सऊदी अरब और ईरान की नज़दीकी से भारत को क्या नफ़ा, क्या नुकसान

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- Author, कमलेश मठेनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
''दस सालों में भारत की विदेशनीति में हुए बड़े बदलावों में से एक भारत का खाड़ी देशों से बदलता रिश्ता भी है. भारत में बदली हुई सरकार के साथ इस क्षेत्र को ज़्यादा गहराई और रणनीतिक दृष्टि से देखा गया है.''
ये कहना था भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर का, जब उनसे यूएई, सऊदी अरब समेत अन्य खाड़ी देशों के साथ भारत के बदलते रिश्तों पर सवाल पूछा गया.
भारत का खाड़ी के देशों से कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग लगातार बढ़ रहा है. ऊर्जा और सुरक्षा के क्षेत्रों में भारत इन देशों के साथ कई पक्षों पर काम कर रहा है.
अधिकतर खाड़ी देशों के साथ भारत के अच्छे संबंध रहे हैं. इस रिश्ते में सबसे अहम है तेल और गैस का कारोबार. इसके अलावा खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयों की बड़ी संख्या और अपने घर भेजे जानी वाले पैसे भी इस रिश्ते के अहम पहलू हैं.
पिछले साल भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच 'व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता' (सीईपीए) हुआ है. सीईपीए संधि के तहत सामानों का कारोबार बढ़ाने के साथ सेवाओं का व्यापार और निवेश बढ़ाने पर भी ज़ोर दिया जाता है.
भारत सबसे ज़्यादा कच्चा तेल इराक़ से खरीदता है और उसके बाद सऊदी अरब का नंबर है. हालांकि, इस बीच रूस से भारत के कच्चे तेल के आयात में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है.
ऐसे में सऊदी अरब और ईरान के बीच बदलते रिश्तों के साथ भारत की वहां भूमिका को लेकर भी चर्चा होने लगी है.
इसी चर्चा का अहम हिस्सा चीन भी है, जिसकी सऊदी और ईरान के समझौते में प्रत्यक्ष भूमिका दिख रही है.

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क्या है सऊदी और ईरान के बीच समझौता
मध्यपूर्व में दशकों से दुश्मन रहे सऊदी अरब और ईरान के रिश्ते अब बदलते दिख रहे हैं.
दोनों देशों ने राजनयिक संबंध बहाल करने की घोषणा की है. दोनों ने दो महीने के अंदर दूतावास खोलने और एक दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करने और आंतरिक मामलों में दखल ना देने को लेकर सहमति जताई है.
चीन में दोनों देशों के प्रतिनिधियों की चार दिनों तक चली बातचीत के बाद इस फ़ैसले की घोषणा की गई है.
भारत मध्य एशियाई देशों तक संपर्क को लेकर भी ईरान से संबंध मजबूत कर रहा था. वह चाबहार पोर्ट भी विकसित कर रहा है. ईरान और सऊदी अरब दोनों ही भारत को एक मित्र राष्ट्र की तरह देखते है
शुक्रवार को इस समझौते पर ईरान के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी अली शामखेनी और सऊदी अरब के सुरक्षा सलाहकार मुसैद बिन मोहम्मद अल-एबन ने हस्ताक्षर किए. इस मौके पर चीन के शीर्ष राजनयिक वांग यी भी मौजूद थे.
उन्होंने इस समझौते को बातचीत और शांति की जीत बताया. साथ ही कहा कि चीन मुश्किल वैश्विक मसलों को सुलझाने में रचनात्मक भूमिका निभाता रहेगा.
ऐसे में भारत के संदर्भ में ये देखना अहम हो जाता है कि खाड़ी देशों में भारत के हितों, अमेरिका की घटती दिलचस्पी और चीन के प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों के बीच क्या बदलेगा.

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दो देशों की दुश्मनी के बीच संतुलन बनाता भारत
इससे पहले ईरान, सऊदी अरब, इसराइल और अमेरिका के बीच टकराव की स्थिति और भारत की मुश्किलों को समझना ज़रूरी है.

ईरान और सऊदी अरब के रिश्ते कैसे बिगड़े
- सात साल पहले ईरान और सऊदी अरब ने भारी विवाद के बाद अपने राजनयिक रिश्ते तोड़ लिए थे.
- सऊदी अरब में एक जाने-माने शिया धर्म गुरु को फांसी दिए जाने के बाद साल 2016 में रियाद स्थित सऊदी दूतावास में ईरानी प्रदर्शनकारी घुस आए थे.
- इसके बाद से सुन्नी बहुल सऊदी अरब और शिया बहुल ईरान के बीच भारी तनाव रहा है.
- सऊदी अरब और ईरान के बीच आधुनिक प्रतिद्वंद्विता 1979 में ईरान की क्रांति के ठीक बाद शुरू हुई थी. तब ईरान ने सभी मुस्लिम देशों में राजशाही को हटा धर्म का शासन लागू करने का आह्वान किया था.
- 1981 में इराक़ ने ईरान पर हमला किया जिसमें सऊदी अरब ने इराक़ का साथ दिया.
- फिलहाल दोनों देश सीरिया, यमन, लेबनान और लीबिया में आपस में उलझे हुए हैं.

इन देशों की उलझन में अमेरिका और इसराइल के हितों ने स्थितियों को और पेचीदा कर दिया है.
क्योंकि भारत के दोनों देशों से हित जुड़े हुए हैं इसलिए भारत को अपनी विदेश नीति में बेहद संतुलन बनाकर चलना पड़ा है.
लेकिन, जानकारों की मानें तो फिलहाल भारत के लिए स्थितियां थोड़ी अनुकूल दिख रही हैं क्योंकि भारत के दो दोस्त जो पहले आपसी दुश्मन थे, अब दोस्त बन रहे हैं. भारत की दुविधा कुछ कम हो सकती है.
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पश्चिम एशिया के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं, ''ईरान और सऊदी अरब के द्विपक्षीय संबंधों का खाड़ी देशों में और पूरी दुनिया पर असर हुआ. दो देशों की द्विपक्षीय समस्याएं वैश्विक समस्या बन गई. इसमें दूसरे देश भी शामिल हो गए जैसे मिस्र, तुर्की ,रूस और चीन भी अप्रत्यक्ष तौर पर शामिल हो गए.''
''जहां तक भारत का सवाल है तो ईरान के परमाणु कार्यक्रम के चलते अमेरिकी दबाव के चलते भारत को अपना व्यापार कम करना पड़ा. धीरे-धीरे जब ये मामला और उलझता गया तो भारत खाड़ी के देशों से गहरे संबंध बनाने लगा जैसे यूएई, सऊदी अरब और बहरीन. वहीं, ईरान भारत से दूर होता गया और चीन से उसकी नज़दीकी बढ़ी.''
एके पाशा कहते हैं, ''ये भारत के लिए मुश्किल तो रहा लेकिन इससे उसका कुछ खास नुक़सान अभी तक नहीं हुआ है. पर अगर पाकिस्तान में सैन्य शासन आता है या अफ़ग़ानिस्तान में कुछ और बदलाव होता है तो भारत-ईरान संबंधों पर असर होगा.''

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चीन की भूमिका
हालांकि, एके पाशा ईरान और सऊदी अरब के हालिया फ़ैसले पर तुरंत निष्कर्ष निकालने को ठीक नहीं मानते. वह कहते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के इन राजनयिक संबंधों को कुछ अरसे तक देखना होगा. इसके तात्कालिक प्रभाव तो भारत पर नज़र नहीं आते. ये अच्छा कदम है. पर भारत को इस बात पर सोचना चाहिए कि चीन ने इसका फ़ायदा उठाया है.
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर साउथ एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर संजय के. भारद्वाज अरब देशो में चीन की बढ़ती भूमिका को भारत के लिए ध्यान देने का विषय तो मानते हैं लेकिन उनका ये भी कहना है कि मौजूदा बदलाव में चीन की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर आंका जा रहा है.
वो कहते हैं, ''सऊदी अरब और ईरान के बीच बातचीत में चीन के अहम भूमिका निभाने की बात कहना पूरी तरह सही नहीं है. सऊदी अरब और ईरान अपने रिश्तों को सुधारने की कोशिश पिछले तीन-चार से कर रहे हैं. अनौपचारिक तौर पर बातचीत चल रही है. लेकिन, अब इसे औपचारिक रूप देना था तो बात आगे बढ़ाई गई है.''
प्रोफ़ेसर भारद्वाज बताते हैं, ''एशिया में भारत एक बहुत महत्वपूर्ण देश है. भारत भी सऊदी अरब और ईरान के लिए तेल और प्राकृतिक गैस के लिए उतना ही बड़ा बाज़ार है जितना की चीन का. भारत की अर्थव्यवस्था भी 6-7 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है. ''
''भारत मध्य एशियाई देशों तक संपर्क को लेकर भी ईरान से संबंध मजबूत कर रहा था. वह चाबहार पोर्ट भी विकसित कर रहा है. ईरान और सऊदी अरब दोनों ही भारत को एक मित्र राष्ट्र की तरह देखते हैं और कश्मीर पर नरम रुख अपनाते हैं.''
वह कहते हैं, ''यहां चीन और भारत दोनों के अपने रणनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक हित हैं. इनमें वैसा टकराव नहीं जो भारत के पड़ोसी देशों में चीन और भारत के बीच दिखता है.''
''पड़ोसी देशों के मामले में भारत को क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर सीधी चुनौती मिलती है. लेकिन, खाड़ी देशों के सुरक्षा को लेकर अपने समीकरण हैं. अगर चीन मध्यपूर्व में प्रभाव बढ़ा रहा है तो ऊर्जा क्षेत्र में प्रतियोगिता बढ़ेगी लेकिन बाकी निवेश के मौके दोनों देशों के लिए बराबर रहेंगे.

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भारत के लिए कहां है चुनौती
जानकारों का मानना है कि भारत और खाड़ी देश के बीच भारत की व्यवस्थागत समस्याएं और राजनीतिक समीकरण भी अहम हो जाते हैं और यहां पर भारत के हाथ कुछ हद तक बंध जाते हैं.
एके पाशा कहते हैं, ''चीन बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के ज़रिए अपना प्रभाव और व्यापार बढ़ा रहा है, जो भारत को भी करना चाहिए लेकिन भारत के पास उतनी पूंजी नहीं है जितनी चीन के पास है. चीन राजनीतिक प्रभाव भी प्रत्यक्ष तौर पर इस्तेमाल कर सकता है जो भारत नहीं करना चाहता. भारत अमेरिका और इसराइल को नाराज़ नहीं करना चाहता है. चीन ऐसा कर सकता है क्योंकि उसका अमेरिका के साथ सीधा तनाव है.''
वहीं, संजय के भारद्वाज कहना है कि भारत को डिलवरी करने में थोड़ा ज़्यादा समय लग जाता है क्योंकि ये एक लोकतांत्रिक देश है, चीन की तरह फ़ैसले नहीं ले सकता है. इसलिए कोई भी फ़ैसला लागू करने में देरी रहती है. इसमें चीन थोड़ा फायदा उठा लेता है.

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पाकिस्तान की भूमिका
इस्लामिक देशों और चीन की बात हो तो पाकिस्तान को भूमिका को नकारा नहीं जा सकता. चीन को इस्लामिक देशों के नज़दीक लाने में पाकिस्तान अहम कड़ी साबित हुआ है.
सऊदी और ईरान के बीच समझौते के बाद पाकिस्तान ने कहा कि इलाक़े में शांति और स्थायित्व के लिए पाकिस्तान योगदान देता रहेगा. पाकिस्तान ने इसके लिए चीन की सराहना भी की. ऐसे में पाकिस्तान-चीन की जोड़ी भारत के लिए क्या चुनौती बनेगी?
इस पर संजय के भारद्वाज मानते हैं कि पाकिस्तान की फिलहाल तो चीन से नज़दीकी बनी हुई लेकिन बाद में इस्लामिक देशों में उसकी अहमियत कम भी हो सकती है.
वो कहते हैं, ''पाकिस्तान को सऊदी अरब का वरदहस्त प्राप्त है. परमाणु शक्ति संपन्न होने के चलते सऊदी इसे इस्लाम के लिए एक सुरक्षा कवच मानता है. लेकिन, खाड़ी देशों के भारत के साथ नज़दीकी बढ़ने से इसमें बदलाव आया है.''
''वहीं, चीन अगर ईरान और सऊदी अरब के नज़दीक आता है तो पाकिस्तान का महत्व कम होता चला जाएगा. चीन ने पहले खाड़ी देशों में एक समानांतर समूह खड़ा करने की रणनीति बनाई थी. इसमें तुर्की, मलेशिया और ईरान साथ आ रहे थे. अब ईरान और सऊदी अरब के बीच ही तनाव ख़त्म हो जाएगा तो पाकिस्तान की भूमिका अपने आप कम हो जाएगी.''
हालांकि, अभी जानकार सऊदी अरब और ईरान के संबंधों को और परखने पर ज़ोर देते हैं. उनके मुताबिक दोनों देशों के इतिहास को देखते हुए ये बदलते रिश्ते अनिश्चितता की स्थिति मैं हैं.
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