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बुधवार, 25 अक्तूबर, 2006 को 15:48 GMT तक के समाचार
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गांधीजी को क्यों नहीं मिला नोबेल?

गांधी जी
गांधी जी नोबेल पुरस्कार के लिए चार बार नामज़द किए गए
पिछले दिनों जब वर्ष 2006 के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा हुई तो कई विशेषज्ञों ने इस पर नाक-भौं चढ़ाई क्योंकि इस बार यह पुरस्कार बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक और उसके सूत्रधार मोहम्मद युनूस को दिया गया है.

मोहम्मद युनूस ग्रामीण महिलाओं को कर्ज़ देकर उनको ग़रीबी के दलदल से निकालने के लिए संघर्ष करते रहे हैं.

आलोचकों का कहना है कि दुनिया भर में कई लोग शांति के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा कर काम कर रहे हैं.

यह लोग बरसती गोलियों और धमाकों में, आग उगलते टैंकों और मौत के साए में अपना मिशन जारी रखे हुए हैं.

लेकिन इन सबको नज़रअंदाज़ कर शांति का नोबेल पुरस्कार एक ऐसे व्यक्ति को दे दिया गया जिसे अर्थशास्त्र की श्रेणी में नोबेल पुरस्कार दिया जाना चाहिए था.

शांति के लिए नोबेल पुरस्कार का मुद्दा हमेशा से विवाद का विषय बना रहा है.

क्यों नहीं मिला नोबेल?

वर्ष 1901 से नोबेल पुरस्कार की शुरुआत के बाद अब तक यह पुरस्कार 94 लोगों को दिया जा चुका है.

लेकिन ऐसे अवसर 19 बार आये हैं जब पुरस्कार के लिए किसी को भी मुनासिब नहीं समझा गया.

इस कारण पुरस्कार किसी संस्था को दे दिया गया. रेडक्रॉस को यह पुरस्कार तीन बार दिया जा चुका है.

इधर हाल में गांधीगिरी की चर्चा के बाद यह सवाल एक बार फिर बहस का केंद्र बन गया है कि आख़िर शांति का नोबेल पुरस्कार महात्मा गांधी को क्यों नहीं दिया गया जो आधुनिक युग के शांति के सबसे बड़े दूत माने जाते हैं.

नोबेल कमेटी ने इस बात पर कभी टिप्पणी नहीं की इसिलए आम तौर पर लोगों का यह ख़्याल रहा है कि नोबेल कमेटी गांधी जी को इस पुरस्कार से सम्मानित कर अंग्रेज़ी साम्राज्य की नाराज़गी मोल लेना नहीं चाहती थी.

लेकिन हाल ही में कुछ दस्तावेज़ों से यह उजागर हुआ है कि नोबेल कमेटी पर इस तरह का कोई दबाव ब्रितानी सरकार की तरफ़ से नहीं था.

चार बार नामांकन

नोबेल
अल्फर्ड नोबेल के नाम पर ही नोबेल पुरस्कार दिया जाता है

गांधीजी को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चार बार नामांकित किया गया था.

इन्हें लगातार 1937, 1938 और 1939 में नामांकित किया गया था. इसके बाद 1947 में भी उनका नामांकन हुआ.

फिर आख़िरी बार इन्हें 1948 में उन्हें नामांकित किया गया लेकिन महज़ चार दिनों के बाद उनकी हत्या कर दी गई.

पहली बार नॉर्वे के एक सांसद ने उनका नाम सुझाया था लेकिन पुरस्कार देते समय उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

उस समय के उपलब्ध दस्तावेज़ों से पता चलता है कि नोबेल कमेटी के एक सलाहकार जैकब वारमुलर ने इस बारे में अपनी टिप्पणी लिखी है.

उन्होंने लिखा है कि वह अहिंसा की अपनी नीति पर हमेशा क़ायम नहीं रहे और उन्हें इन बातों की कभी परवाह नहीं रही कि अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ उनका अहिंसक प्रदर्शन कभी भी हिंसक रूप ले सकता है. (इसके बाद के हालात ने यह साबित किया कि इस तरह का शक बेबुनियाद नहीं था).

'अहिंसा का सबक गांधी से सीखा'

 गांधी जी की राष्ट्रीयता भारतीय संदर्भों तक सीमित रही-यहाँ तक कि दक्षिण अफ़्रीका में उनका आंदोलन भी भारतीय लोगों के हितों तक सीमित रहा
जैकब वारमुलर

जैकब वारमुलर ने लिखा है कि गांधी जी की राष्ट्रीयता भारतीय संदर्भों तक सीमित रही यहाँ तक कि दक्षिण अफ़्रीका में उनका आंदोलन भी भारतीय लोगों के हितों तक सीमित रहा.

उन्होंने कालों के लिए कुछ नहीं किया जो भारतीयों से भी बदतर ज़िंदगी गुज़ार रहे थे.

अब इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जब मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला जैसे लोगों को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे गांधी जी के रुहानी शागिर्द हैं और उन्होंने अहिंसक संघर्ष का सबक़ गांधी जी के कारनामों से सीखा है.

1947 में शांति पुरस्कारों के लिए सिर्फ़ छह लोगों को नामज़द किया गया था.

उनमें गांधी जी का नाम भी शामिल था लेकिन भारत विभाजन के बाद गांधी जी के कुछ विवादस्पद बयान जो कुछ अख़बारों में पहले ही छप चुके थे, के कारण वह शांति पुरस्कार से वंचित रह गए.

यह पुरस्कार मानवाधिकार आंदोलन क्वेकर को दे दिया गया था.

पेचीदगियाँ

गांधीजी
गांधीजी को कई बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया

1948 में ख़ुद क्वेकर ने इस पुरस्कार के लिए गांधी जी का नाम प्रस्तावित किया.

नामांकन की आख़िरी तारीख़ के महज़ दो दिन पूर्व गांधी जी की हत्या हो गई. इस समय तक नोबेल कमेटी को गांधी जी के पक्ष में पांच संस्तुतियां मिल चुकी थीं.

लेकिन तब समस्या यह थी कि उस समय तक मरणोपरांत किसी को नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जाता था.

हालांकि इस समय इस तरह की क़ानूनी गुंजाइश थी कि विशेष हालात में यह पुरस्कार मरणोपरांत भी दिया जा सकता है.

लेकिन कमेटी के समक्ष तब यह समस्या थी कि पुरस्कार की रक़म किसे अदा की जाए क्योंकि गांधी जी का कोई संगठन या ट्रस्ट नहीं था. उनकी कोई जायदाद भी नहीं थी और न ही इस संबंध में उन्होंने कोई वसीयत ही छोड़ी थी.

हालांकि यह मामला भी कोई क़ानूनी पेचीदगियों से भरा नहीं था जिसका कोई हल नहीं होता लेकिन कमेटी ने किसी भी ऐसे झंझट में पड़ना मुनासिब नहीं समझा.

तब हालत यह हो गई कि 1948 में नोबेल पुरस्कार किसी को भी नहीं दिया गया.

गवां दिया मौका

कमेटी में अपनी प्रतिक्रिया में जो कुछ लिखा है उससे यह आभास होता है कि अगर गांधी जी को अचानक मौत का सामना नहीं करना पड़ता तो उस वर्ष का नोबेल पुरस्कार उन्हें ही मिलता.

कमेटी ने कहा था कि किसी भी ज़िंदा उम्मीदवार को वह इस लायक़ नहीं समझती इसलिए इस साल का नोबेल इनाम किसी को भी नहीं दिया जाएगा.

इस बयान में ज़िंदा शब्द ध्यान देने योग्य है. इससे इशारा मिलता है कि मरणोपरांत अगर किसी को यह पुरस्कार दिया जाता तो गांधी जी के अलावा वह व्यक्ति और कौन हो सकता है.

आज यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या गांधी जी जैसी महान शख़्सियत नोबेल पुरस्कार की मोहताज थी.

इस सवाल का सिर्फ़ एक ही जवाब है कि गांधी जी की इज़्ज़त और महानता नोबेल पुरस्कार से भी बड़ी थी.

अगर नोबेल कमेटी उन्हें यह पुरस्कार देती तो इससे उसी की शान बढ़ जाती. लेकिन नोबेल कमेटी ने यह अवसर गंवा दिया.

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