दुनिया भर में बैंक विफल क्यों हो रहे हैं, क्या अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संकट क़रीब है?

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- Author, बीबीसी मुंडो
- पदनाम, .
दुनिया की बड़ी वित्तीय कॉरपोरेशंस मुश्किल में हैं. विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंक जो विफल हो जाने वाले छोटे बैंकों को मुश्किल से निकालने के लिए सामने आ रहे हैं, वो ख़ुद भंवर में फंसते नज़र आ रहे हैं जबकि दुनिया में स्टॉक मार्केट की स्थिति भी बहुत अस्थिर है. क्या आपको यह सब सुनी सुनाई बात लग रही है?
आज के हालात ने बहुत से लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट जैसी स्थिति से दोबारा दो-चार होने वाले हैं.
हालांकि अमेरिका और यूरोप में राजनेता और केंद्रीय बैंक यह विश्वास दिला रहे हैं कि उनकी वित्तीय व्यवस्था मज़बूत और स्थिर है. मगर हाल के दिनों में वैश्विक स्तर पर पूंजी निवेशकों में घबराहट साफ़ तौर पर देखी जा सकती है जिसकी वजह से दुनिया भर के स्टॉक मार्केट में, ख़ासकर बैंकिंग सेक्टर के शेयर में भारी उतार-चढ़ाव नज़र आ रहा है.
तो यह स्थिति कितनी गंभीर है और यह आपको कैसे प्रभावित कर सकती है?
बैंकों के साथ क्या हो रहा है?
स्विट्ज़रलैंड सरकार के समर्थन के साथ इन्वेस्टमेंट बैंकिंग कंपनी 'यूबीएस' ने रविवार को क्रेडिट स्विस की ज़िम्मेदारी संभाल ली है. ये दोनों बड़ी बैंकिंग कॉरपोरेशंस हैं जो दुनिया भर में पूंजी निवेश करती हैं.
स्विस बैंकिंग अपनी वित्तीय सुदृढ़ता के लिए मशहूर है. इसलिए क्रेडिट सुइस के ख़त्म होने और 'यूबीएस' के साथ उसके विलय ने यूरोपीय देश के अंदर और बाहर लोगों को हैरान किया है.
ध्यान रहे कि इससे पहले दो अमेरिकी बैंकों सिलीकॉन वैली बैंक (एसवीबी) और कोर सिग्नेचर बैंक के विफल होने के बाद वैश्विक स्तर पर घबराहट और बढ़ी थी. ये दोनों अमेरिकी बैंक टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में पूंजी निवेश की विशेषज्ञता रखते हैं.
हालांकि साल 2008 के बाद से अमेरिका में दोनों बैंकों का विफल होना बैंकिंग के क्षेत्र में बड़ी विफलता है. लेकिन ये दोनों किसी भी तरह क्रेडिट सुइस के आकार के पास भी नहीं थे जो कि दुनिया के 30 बड़े बैंकों में से एक है.
हालांकि इन बैंकों के अलावा कोई और संस्था विफल नहीं हुई है, लेकिन केंद्रीय बैंकों में ख़तरे की घंटी बजने लगी है जिसके कारण वित्तीय लेन-देन के सामान्य काम को सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त मौद्रिक तरलता (लिक्विडिटी) उपलब्ध कराने के नए क़दमों की घोषणा की गई है.
और ऐसा पिछले 23 वर्षों में केवल दो बार किया गया है. पहली बार साल 2008 के आर्थिक संकट के दौरान और फिर कोविड-19 की शुरुआत में.
इसका मक़सद लोगों का विश्वास बढ़ाना और इस बात को सुनिश्चित करना है कि बैंक अब भी उपभोक्ताओं को क़र्ज़ दें सकें और उन उपभोक्ताओं की अदायगी कर सकें जो अपनी रक़म बैंकों से निकालना चाहते हैं.

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ऐसा क्यों हो रहा है?
क्रेडिट सुइस की समस्याएं बहुत पहले से चली आ रही हैं जिनमें वर्षों से जारी रिस्क मैनेजमेंट की ग़लतियों से लेकर मनी लॉन्ड्रिंग जैसे स्कैंडल भी शामिल हैं जबकि पिछले साल होने वाले भारी नुक़सान ने इससे पहले के मुनाफ़े को बर्बाद कर दिया है.
लेकिन पिछला सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि सुइस नेशनल बैंक की ओर से उपलब्ध कराए गए 50 बिलियन डॉलर की आकस्मिक सहायता के बावजूद बैंक ने ख़ुद को अचानक नीचे की तरफ़ जाते देखा और इसके क्लाइंट्स ने अपने फ़ंड्स को दूसरे बैंकों में ट्रांसफ़र करना शुरू कर दिया.
जबकि इससे पहले विफल होने वाले दोनों अमेरिकी बैंकों की अपनी अलग ही समस्याएं थीं.
यह अजीब बात थी कि वह परिसंपत्ति जो 'एसवीबी' के लिए बेहद सुरक्षित समझी जाती थी, उसी ने उसके लिए गंभीर समस्याएं पैदा कर दीं.
वर्षों से चली आ रही सूद की कम दर का लाभ उठाते हुए संस्था ने बड़े पैमाने पर अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड्स ख़रीदे.
फ़ेडरल रिज़र्व (फ़ेड, अमेरिकी केंद्रीय बैंक) की ओर से हाल के महीनों में मुद्रा की दर में अचानक वृद्धि ने बॉण्ड्स के मूल्य को कम कर दिया.
इसके कारण हुआ यह कि अपने क्लाइंट्स के पैसों को वापस करने का भरोसा दिलाने के लिए उसे लिक्विडिटी लेने पर मज़बूर होना पड़ा, विशेषकर टेक्नोलॉजी कंपनियां जो 2021 के 'बुलबुले' के बाद इस क्षेत्र में आने वाले संकट से प्रभावित हुईं और उपभोक्ताओं की अदायगी के लिए उसे अपने बॉण्ड्स का एक बड़ा हिस्सा घाटे में और तय तारीख़ से पहले ही बेचना पड़ा.
जहां तक सिग्नेचर बैंक का सवाल है, तो वह क्रिप्टो करेंसियों के मूल्य में हाल की गिरावट की वजह से अधिक प्रभावित हुआ.
दोनों अमेरिकी बैंकों ने पाया कि उनकी बैलेंस शीट इतनी मज़बूत नहीं रही कि वह अपने उपभोक्ताओं के द्वारा जमा किए जाने वाले पैसों के भुगतान को बर्दाश्त कर सकें.
लेकिन एक सामान्य बात भी है जो कि क्रेडिट सुइस समेत तीनों संस्थाओं को प्रभावित करती है और यह आमतौर पर बैंकिंग सेक्टर में सूद की दर में तेज़ी के साथ होने वाला इज़ाफ़ा है.
दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने लगातार महंगाई को रोकने की कोशिश में करेंसी की क़ीमत में इज़ाफ़ा किया है जो कई देशों में दोहरे अंकों में अपनी उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी है.
सालों से सूद की कम दर के बाद यह वृद्धि बड़े झटके के तौर पर सामने आई है.
वो बैंक जिनके पास सरकारी बॉण्ड्स हैं, उनकी क़ीमतें सूद की दर में वृद्धि की वजह से गिर गई हैं और इस तरह उन्हें अचानक पता चला कि उनकी परिसंपत्तियों की क़ीमत कम हो गई है.
बीबीसी के फ़ाइनेंस एडिटर साइमन जैक ने इसे समझाते हुए बताया कि सूद की दर में वृद्धि ने "उन सबसे सुरक्षित पूंजी निवेश के मूल्य को भी प्रभावित किया है जिसमें बैंक अपनी कुछ रक़म रखते हैं. इसने पूंजी निवेशकों को डरा दिया है और सभी बैंकों के शेयरों के मूल्य को गिरा दिया है जिससे बैंकों को बहुत अधिक नुक़सान पहुंचा है."
वॉल स्ट्रीट पर सबसे बड़ी बैंकिंग कारपोरेशंस को सैन फ़्रैंसिस्को स्थित टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में महारत रखने वाले एक और बैंक 'फ़र्स्ट रिपब्लिक' के बचाव के लिए लिक्विडिटी उपलब्ध करानी पड़ी है.
और फ़ेडरल रिज़र्व ने माना है कि आम तौर पर अमेरिकी बैंकों को आकस्मिक ऋण देने के मामले बढ़े हैं.
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क्या यह बैंकिंग का संकट है?
विश्लेषक इस बात पर सहमत हैं कि जिस समस्या ने 2008 में पूरे बैंकिंग सिस्टम को प्रभावित किया था वह आज नहीं है.
उस समय दुनिया भर के बैंकों को अचानक पता चला कि वह अमेरिकी रियल एस्टेट मार्केट में नाकाम पूंजी निवेश का शिकार हो गए हैं.
इसके कारण सरकार को बड़े बेल आउट (संकटकालीन सहायता) करने पड़े, वित्तीय संकट पैदा हुआ और वैश्विक आर्थिक बदहाली सामने आई.
उसके बाद से बैंकों को अधिक लिक्विडिटी रखने और इस तरह के ख़तरे को कम करने पर मजबूर करने के लिए नियम लागू किए गए हैं.
ज़्यादातर विशेषज्ञों का विचार है कि अभी की समस्याओं का सीमित प्रभाव पड़ेगा.
नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल क्रुगमैन ने इस हफ़्ते एक कॉलम में लिखा कि यह साल 2023 है, साल 2008 नहीं है. "हम शायद कोई सिलसिलेवार औपचारिक आर्थिक संकट नहीं देख रहे हैं."
इसके बावजूद बैंकिंग की दुनिया बेहद पेचीदा है और व्यवस्था में नई कमज़ोरियों की तरफ़ ध्यान दिलाना मुश्किल है. जैसा कि वर्तमान ब्याज की दर और पूंजी निवेशकों के विश्वास में उतार-चढ़ाव की वर्तमान स्थिति में देखा जा रहा है.
इसके अलावा बैंकों की वित्तीय सेहत के बारे में घबराहट अक्सर महामारी की तरह होती है, और अगर एक ग्राहक अपनी जमा पूंजी के बारे में चिंता करने लगे तो वह अपने बैंक की वेबसाइट या ऐप से केवल कुछ सेकंड में अपनी रक़म निकाल सकता है.
बहरहाल, विश्वास पूरी तरह ख़त्म हुए बिना भी आर्थिक संकट की ओर इशारा करता है. हम देख सकते हैं कि रेगुलेटर्स नियमों को और कठोर बना रहे हैं और बैंक क़र्ज़ देने के लिए बहुत अधिक तैयार नहीं हैं.
यह विशेषकर इस संवेदनशील समय में विश्व की अर्थव्यवस्था को सुस्त कर सकता है जबकि बढ़ती हुई क़ीमतें उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं.

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मेरे पैसों का क्या होगा?
कम से कम अमेरिका और यूरोप में नागरिकों को अपनी बचत के संबंध में डर नहीं होना चाहिए.
यहां तक कि किसी बैंक या बिल्डिंग सोसायटी के नाकाम होने की असामान्य स्थिति में भी उनकी जमा पूंजी के लिए सुरक्षा उपलब्ध है.
अमेरिकी सरकार ढाई लाख डॉलर तक के सभी बैंक डिपॉज़िट की वापसी की गारंटी देती है.
अमेरिका में पूंजी की सुरक्षा अलग-अलग तरह के बैंकिंग प्रोडक्ट्स को कवर करती है. चेक और बचत खाते से लेकर प्रीपेड कार्ड्स और डिपॉज़िट के सर्टिफ़िकेट्स तक.
एसवीबी और सिग्नेचर बैंक के मामले में अमेरिकी सरकार ने एक और क़दम आगे बढ़ाया और ढाई लाख डॉलर तक की जमा की पूरी गारंटी दी.
लेकिन ढाई लाख डॉलर की सीमा से अधिक पर इस तरह की गारंटी नहीं है. और अगर भविष्य में कोई दूसरा बैंक फ़ेल हो जाता है तो शायद ही वह दोबारा ऐसा करें.
दूसरी तरफ़ यूरोपीय यूनियन में एक लाख यूरो की रक़म पर डिपॉज़िट प्रोटेक्शन है जबकि ब्रिटेन में यह 85 हज़ार पाउंड तक की रक़म पर मिलती है.
बहुत से विश्लेषकों का विचार है कि वर्तमान संकट के दूसरे घाटे तो हो सकते हैं, लेकिन अधिक नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा.
बीबीसी की व्यापार संवाददाता धर्शिनी डेविड कहती हैं कि मार्केट की हलचल के नतीजे जीवन के बढ़ते ख़र्चों के प्रभाव को कम कर सकते हैं.
उन्होंने ख़ासतौर पर तेल और गैस की क़ीमतों में कमी का ज़िक्र किया जो पिछले कई हफ़्तों के हंगामे के दौरान देखी गई है जिससे उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ कुछ कम हुआ है.
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