दिवालिया सिलिकॉन वैली बैंक में भारतीय स्टार्ट-अप्स ने क्यों खुलवाया था खाता?

सिलीकॉन वैली बैंक

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    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पिछले हफ़्ते से पहले भारत में बहुत कम लोगों ने शायद अमेरिका की सिलीकॉन वैली बैंक (एसवीबी) का नाम सुना हो. स्टार्ट-अप्स के बीच मशहूर इस बैंक को अमेरिकी नियामक संस्थाओं ने बंद कर दिया है.

साल 2008 आर्थिक संकट के बाद दिवालिया होने वाला सिलिकॉन वैली बैंक अमेरिका का सबसे बड़ा बैंक है. अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया राज्य के सैंटा क्लारा स्थित इस बैंक की देश में 17 शाखाएं थीं.

31 दिसंबर 2022 तक इस बैंक की कुल संपत्ति की क़ीमत 209 अरब डॉलर थी. इसके खातों में 1743.4 अरब डॉलर जमा थे.

एक रिपोर्ट के मुताबिक़, ये बैंक 2500 से ज़्यादा वेंचर कैपिटल फ़र्म्स को बैंकिंग सुविधाएं देता था. बैंक की वेबसाइट के मुताबिक़ मौसम तकनीक और सस्टेनेबिलिटी सेक्टर में इसके 1,550 से ज़्यादा प्रमुख ग्राहक थे.

शुरुआत में अमेरिकी एजेंसी एफ़डीआईसी (फ़ेडरल डिपॉज़िट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन) ने कहा कि बैंक ग्राहकों का 250,000 डॉलर का बीमा है, लेकिन अगर किसी ग्राहक के अकाउंट में उससे ज़्यादा पैसे हैं तो वो एक टोल नंबर है, उस पर फ़ोन करें.

इससे टेक उद्योग में हलचल मच गई.

परेशान होने वालों में भारतीय स्टार्ट-अप कंपनियां भी शामिल थीं. कंपनियां चिंतित थीं कि उनका खर्चा कैसे चलेगा, वो अपने कर्मचारियों को तनख़्वाह कैसे दे पाएंगी.

इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्नॉलजी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने एक ट्वीट में कहा कि वो भारतीय स्टार्टअप्स से मिलेंगे और देखेंगे कि केंद्र सरकार कैसे उनकी मदद कर पाती है.

लेकिन फिर तीन अमेरिकी संस्थाओं ने एक में कहा कि सोमवार मार्च 13 से जमाकर्ताओं के पास अपने पूरे पैसे की पहुंच होगी. इस बयान से जमाकर्ताओं की जान में जान आई.

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कैसे डूबा एसवीबी

माना जाता है कि दूसरे बैंकों की तरह एसवीबी ने भी अपने पास रखे धन का ट्रेज़री बॉन्ड्स में निवेश कर दिया.

जब तक ब्याज दर कम थी तब तक तो निवेश पर ठीक-ठाक रिटर्न्स आते रहे, लेकिन जब बढ़ती मुद्रास्फीति की वजह से अमेरिकी बैंकिग सिस्टम की सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार फ़ेडरल रिज़र्व ने दर को बढ़ाया तो बैंक के लिए मुश्किलें पेश आने लगीं.

ये वक़्त कोविड और कोविड के बाद आर्थिक गतिविधियों में परेशानियां का था.

इस दौर में स्टार्ट-अप फ़ंडिग के लिए संसाधन जुटाना भी आसान नहीं था, जिस वजह से बैंक के जमाकर्ताओं ने अकाउंट से पैसे निकालने शुरू किए.

इस कारण बैंक पर दबाव पड़ा और उसे अपने निवेश को ऐसे वक्त बेचना पड़ा जब उसके निवेश का दाम कम था.

आठ मार्च को बैंक ने कहा कि उसे निवेश की बिक्री से 1.8 अरब डॉलर का नुक़सान हुआ है.

एसवीबी

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एक सरकारी दस्तावेज़ के मुताबिक़ नौ मार्च से पहले बैंक की आर्थिक हालत अच्छी होने के बावजूद निवेशकों और जमाकर्ताओं ने नुक़सान की ख़बर से प्रभावित होकर नौ मार्च को बैंक में जमा 42 अरब डॉलर निकाल लिए जिससे बैंक की आर्थिक स्थिति पर असर पड़ा.

इस दस्तावेज़ के मुताबिक़, नौ मार्च का दिन ख़त्म होते व़क्त बैंक का कैश बैलेंस क़रीब 958 मिलियन डॉलर नेगेटिव में था.

बैंक ने इस आर्थिक स्थिति से निपटने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुआ.

ऐवटार वेंचर्स के फ़ाउंडर मोहन कुमार के मुताबिक़, बैंक इसलिए बंद हुआ क्योंकि अमेरिका में कुछ वेंचर कैपिटलिस्ट्स घबरा गए.

वो कहते हैं, "इस समस्या की जड़ (अमेरिकी बैंकिंग व्यवस्था पर निगाह रखने वाली संस्था) फ़ेड है, न कि बैंक... किसने सोचा था कि नौ महीनों में फ़ेड ब्याज दर छह या सात तक कर देगा."

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन

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भारतीय स्टार्ट अप क्यों चुनते थे इस बैंक को

अभी ये पक्के तौर पर नहीं पता कि कितने भारतीय स्टार्ट-अप इस बैंक से जुड़े थे, या फिर उन्होंने यहां कितने पैसे जमा किए थे.

किसानों की बीज से बाज़ार चुनने में मदद करने वाले स्टार्ट-अप हार्वेस्टिंग फ़ार्मर नेटवर्क के प्रमुख रुचिर गर्ग के मुताबिक़, इस बैंक से जुड़े भारतीय स्टार्ट-अप्स की संख्या 20-25 से ज़्यादा नहीं.

लेकिन किसी भारतीय स्टार्ट-अप को अमेरिका के इस बैंक में खाता खुलवाने की क्या ज़रूरत?

दरअसल, भारत में बहुत सारे स्टार्ट-अप्स का भारत से बाहर, जैसे जापान, सिंगापुर, अमेरिका आदि से फ़ंडिग आती है, और भारतीय स्टार्ट-अप प्रमुखों के मुताबिक़, जब उनके निवेशक का अकाउंट भी एसवीबी में ही है तो उनके लिए बेहतर होता है कि वो भी इसी बैंक में अकाउंट खोलें.

रुचिर गर्ग बताते हैं, "जितनी बड़ी स्टार्ट-अप हैं, बढ़ती हुई 50-60 प्रतिशत कंपनियों के अकाउंट हैं, सभी इस बैंक में हैं."

इसके अलावा अगर आपका बाज़ार अमेरिका में है तो आपको वहां का लाइसेंस लेना होगा, वहां बैंक अकाउंट खुलवाना होगा.

जानकारों के मुताबिक़, एसवीबी एक बैंक होने के अलावा वेल्थ मैनेजर, फ़ाइनेंशियल एडवाइज़र, नेटवर्कर भी था और ये स्टार्ट-अप्स का चहेता बैंक था.

रुचिर जी गर्ग बताते हैं, "बैंकिंग के अलावा ये बैंक स्टार्ट-अप्स में निवेश भी करता था. ये उन्हें ऋण भी देता था."

विनायक शर्मा
BBC
इस बैंक के साथ हमारा अनुभव अच्छा रहा है. यह हर मौके पर आपके साथ रहता है. बैंक में न्यूनतम राशि भी नहीं रखनी होती है. और वे संस्थापकों के मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाते थे.
विनायक शर्मा
संस्थापक, बाइट रिज़

सॉफ़्टवेयर प्रोडक्ट्स बनाने वाली स्टार्ट-अप 'बाइट रिज' के फ़ाउंडर और सीईओ विनायक शर्मा एसवीबी को "स्टार्ट-अप और बिज़नेस फ्रेंडली" बैंक बताते हैं जिसमें भारत में बैठ कर सिर्फ़ पासपोर्ट के आधार पर अकाउंट खुलवाया जा सकता था.

उन्हें इसे बैंक के बारे में जानने वालों से ही पता चला था, और जब बैंक डूबने की ख़बर आई तब उनके बैंक अकाउंट में बीमा की गई ढाई लाख डॉलर से कम की राशि थी.

साल 2014-15 से इस बैंक के ग्राहक रहे विनायक शर्मा कहते हैं, "हमारा उनके साथ बहुत अच्छा एक्सपीरियंस रहा है. छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बात के लिए वो हमेशा साथ रहते हैं. आपको बैंक में कोई मिनिमम बैलेंस नहीं रखना है. वो कंपनी फ़ाउंडर्स को कनेक्ट करवाएंगे, वो कार्यक्रम रखते थे. वो बहुत महत्वपूर्ण गाइडेंस देते थे."

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आगे का रास्ता

इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्नॉलजी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने एक ट्वीट में कहा कि इस संकट में भारतीय स्टार्ट-अप्स के लिए सबक है कि वो भारतीय बैंकिंग सिस्टम पर भरोसा करें.

लेकिन एक स्टार्ट अप फ़ाउंडर के मुताबिक़, बात इतनी आसान नहीं, ख़ासकर जब स्टार्ट-अप फ़ंडिंग करने वाली वेंचर कैपिटल कंपनियां भारत से बाहर हों तो आपको उनकी स्थितियों का ध्यान रखना ही होगा.

ऐवटार वेंचर्स के फ़ाउंडर मोहन कुमार के मुताबिक़, महत्वपूर्ण है कि भारतीय कंपनियां एक से ज़्यादा अकाउंट में पैसे रखें.

सिद्धार्थ पाई
BBC
ये संकट फिलहाल टल गया है क्योंकि कई स्टार्ट-अप्स ने उन बैंकों में खाते खोलने शुरू कर दिए हैं जिन्हें फेडरल रिज़र्व ने अहम वित्तीय संस्थान बताया है.
सिद्धार्थ पाई
सह-संस्थापक, 3one4 कैपिटल

3one4 कैपिटल के सह-संस्थापक और इंडियन वेंचर एंड ऑल्टरनेट कैपिटल एसोसिएशन से जुड़े सिद्धार्थ पाई के मुताबिक़, जमाकर्ताओं के पूरे पैसे वापस होने की घोषणा से अभी तो समस्या ख़त्म हो गई है.

वो कहते हैं, "संकट तो अभी रुक गया है क्योंकि कई स्टार्ट-अप्स ने अभी बड़े बैंकों के साथ अकाउंट खोलने शुरू कर दिए हैं, ख़ासकर उनके साथ जिन्हें फ़ेड ने "सिस्टमैटिकली इंपॉर्टेंट फ़ाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन" बताया है. (लेकिन) इस घाव का असर ठीक होने में सालों लगेंगे क्योंकि संस्थापक, निवेशक और बोर्ड अब बहुत सावधान हो जाएंगे."

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