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कितना प्रासंगिक है सत्याग्रह | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यह सवाल बार-बार पूछा जाता है कि इस इक्कीसवीं सदी की बुनियादी चुनौतियों से जूझने के लिए सत्याग्रह और सत्याग्रह के दृष्टिकोण की क्या प्रासंगिकता है. आज आतंकवाद, परमाणु युद्ध के ख़तरे, इकोलाजिकल क्षरण, जलवायु में गुणात्मक बदलाव, अन्यायपूर्ण और तेज़ी से फैलता भूमंडलीकरण, उदारवादी आर्थिक नीतियों से निकलने वाले नतीजे, बढ़ती हुई ग़रीबी, ग़ैर-बराबरी और प्रजातंत्रात्मक राज्य प्रणालियों में भी नागरिक अधिकारों का सिमटना आदि बड़े सवाल दुनिया के सामने हैं. लेकिन इस सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया जा सकता कि क्या सत्याग्रह इन सवालों के लिए प्रासंगिक है क्योंकि सत्याग्रह अपने आपमें एक चौआयामी सिद्धांत है. सत्याग्रह दृष्टिकोण, सत्याग्रह का विज्ञान, सत्याग्रह की प्रौद्योगिकी और इन सबका आज का विकास स्तर क्या है. ऐसे सिद्धांत का ‘टाइगर बम’ या ‘एस्प्रिन’ की तरह तुरंत लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. इसकी सहायता से अन्य विचारधाराओं की प्रासंगिकता नहीं समझी जा सकती क्योंकि इसकी प्रासंगिकता समझने के लिए गांधी-विचार को एक अल्पकालीन और दीर्घकालीन प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए. तीन पहलू आज की स्थिति में सत्याग्रह की प्रासंगिकता के बारे में तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए. पहला- गांधी जी ने भी कहा था, "मैंने सत्याग्रह के विज्ञान को पूरी तरह से स्थापित नहीं किया. इसमे परिष्कार और सुधार की बहुत गुंजाइश है." उन्होंने कहा था, ‘‘सत्याग्रह इज साइंस इन द मेकिंग.’’ गांधी ने जितने भी प्रयोग किए वे ‘लेबोरेट्री एक्सपेरिमेंट्स’ थे. जो कि अब बड़े पैमाने पर करने पड़ेंगे. इसलिए गांधी के सत्याग्रह की परंपराएँ काफ़ी नहीं होंगी. दूसरा- सत्याग्रह और अहिंसा स्वयं में साधन भी हैं और साध्य भी. जिनकी अल्पकालीन और दीर्घकालीन उपयोगिता है. तुरंत इस्तेमाल के लिए ‘सत्याग्रही दृष्टिकोण’ अंतर्द्वंद्वों को दूर करने के लिए उपयोगी हो सकता है. सत्याग्रह का हथियार व्यवस्था की बुराइयों और विकृतियों का असर कम करने में भी इस्तेमाल कर सकते हैं. तीसरा- गांधी के प्रयोगों को परिस्थितियों के अनुसार दोहराया जा सकता है लेकिन सत्याग्रह आज की सभ्यता और समाज में निहित बुराइयों और कमज़ोरियों व समस्याओं को स्थाई रूप से दूर नहीं कर सकता है. आधुनिक औद्योगिक सभ्यता और राज्य सत्ता केंद्रित समाज में निहित हिंसा के लिए सत्याग्रह उपयोगी नहीं है. यह व्यवस्था परिवर्तन का अस्त्र है, जिसके द्वारा इस सभ्यता का विकल्प और नए समाज की रचना का प्रयास किया जा सकता है. प्रशिक्षण सत्याग्रह एक प्रयास है, एक प्रक्रिया है जिसके असरदार होने में समय लगता है. यह चूरण की गोली नहीं है.
गांधी जी ने माना था कि अहिंसक संघर्ष के लिए साधारण व्यक्तियों को शांतिपूर्ण ढंग से और अहिंसात्मक तरीकों से बुराइयों, शोषण और सत्ता के विकेंद्रीकरण के बुरे नतीजों से जूझने के लिए प्रशिक्षण की ज़रूरत है. उसी तरह जैसे हिंसक लड़ाई के लिए सिपाहियों को प्रशिक्षित किया जाता है. यह प्रशिक्षण थोड़ा बहुत तो शिविरों और संस्थाओं में दिया जा सकता है लेकिन रोज़मर्रा के अन्याय के विरोध में किए गए छोटे और बड़े संघर्ष सत्याग्रह के स्कूल और महाविद्यालय हैं. ऐसे संघर्ष नए समाज को बनाने की ज़मीन तैयार करते हैं और इन्हीं प्रयासों के बीच से नेतृत्व भी निकलता है. सत्याग्रह की हज़ारों छोटी-बड़ी लड़ाइयाँ चाहे वे असफल या सफल हों, नया समाज बनाने की तरफ एक सार्थक कोशिश हैं. आतंकवाद और सत्याग्रह सत्याग्रह की प्रासंगिकता को और गहराई से समझने के लिए आतंकवाद का उदाहरण ले लें. सत्याग्रह आज की स्थिति में आतंकवाद की चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रासंगिक भी नहीं और सक्षम भी नहीं है. राष्ट्र राज्य अकेले और मिलजुलकर आतंकवाद से और आकंतवादियों से जो सारी दुनिया में फैले व छुपे हुए हैं, लड़ रहे हैं. राष्ट्र राज्य और सत्याग्रह का समीकरण बेमेल है. उसी तरह जैसे कि आप क्रिकेट बैट से हॉकी खेलना चाहते हों. आज की सभ्यता में आतंकवाद और हिंसा बीज रूप में निहित है. जिसका आधार विज्ञान और प्रौद्योगिकी है. पिछले पचास वर्षों में जो आतंकवाद पनपा है वह आज के राज्य तंत्र, विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का नतीजा है- विशेषकर अमरीका का. इसलिए सत्याग्रह जो कि मूलरुप से जनता का अस्त्र है, राष्ट्र राज्यों द्वारा आतंकवाद के विरुद्ध इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. यह हास्यास्पद होगा कि अगर संयुक्त राष्ट्र संघ एक प्रस्ताव पास करे कि राष्ट्र राज्यों को आतंकवादियों के विरुद्ध सत्याग्रह करना चाहिए. |
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