ईरान के सामने क्या मजबूर हैं सऊदी-अमरीका

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- Author, जोनाथन मार्कस
- पदनाम, कूटनीतिक संवाददाता
सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको के ठिकानों पर 14 सितंबर को ड्रोन हमला हुआ. हूती विद्रोहियों ने इसकी ज़िम्मेदारी ली.
लेकिन अमरीका ने कहा कि इस हमले के पीछे ईरान है और ईरान ने इससे इनकार कर दिया.
सऊदी अरब के सबसे अहम तेल ठिकानों पर नाटकीय हमले के बाद काफ़ी आक्रमक बयान आ रहे हैं.
वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए काफ़ी अहम सऊदी अरब के इन तेल ठिकानों पर हमले से काफ़ी नुक़सान हुआ है. सऊदी अरब की वायु सेना को अमरीका का समर्थन हासिल है. यमन में हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ हवाई हमलों में सऊदी अरब को अमरीका की भी मदद मिलती रही है. लेकिन इस बार सऊदी अरब के विरोधियों ने इस हमले से दिखा दिया है कि वो अपने दम पर सक्षम हैं.
इस हमले के बाद एक बार फिर से वो बहस ज़िंदा हो गई है कि ईरान हूती विद्रोहियों को किस हद तक तकनीक और अन्य मदद पहुंचा रहा है. खाड़ी में पहले से ही माहौल गर्म था और इस हमले के बाद हालात और तनावपूर्ण हो गए हैं.

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हमले से उठे सवाल
ट्रंप प्रशासन की घोषित नीति ईरान पर 'अधिकतम दबाव' बनाने की है. लेकिन इस हमले ने ट्रंप प्रशासन की कुछ नाकामियां भी उजागर कर दी हैं.
दावों और प्रतिदावों के बीच, अब भी बहुत कुछ है जो हम नहीं जानते. हूती विद्रोही सऊदी ठिकानों को निशाना बनाने के लिए पहले भी ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल कर चुके हैं.
लेकिन ड्रोन हमलों को सीमित सफलता ही मिली थी. लेकिन इस हमले में जितने सटीक रूप से लक्ष्य को निशाना बनाया गया और जिस स्तर पर इसे अंजाम दिया गया, उससे यह बिल्कुल अलग स्तर का हमला बन गया.

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तो क्या वाक़ई ये हमलावर ड्रोन थे जिनसे हमला किया गया, या फिर ये मिसाइल हमला था? और अगर ये मिसाइल हमला था तो सऊदी अरब के हवाई रक्षा सिस्टम को इसकी भनक कैसे नहीं लगी?
क्या ये हमले हूती विद्रोहियों के नियंत्रण वाले इलाक़ों से किए गए या कहीं और से? क्या इराक़ में मौजूद ईरान समर्थक समूह इसमें शामिल हो सकते हैं? या फिर ईरान की इसमें सीधी भूमिका हो सकती है?

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अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने ईरान की ओर उंगली उठाने में देर नहीं की, यहां तक कि कोई ख़ुफ़िया जानकारी उपलब्ध होने से पहले ही उन्होंने यह आरोप लगा दिया.
ईरान ने हूती विद्रोहियों के साथ अच्छे रिश्ते क़ायम किए हैं और इसमें शक नहीं कि उसने उन्हें लंबी दूरी तक वार करने की क्षमता हासिल करने में मदद की है. चाहे वह यूएवी (हमलावर ड्रोन) हो या मिसाइलें.
2018 में संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों के एक पैनल की रिपोर्ट ने हूती के क़ासिफ़-1 हमलावर ड्रोन और ईरान के अबाबील-टी में समानता की ओर इशारा किया था. एक विस्तृत अध्ययन की रिपोर्ट में कहा गया था कि ईरान ने यमन के ख़िलाफ़ हूती विद्रोहियों को कई तरह के हथियार मुहैया कराए हैं.
कुछ ऐसा ही निष्कर्ष एक स्वतंत्र संगठन कॉन्फ्लिक्ट आर्ममेंट रिसर्च ऑर्गेनाइज़़ेशन की मार्च 2017 रिपोर्ट में दिया गया था. यह रिपोर्ट में ईरान की ओर से हूती विद्रोहियों को हमलावर ड्रोन मुहैया कराए जाने पर थी.

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लंबी दूरी तक वार करने के तरीक़े
हालांकि क़ासिफ़-1 और अबाबील-टी की रेंज 100-150 किलोमीटर से ज़्यादा नहीं है जबकि खुराइस ऑइल फील्ड यमनी सीमा से 770 किलोमीटर दूर है. तो अगर यह हमला ड्रोन से हुआ है तो यह बिल्कुल अलग डिज़ाइन, क्षमता और शक्ति वाला ड्रोन था.
ईरान और संभवत: हूती विद्रोहियों के पास भी लंबी दूरी तक वार करने के तरीक़े हैं लेकिन यमन संघर्ष में इसके इस्तेमाल के बहुत कम सबूत उपलब्ध हैं. यह हमला किसी तरह की क्रूज़ मिसाइल से भी किया जा सकता है जो इराक़ या ईरान से दागी गई हो, लेकिन किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए प्रामाणिक ख़ुफ़िया जानकारी की ज़रूरत होगी.
हालांकि कुछ दिन बाद बारीक़ ब्यौरों से इतना फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. कूटनीति के स्तर पर नुक़सान हो चुका है. अमरीका और सऊदी अरब ईरान के कट्टर दुश्मन हैं.
जिब्राल्टर से ईरानी तेल लेकर आ रहे जहाज़ की गिरफ़्तारी के बाद ईरान भी ब्रिटिश झंडे वाले एक टैंकर को खुलेआम सीज़ कर चुका है.

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'अधिकतम दबाव'
तो सऊदी अरब के तेल ठिकानों के ख़िलाफ़ हूती विद्रोहियों के रणनीतिक अभियान में जगह-जगह ईरानियों की उंगलियों के निशान मौजूद नज़र आते हैं.
सवाल है कि अमरीका अब इस बारे में क्या करने जा रहा है या क्या कर सकता है?
इसका जवाब हो सकता है- ज़्यादा कुछ नहीं. ट्रंप प्रशासन सऊदी अरब की ओर मज़बूती से खड़ा है जबकि अमरीका में यमन युद्ध की अलोकप्रियता बढ़ती जा रही है.
कैपिटल हिल में ये भावना बढ़ रही है कि सऊदी अरब का यमन में हवाई अभियान बेमतलब है जो पहले से कंगाल देश को एक मानवीय आपदा वाले क्षेत्र में बदल रहा है.
लेकिन तेल ठिकानों के ख़िलाफ़ हमलों से एक नई चीज़ सामने आई है. सऊदी अरब को पूर्ण सहयोग और ईरान पर अधिकतम दबाव की रणनीति के बावजूद ट्रंप प्रशासन ईरान को मिले-जुले संकेत दे रहा है.

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डोनल्ड ट्रंप आगामी संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान ईरानियों के साथ एक आमने-सामने की बैठक की इच्छा रखते हैं और हाल ही में उन्होंने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन को पद से हटाया है. बोल्टन ईरान में सत्ता परिवर्तन के हिमायती रहे हैं.
ईरान अपने हूती सहयोगियों के साथ ताक़तवरों के ख़िलाफ़ कमज़ोरों का युद्ध लड़ रहा है. रणनीतिक पाठ्यपुस्तकों में इसे 'हायब्रिड कॉन्फ्लिक्ट' कहते हैं. वह कुछ रणनीतियां रूस की किताबों से ले रहा है. मसलन, साफ़ इनकार कर देना, गुपचुप युद्ध, साइबर ऑपरेशन और सूचना युद्ध.
ईरान जानता है कि डोनल्ड ट्रंप अपनी तमाम धमकियों और अनिश्चितताओं के बावजूद अमरीकी सेनाओं को सैन्य उलझनों से निकालना चाहते हैं, साथ ही नई उलझनों से भी बचाना चाहते हैं. इसीलिए ईरान 'अधिकतम दबाव' बनाने में सक्षम हो गया है.
यह ख़तरा बरक़रार है कि इसका ग़लत अनुमान एक बड़े संघर्ष को जन्म दे सकता है जो कोई नहीं चाहेगा.
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