सऊदी अरब ख़ुद पर हमला क्यों नहीं रोक पा रहा

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको के ठिकानों पर ड्रोन हमले को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी है. ट्रंप ने कहा कि जिसने हमला किया है उसके बारे में उन्हें पता है. अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा कि जवाबी कार्रवाई इसकी पुष्टि के बाद की जाएगी.
ट्रंप ने ट्वीट कर कहा, ''सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमले हुए हैं. हम जिसे दोषी मान रहे हैं उस पर भरोसा करने के कारण हैं. हम सऊदी का इंतज़ार कर रहे हैं कि वो इस हमले को कैसे देख रहा है. इसके बाद हम फ़ैसला लेंगे कि आगे क्या करना है.''
ट्रंप के ट्वीट को इस रूप में देखा जा रहा है कि अमरीकी सेना कार्रवाई कर सकती है. शनिवार को सऊदी के तेल ठिकानों पर हमले के बाद से तनाव काफ़ी बढ़ गया है.
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ट्रंप ने इतनी आक्रामक भाषा का इस्तेमाल जून में किया था जब उन्होंने ईरान पर हमले की योजना को टाल दिया था. तब ईरान ने अमरीकी ड्रोन को मार गिराया था. शनिवार को सऊदी के सबसे अहम तेल ठिकानों पर हमला हुआ जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति में पाँच फ़ीसदी आपूर्ति बाधित हो गई है. इस हमले की ज़िम्मेदारी यमन के हूती विद्रोहियों ने ली है लेकिन इन्हें ईरान का समर्थन हासिल रहा है.
हमले के एक दिन बाद अमरीका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने ईरान को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया था. उन्होंने कहा था कि इसके कोई सबूत नहीं हैं कि हमला यमन से हुआ है. इससे पहले ये कहा जा रहा था कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी से मिल सकते हैं.

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अमरीका में कहा जा रहा है कि सऊदी के जिन तेल ठिकानों को निशाने पर लिया गया है, उससे लगता नहीं है कि हमला यमन से हुआ है. कहा जा रहा है हमला शायद इराक़ या ईरान की तरफ़ से हुआ है. सीएनएन से अमरीकी अधिकारियों ने कहा है कि हमले में सऊदी के 19 ठिकाने प्रभावित हुए हैं और ये 10 ड्रोन से संभव नहीं है. हूती ने दावा किया था कि हमले के लिए 10 ड्रोन भेजे थे. सीएनएन से उस अधिकारी ने कहा, ''आप 10 ड्रोन से 10 ठिकानों के निशाने पर नहीं ले सकते.''
सीएनएन से अधिकारियों ने सैटेलाइट इमेज साझा किया है. इसके ज़रिये कहा जा रहा है, ''सारे ठिकाने उत्तर-पश्चिम के प्रभावित हुए हैं जो कि यमन से निशाना बनाना बहुत मुश्किल है.''
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि ड्रोन ईरान या इराक़ से आए लेकिन इसे आधिकारिक तौर पर नहीं कहा जा रहा है. सीएनएन के सैन्य विशेषज्ञ रिटायर्ड कर्नल सेड्रिक लीगटन ने कहा, ''यह बहुत रणनीतिक हमला है. इसे इस तरह से प्लान किया गया कि रडार की पकड़ में ड्रोन नहीं आए. जिन ठिकानों को निशाने पर लिया गया, वो काफ़ी अहम हैं. यह कोई सरकार ही कर सकती है न कि विद्रोही समूह. ये ड्रोन या तो ईरान से आए या इराक़ से.''

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ईरान की प्रतिक्रिया
ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने सऊदी पर हमले का ज़िक्र नहीं किया लेकिन ईरान प्रेस पर एक संबोधन में कहा कि अमरीका इलाक़े में युद्ध अभियान चला रहा है और इसी के तहत सऊदी और संयुक्त अरब अमीरात को हथियार और ख़ुफ़िया मदद मुहैया करा रहा है. रूहानी ने कहा, ''इस इलाक़े में जो आज हो रहा है वो चिंताजनक है. इससे पहले रविवार को व्हाइट हाउस की सीनियर काउंसलर केलनी कोनवे ने कहा था कि राष्ट्रपति ट्रंप के पास इसे लेकर कई विकल्प हैं.''
केलनी से फ़ॉक्स न्यूज़ ने पूछा कि क्या ट्रंप अब भी रूहानी के साथ बैठक करने को तैयार हैं? इस पर केलनी ने कहा कि अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में रूहानी के साथ बैठक का वादा नहीं किया है. केलनी ने कहा कि ट्रंप ने केवल संभावना की बात कही थी.
इराक़ ने रविवार को इस बात से स्पष्ट रूप से इनकार किया है कि सऊदी के तेल ठिकानों पर हमले में उसकी ज़मीन का इस्तेमाल किया गया. इराक़ के प्रधानमंत्री अब्देल अब्दुल महदी के दफ़्तर जारी बयान में कहा गया है कि सरकार इस बात को लेकर प्रतिबद्ध है कि कोई भी संविधान का उल्लंघन कर इलाक़े की शांति को बाधित नहीं कर सकता है.

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जापान के रक्षा मंत्री तारो कोनो ने कहा है कि सऊदी पर हमले से तेल देश में तेल आपूर्ति बाधित हुई है. कोनो ने कहा कि इस हमले के कारण तेल की क़ीमत भी बढ़ गई है. जापान सऊदी से अपनी खपत का 40 फ़ीसदी तेल जापान से आयात करता है. उन्होंने कहा कि इस हमले से तेल की आपूर्ति लंबे समय तक प्रभावित हो सकती है.
सीएनएन की एक रिपोर्ट के अनुसार हूती के ड्रोन ईरानी मॉडल पर आधारित हैं और ये उत्तर कोरियाई तकनीक से बने हैं. ज़्यादातर कम दूरी (300 किलोमीटर) की क्षमता वाले हैं. हालांकि संयुक्त राष्ट्र के एक्सपर्ट के एक पैनल ने जनवरी में रिपोर्ट दी थी कि लंबी दूरी वाले ड्रोन से हूती सऊदी और यूएई के भीतर हमला कर सकता है.

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सऊदी इतना बेबस क्यों?
यमन मध्य-पूर्व का एक छोटा-सा ग़रीब देश है. इसके ख़िलाफ़ अरब के अमीर देश सालों से यु्द्ध कर रहे हैं. यमन के ख़िलाफ़ सऊदी अरब इस युद्ध का नेतृत्व कर रहा है.
सऊदी के पास यमन में उसके दुश्मनों की तुलना में ज़्यादा बेहतर हथियार हैं, लेकिन हैरान करने वाली बात है कि वो इस युद्ध को जीतने के बजाय लगातार उलझता जा रहा है.
आख़िर ऐसा क्यों है? सऊदी के पास पैसे की कमी नहीं है, अत्याधुनिक हथियार हैं फिर भी उसकी सेना यमन से युद्ध क्यों नहीं जीत पा रही है?
सऊदी अरब के लिए बड़ी चुनौती है कि वो तेल के बेशुमार पैसे को आर्मी की ताक़त के रूप में तब्दील करे.
सऊदी के बारे में कहा जाता है कि वो पैसे से सब कुछ नहीं ख़रीद सकता. इसलिए यह बात भी कही जाती है कि वो धनवान तो है पर बलवान नहीं.
मध्य-पू्र्व मामलों के विशेषज्ञ क़मर आगा कहते हैं कि सऊदी की सेना बहुत कमज़ोर है. उसे कोई ट्रेनिंग नहीं है कि अत्याधुनिक हथियारों को चला सके.

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वो कहते हैं कि ''इसकी एक मुख्य वजह ये भी है कि सऊदी का शाही परिवार इस बात से डरा रहता है कि आर्मी मज़बूत हुई तो तख्तापलट भी हो सकता है. इसलिए सऊदी अपनी सुरक्षा और सेना की ज़रूरतों के लिए अमरीका और पाकिस्तान पर निर्भर रहता है.''
यमन के ख़िलाफ़ लड़ाई में सऊदी कितना खर्च कर चुका है इसकी जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है. लेकिन पिछले दो सालों में सऊदी के कुल विदेशी धन में 200 अरब डॉलर की गिरावट से साफ़ है कि उसे जमकर आर्थिक नुक़सान हो रहे हैं.
सऊदी अरब ने यमन में मार्च 2015 में हस्तक्षेप शुरू किया था. सऊदी के नेतृत्व वाले सैनिकों ने हवाई हमले शुरू किए थे और छोटी संख्या में ज़मीन पर भी अपने सैनिकों को भेजा था.
वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट में इराक़, ईरान और फ़ारस की खाड़ी के सैन्य और रक्षा विशेषज्ञ माइकल नाइट्स का कहना है, ''यह सच है कि ईरान सऊदी से सैन्य ताक़त के मामले में आगे है.''
वो कहते हैं, ''ईरान की सेना में आपको कोई ऐसा नहीं मिलेगा जो ज़मीन पर कहता हो कि उसे सऊदी की सेना से डर लगता है. इसे यमन में सऊदी के सैन्य हमले से भी समझा जा सकता है. कई सालों से युद्ध जारी है, लेकिन सऊदी को कुछ हासिल नहीं हुआ.''
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