यमन में बुरी तरह घिरता जा रहा है सऊदी अरब?

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- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सऊदी अरब के दो तेल संयंत्रों पर शनिवार को हुए हमले के बाद से पूरे इलाक़े में तनाव की स्थिति बन गई है.
हमले की ज़िम्मेदारी हूती विद्रोहियों ने ली थी. लेकिन अमरीका ने इसके लिए ईरान को ज़िम्मेदार बताया है.
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने हूती विद्रोहियों के इन दावों को ख़ारिज कर दिया है कि उन्होंने सऊदी तेल कंपनी अरामको के संयंत्रों को निशाना बनाया.
सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री के मुताबिक़ इस हमले की वजह से कच्चे तेल का उत्पादन प्रतिदिन 57 लाख बैरल तक घट गया है. विश्लेषकों की राय है कि इससे दुनिया भर में तेल के दाम पर असर होगा.
ड्रोन हमले के ज़रिए अबक़ीक़ और ख़ुरैस के तेल संयंत्रों को निशाना बनाया गया.
पोम्पियो ने हमले के लिए सीधे तौर पर ईरान को ज़िम्मेदार बताते हुए ट्विटर पर लिखा है कि ऐसे कोई 'सबूत नहीं' हैं कि ड्रोन यमन से आए थे.
सऊदी अरब की अगुवाई वाले गठबंधन ने बीते क़रीब चार साल से यमन के हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ संघर्ष छेड़ा हुआ है. सऊदी अरब लगातार आरोप लगाता रहा है कि ईरान हूती विद्रोहियों का समर्थन कर रहा है. हालांकि, ईरान इससे इनकार करता रहा है.
पोम्पियो के ताज़ा दावों पर ईरान ने खारिज कर दिया है. समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार ईरान के विदेश मंत्रालय ने अमरीका के लगाए आरोपों से इनकार किया है.
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैय्यद अब्बास मुसावी ने एक बयान जारी कर कहा, "इस तरह के आरोप बेबुनियाद और बेमतलब हैं."
उन्होंने कहा कि इस आरोपों के साथ भविष्य में ईरान के ख़िलाफ़ कदम उठाने के लिए ज़मीन तैयार की जा रही है.
मौजूदा दौर में ईरान और अमरीका के रिश्तों में कड़वाहट बढ़ती जा रही है. वहीं, मध्यपूर्व में सऊदी अरब, अमरीका का क़रीबी सहयोगी है.

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अमरीका-सऊदी के दावों में कितना दम?
सऊदी अरब की सरकारी मीडिया के मुताबिक़ क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से टेलीफ़ोन पर बातचीत की और बताया कि उनकी सरकार 'इस आतंकवादी हमले से निपटने की इच्छुक और समर्थ है.'
खाड़ी देशों की कूटनीतिक हलचल पर नज़र रखने वाले कई विशेषज्ञ दावा करते हैं कि सऊदी अरब को इस क्षेत्र में ईरान का दबदबा कभी रास नहीं आता. वो हूती विद्रोहियों को ईरान की ओर से मदद किए जाने के सऊदी अरब के दावों पर भी सवाल उठाते हैं.
दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर एके पाशा दावा करते हैं कि तमाम आरोपों के बाद भी सऊदी अरब हूती विद्रोहियों को ईरान की ओर से मदद मिलने का सबूत नहीं दे सका है.
एके पाशा बताते हैं, "ईरान हूती विद्रोहियों का समर्थन कर रहा है, ये बात सिर्फ प्रोपैगैंडा है. अभी तक वहां न एक भी ईरान का सैनिक पकड़ा गया है, न उनके हथियार पाए गए हैं. सऊदी अरब की इजाज़त के बिना एक भी जहाज़ वहां जा नहीं सकता. हर तरफ नाकेबंदी है. हवाई अड्डे भी उन्हीं के निंयत्रण में हैं. फिर ईरान उनकी किस तरह से मदद कर रहा है. यमन के पूर्व राष्ट्रपति अली सालेह ने जो हथियार रूस और चीन से हासिल किए थे, वो हूतियों के हाथों में पहुंच गए हैं. वो उन्हें लगातार इस्तेमाल कर रहे हैं."

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ईरान के दबदबे से परेशानी
वहीं, मध्यपूर्व मामलों के जानकार क़मर आग़ा दावा करते हैं कि ईरान का इस क्षेत्र के कई देशों पर असर है और रूस जैसे देश चाहते हैं कि ये असर बना रहे.
"ईरान का सीरिया में बहुत बड़ा प्रभाव नज़र आता है. इराक़ में भी असर नज़र आता है. लेबनान में भी उसका प्रभाव नज़र आता है और अगर यमन भी उधर चला जाता है, तो स्थिति काफी बदल सकती है. ये पूरा इलाका बहुत अहम है. इराक़, ईरान, सीरिया, लेबनन और यमन. ये पूरा इलाका तेल से डूबा हुआ है. बेशुमार तेल है इन देशों के अंदर. बड़े देशों के यहां हित हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भी हित हैं."
प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं कि ईरान का दबदबा सऊदी अरब को रास नहीं आता और उसे अपना अस्तित्व खतरे में दिखता है. उसकी नज़र यमन के तेल और गैस भंडारों पर भी हैं.

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'लड़ाई सऊदी अरब और यमन के बीच'
पाशा दावा करते हैं कि यमन की मौजूदा स्थिति के लिए कहीं न कहीं सऊदी अरब की पुरानी चाहत ज़िम्मेदार है, जिसके तहत वो यमन पर दबदबा बनाना चाहता है.
एके पाशा कहते हैं, "असल लड़ाई सऊदी अरब और यमन के लोगों के बीच में है. सदियों से सऊदी अरब उन पर दबदबा बनाना चाहता है. उन पर नियंत्रण करना चाहता है. उनकी प्रगति रोकना चाहता है. उन्हें अपने कब्जे या प्रभाव में लाना चाहता है."
पाशा, याद दिलाते हैं कि उत्तर और दक्षिण यमन को मिलाकर 1990 में अस्तित्व में आए मौजूदा देश के पहले भी यमन का एक इतिहास रहा है. उत्तरी यमन पर कुछ वक्त तक ऑटोमन साम्राज्य का अधिकार रहा और दक्षिणी यमन पर क़रीब 130 साल तक ब्रिटेन का अधिकार रहा.

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क्यों फेल हुए हादी?
दोनों हिस्सों के एक होने के बाद भी अलगाव की भावना ख़त्म नहीं हुई. एके पाशा कहते हैं कि साल 2011 की अरब के बाद यमन में राजनीतिक स्थितियां बदलीं.
"2011 में जब लीबिया, ट्यूनीशिया, मिस्र और सीरिया में अरब क्रांति (अरब स्प्रिंग) हुई. गद्दाफी, हुस्नी मुबारक और ट्यूनीशिया के सदर का तख्तापलट किया गया, उस दौरान यमन में भी काफी बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए. जिसके तहत अली अब्दुल्लाह सालेह को पद छोड़ना पड़ा. उन्होंने उपराष्ट्रपति अब्दरबू हादी को सत्ता सौंप दी. हादी को संयुक्त राष्ट्र अभी भी वैध राष्ट्रपति के तौर पर मान्यता देता है."
लेकिन, हादी के लिए सरकार चलाना आसान नहीं था. उन्हें सालेह के वफादारों से निपटना था तो अलक़ायदा और इस्लामिक स्टेट (आईएस) के कथित बढ़ते प्रभाव को भी रोकना था. लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी मुश्किल बना शिया विद्रोही हूती मूवमेंट. हूती विद्रोहियों ने हादी की कमज़ोरियों का फायदा उठाया और उत्तर और पश्चिम के ज़्यादातर इलाके पर कब्जा कर लिया.

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साल 2015 में हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया और हादी को सऊदी अरब में शरण लेनी पड़ी.
हूती विद्रोहियों ने मोहम्मद अल हूती की अगुवाई वाली सरकार गठन किया लेकिन अंतराष्ट्रीय समुदाय इसके बजाए हादी सरकार को ही यमन की सरकार के तौर पर मान्यता दी.
मार्च 2015 में सऊदी अरब की अगुवाई में बने आठ देशों के गठबंधन ने हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ हवाई हमले शुरू कर दिए. इस गठबंधन को अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस ने भी मदद मुहैया कराई.
एके पाशा कहते हैं, "अमरीका पर दबाव डालकर एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाया गया जिसमें सऊदी अरब, यूएई और दूसरे देश भी शामिल थे. खुफिया सूचना, ट्रेनिंग, हथियार ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका मुहैया कराते रहे. यूएई और सऊदी अरब ने अपना काम बांट लिया. दक्षिणी यमन में यूएई की दिलचस्पी थी और उत्तर में सऊदी अरब की."

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यमन में अमरीका की भी दिलचस्पी
यमन में इन तमाम देशों के दखल के पीछे इनके अपने हित हैं. पाशा कहते हैं कि सोमालिया में सैन्य ठिकाने नहीं बना सका अमरीका यमन को विकल्प के तौर पर देखता है. यमन की रणनीतिक स्थित भी इसकी अहमियत बढ़ा देती है.
एके पाशा कहते हैं, "लाल सागर और हिंद महासागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाले जलडमरूमध्य पर यमन स्थित है. ये इलाका बहुत महत्वपूर्ण है. यहां से दुनिया का दो तिहाई तेल गुजरता है. एशिया से यूरोप और अमरीका जाने वाले जहाज भी जाते हैं. ये व्यापार और शिपिंग के लिए महत्वपूर्ण इलाका है. ये सबसे व्यस्त रूट है."
कमर आग़ा कहते हैं कि यमन में दिलचस्पी ब्रिटेन, खाड़ी और अरब देशों की ही नहीं बल्कि चीन और रूस की भी है.

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यमन में तबाही के निशान
पहले गृह युद्ध और बीते चार साल से गठबंधन सेना के हमले झेलते हुए यमन की सूरत बदल गई है.
क़मर आग़ा कहते हैं, "हालात दिन-ब-दिन बद से बदतर होते जा रहे हैं. वहां लोगों के पास खाने को नहीं है. वहां बीमारी और महामारी फैल रही है. लोग मर रहे हैं. मानवाधिकारों के उल्लंघन बहुत ज्यादा हो रहे हैं. कभी बारात पर बमबारी हो जाती है. कभी स्कूल और कभी अस्पताल के ऊपर बम गिराए जाते हैं."
संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 2016 के बाद संघर्ष में वहां कम से कम 10 हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है. एजेंसियां मरने वालों का आंकड़ा 70 हज़ार तक भी बताती हैं.
जो ज़िंदा हैं जंग के ताप में वो भी झुलस रहे है. संघर्ष की वजह से यमन की पूरी आबादी कराह रही है. ये सबसे गरीब देशों में गिना जाने लगा है.

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संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ देश की करीब 80 फीसद आबादी यानी 2 करोड़ 40 लाख से ज्यादा लोगों को मानवीय मदद, या फिर संरक्षण की दरकार है. इनमें से एक करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनके पास खाने का सामान और पीने के लिए साफ पानी तक नहीं है. 33 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं.
देश का स्वास्थ्य ढांचा चरमरा चुका है. पांच साल से कम उम्र के चार लाख से ज़्यादा बच्चे गंभीर कुपोषण का शिकार हैं. कुल आबादी के 20 लाख बच्चों समेत 30 लाख लोग कुपोषित हैं.
बीते सालों में महामारी का रूप लेने वाले हैज़े के चपेट में आकर हज़ारों लोगों की मौत हो चुकी है.

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दलदल में फंसा सऊदी अरब
लेकिन झटके सऊदी अरब और उनके सहयोगियों को भी कम नहीं लगे. कमर आग़ा कहते हैं कि सऊदी अरब अनचाहे दलदल में फंस गया है.
"मुझे नहीं लगता कि सऊदी अरब के यमन को लेकर जो उद्देश्य हैं, वो पूरे होते दिख रहे हैं. सऊदी अरब के सामने दिक्कत है कि तेल के दाम कम हो गए हैं. आमदनी उनकी कम हो गई है. जंग का खर्चा बेइंतहा बढ़ गया है. लेकिन वो पीछे नहीं हट सकते क्योंकि हूती अब नहीं मानेंगे."
उधर, एके पाशा यमन के इतिहास की याद दिलाते हुए कहते हैं कि यमन के लोग हमेशा से अपने देश पर कब्ज़ा करने की कोशिश करने वालों को भगाते रहे हैं. इसी जज्बे के दम पर उन्होंने कुछ हफ़्तों में जंग ख़त्म करने का दावा करते रहे सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को हैरान किया हुआ है.
एके पाशा के मुताबिक, "सऊदी अरब ने कुछ हासिल नहीं किया. अपने हथियार गंवाए और अपनी छवि गंवाई. क्राउन प्रिंस सलमान ने वादा किया था कि दो हफ़्तों में या दो महीनों में जंग ख़त्म कर देंगे. वो अब वहां ज़मीन चाट रहे हैं. उनकी काफी बदनामी हुई है. उनका साझेदार यूएई भी अलग-थलग हो गया है."

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दबाव में सऊदी अरब
पाशा दावा करते हैं कि हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के हवाई अड्डों और अहम ठिकानों पर हमलाकर उन्हें दबाव में दिया है.
एके पाशा कहते हैं, "उनके पास ऐसी तकनीक पहुंच गई है कि जिसके जरिए सऊदी अरब के अंदर लगातार हर दिन हज़ारों की संख्या में ड्रोन भेज रहे हैं. उससे काफी नुकसान हो रहा है. खाड़ी से लाल सागर तक जाने वाली पाइप लाइनें, पेट्रो कैमिकल प्रतिष्ठान, एयरपोर्ट और बाकी आधारभूत ढांचे को भी उन्होंने काफी नुकसान पहुंचाया है."
लड़ाई के दबाव के बीच अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस को भी घर में विरोध का सामना करना पड़ रहा है. मानवाधिकार संगठन लगातार सवाल उठा रहे हैं. सऊदी अरब की अगुवाई वाला गठबंधन भी अब दरकने लगा है.
एके पाशा बताते हैं, "संयुक्त अरब अमीरात सात अमीरात का फेडरेशन है. यहां से यमन में जो लोग लड़ने गए उनमें से सबसे ज्यादा लोग फुजैहरा से थे.वहां के लोग गरीब और पिछड़े हैं. उनके काफी लोग वहां हताहत हुए और ये जंग वहां काफी अलोकप्रिय हो गई. दुबई के शासक शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम ने अबू धाबी के क्राउन प्रिंस को चेतावनी दी कि सऊदी अरब के अंदर हवाई अड्डे और दूसरे ठिकानों पर हूती जो बमबारी कर रहे हैं, अगर एक दो मिसाइल या बम दुबई में दाग दिए तो यहां का पूरा कबाड़ा हो जाएगा."
"यूएई में विद्रोह हो गया. ईरान ने खाड़ी बहुत जल्दी तीन चार तेल के टैंकरों पर भी कब्ज़ा कर लिया. अमीरात के ख़िलाफ हूती विद्रोहियों ने बमबारी करने की जो धमकी दी थी, वो बहुत अहम साबित हुई. अमीरात के दूसरे हुक्मरानों ने मिलकर अबूधाबी पर दबाव डाला और यमन से बाहर आने का फैसला हुआ. हालांकि ट्रेनिंग के लिए फौज अदन में मौजूद है."

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क्या है समाधान?
अदन को हादी सरकार ने राजधानी बनाया हुआ है. हालांकि हादी देश के बाहर ही हैं. सऊदी अरब ने यमन की लाइफ लाइन कहे जाने वाले हुदैदा बंदरगाह की नाकेबंदी की हुई है लेकिन जंग ख़त्म होने के आसार नहीं दिखते.
कमर आग़ा कहते हैं, "जंग शुरू तो की जा सकती है, ख़त्म करना बड़ा मुश्किल होता है. यहां कई और ताकतें हैं और इनमें से कई एक दूसरे के ख़िलाफ हैं. वो जंग ख़त्म भी नहीं होने देती हैं. मुझे नहीं लगता कि कोई भी इसमें जीत पाएगा. ये जंग ख़त्म करना बड़ा मुश्किल काम है. काफी कोशिश की गई है. स्वीडन में कोशिश हुई. हमें लग रहा था कि शायद संघर्ष विराम हो जाएगा लेकिन फिर हालात बिगड़ गए."
स्वीडन में हूती प्रतिनिधियों और हादी सरकार के बीच समझौते की कोशिश के बाद भी संघर्ष विराम नहीं हो सका. हालांकि, पाशा कहते हैं फिलहाल उम्मीद की एक किरण दिखाई देती है.
"धीरे धीरे आशा नज़र आ रही है और इसकी वजह है ईरान और फ्रांस के राष्ट्रपति मैंक्रों की ओर से किए जा रहे प्रयास. वहां संघर्ष विराम होने की उम्मीद है."
यमन ध्वस्त हो चुका है. यूएई जंग से बाहर निकलने की तैयारी में है और सऊदी अरब भी थक चुका है लेकिन अब भी कोई ये दावा नहीं कर सकता है कि यमन की जंग कब रुकेगी. ख़ासकर शनिवार के ताज़ा घटनाक्रम के बाद से स्थिति और भी बिगड़ती दिख रही है.
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