिया के रईसों में तीसरे नंबर पर है. आज अचानक इस देश में पैसे वालों की बात होने लगी है

इसलिए गांधी के पहले, मार्क्स के असर से भी पहले हमारे भक्तकवियों ने ग़रीब को समाज का पैमाना बनाकर चलाने की कोशिश की.

स्वामी विवेकानंद ने क्या कहा, दरिद्र नारायण, महात्मा गांधी ने कहा कि जब तक उस आख़िरी आदमी को कुछ नहीं मिलेगा, मैं कुछ नहीं लूँगा.

इस अपराधबोध में समाज का मध्यवर्ग ग़रीब और ग़रीबों के बारे में सोचता था. आज़ादी की लड़ाई का पूरा नेतृत्व मध्यवर्ग से ही आया था और वह इस अपराधबोध का निवारण करना चाहता था.

इसलिए आज़ादी की पूरी लड़ाई के केंद्र में सबसे ग़रीब और सत्ताविहीन व्यक्ति था. यह सिर्फ़ गांधी का ही सपना नहीं था, कम्युनिस्टों का भी यही सपना था और क्रांतिकारियों का भी यही सपना था.

आज़ादी की लड़ाई का सबसे बड़ा नारा था, धन और धरती बँटकर रहेगी. यानी पूरी 19वीं और 20वीं सदी आख़िरी आदमी को सत्ता पर बैठाने की सदी थी.

लेकिन 21वीं सदी की शुरुआत में आप किसकी बात करते हैं, आप प्रेमजी की बात करते हैं कि वह सबसे अमीर भारतीय है, आप लक्ष्मीनारायण मित्तल की बात करते हैं कि वह दुनिया के रईसों में तीसरे नंबर पर है. आज अचानक इस देश में पैसे वालों की बात होने लगी है.

इसलिए इस देश का मध्यवर्ग, जो इस देश की आत्मा और चेतना की रक्षा करता था, एक तरह के वंचित होने की हीन भावना से ग्रसित हो गया है.

अब मध्यवर्ग सोचने लगा है कि दुनिया के अमीर लोग इतने सुख भोग रहे हैं और मैं इस जाहिल देश के कारण अपनी योग्यता के अनुरुप भी नहीं कमा पा रहा हूँ.

एक तरह की होड़ शुरु हो गई है और यह होड़ बाज़ार ने शुरु की है.

गांधी इस बाज़ार और इस होड़ के ख़िलाफ़ थे और उन्होंने अपनी बात साफ़-साफ़ ढंग से 1909 में हिंद स्वराज में कही थी.

गांधी उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था के ख़िलाफ़ थे और चाहते थे कि गाँवों के प्राथमिकता दी जाए. लेकिन अब तो सरकार 12 प्रतिशत विकास दर हासिल करने के लिए कोई भी और कैसी भी रियायतें उद्योग और व्यवसाय को देने को तैयार है.

लौटने के बंद रास्ते

ऐसे में जहाँ तक गांधी के लौटने का सवाल है तो उनके लौटने के रास्ते तो उस वक़्त भी खुले नहीं थे, जब ख़ुद गांधी मौजूद थे.

 आज आप गांधी की फिर से व्याख्या करके इन दोनों लड़ाइयों को फिर से शुरु कर सकते हैं. ज़रुरी नहीं कि गांधी का नाम लें या ज़रुरी नहीं कि आप कहें कि मैं गांधी के रास्ते पर चलूँगा.इसलिए गांधी की वापसी का सवाल ही अप्रासंगिक लगता है.

उन्होंने 1909 में लॉर्ड एम्टिल को एक चिट्ठी लिखी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि मैंने अब तक एक भारतीय नहीं देखा जो यह मानता हो कि अहिंसा से इस देश को आज़ाद किया जा सकता है.

अहिंसा की बात उन्होंने तब की जब 1914 से 1918 तक प्रथम विश्व युद्ध और 1939 से 1944 तक द्वितीय विश्व युद्ध की भीषण हिंसा को इस दुनिया ने देख लिया. यानी हिंसा के चरम पर वे अहिंसा की बात कर रहे थे.

जब उद्योगवाद चरम पर था जब वे कहते थे कि यह एक शैतानी व्यवस्था है. मनुष्य के मनुष्य द्वारा शोषण पर आधारित है. इसमें न्याय नहीं होगा, इसमें विषमता बढ़ेगी.

जब गांधी कह रहे थे, तब भी अहिंसा के लिए गुंजाइश नहीं थी. जब गांधी लड़ रहे थे तब भी विकेंद्रित व्यवस्था और विकेंद्रित वितरण व्यवस्था के लिए गुंजाइश नहीं थी.

फिर भी गांधी इन दोनों बातों पर टिके रहे. अगर आज आप सच्चाई से देखेंगे तो पाँएगे कि गांधी ठीक कह रहे थे.

1945 में गांधी के सिद्धांतो के अनुरुप ही संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि बातचीत से ही सारे मामले सुलझाए जाएँ और युद्ध कोई निवारण नहीं हो सकता. हर देश ने उस पर दस्तख़त किए.

वही हाल साम्राज्यवाद और नए साम्राज्यवाद का भी है.

मेरा निवेदन है कि गांधी लौटकर आएगा या गांधीवाद लौटकर आएगा ये बातें हमें छोड़ देनी चाहिए.

हमें सोचना चाहिए कि असमानता और अन्याय आज भी उतना ही है जितना की गांधी के ज़माने में था.

गांधी जी ने इससे लड़ने का एक मानवीय तरीक़ा दिया था जिसमें न हथियार उठाने की ज़रुरत है और न किसी को दुश्मन बनाने की. इसमें साफ़ है कि मैं सबको अपने विचारों से सहमत करने में लगा हुआ हूँ. हृदय परिवर्तन करने में लगा हुआ हूँ.

उसी प्रकार से संसाधनों के समान या न्यायिक वितरण का सवाल उतना ही बड़ा है जितना कि कल था.

आज आप गांधी की फिर से व्याख्या करके इन दोनों लड़ाइयों को फिर से शुरु कर सकते हैं.

ज़रुरी नहीं कि गांधी का नाम लें या ज़रुरी नहीं कि आप कहें कि मैं गांधी के रास्ते पर चलूँगा.

इसलिए गांधी की वापसी का सवाल ही अप्रासंगिक लगता है.

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