45 मिनट के राष्ट्रपति, जिन्हें अमरीका के साथ तनाव के कारण देना पड़ा इस्तीफ़ा

45 मिनट के राष्ट्रपति

इमेज स्रोत, INAH

    • Author, डैरियस ब्रूक्स
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ वर्ल्ड

इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसी कहानियां हैं जिन्हें सुनकर आज भी हैरानी हो जाए. ऐसा ही किस्सा है पेड्रो लस्कुरिन के मेक्सिको के राष्ट्रपति बनने का, जो इस पद पर सिर्फ़ 45 मिनट के लिए रहे.

मेक्सिको के नेता पेड्रो लस्कुरिन सन् 1913 में देश के राष्ट्रपति बने और महज़ 45 मिनटों में ही उन्होंने अपना इस्तीफ़ा संसद में पेश कर दिया.

इतिहास में पेड्रो लस्कुरिन अब तक पहले और आख़िरी नेता हैं जिन्होंने इतने कम समय के लिए राष्ट्रपति पद संभाला हो. इस वाकये को गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया है.

दशकों तक लस्कुरिन को "फ्लीटिंग प्रेजिडेंट" यानी कुछ देर के राष्ट्रपति जैसे नाम दिए गए.

लेकिन फ़रवरी 1913 में जो हुआ उसकी जांच से पता चलता है कि कैसे एक अच्छी शिक्षा प्राप्त लेकिन थोड़ा कम राजनीतिक अनुभव वाला राजनेता 1910 से 1920 के बीच मैक्सिको की क्रांति के दौरान हुई अप्रत्याशित संघर्षों का शिकार हो गया.

इतिहासकार ग्रैज़ेलिया अल्तामिरानो ने बीबीसी मुंडो को बताया, "उन्हें 45 मिनट के लिए सत्ता संभालने को लेकर जाना जाता है. ये किसी राष्ट्रपति के लिए सबसे कम समय तक संभाला गया पद है. हालांकि, कोई भी चांसलर के तौर पर उनके कार्यकाल की ओर नहीं देखता."

लस्कुरिन से जुड़ी निजी फ़ाइलों को पढ़ने वाले कुछ शोधकर्ताओं में से एक अल्तामिरानो कहते हैं, "उन्होंने अमरिका के साथ संबंधों में सबसे मुश्किल दौर के वक्त अहम भूमिका निभाई थी. उस समय मेक्सिको में हेनरी लेन विल्सन अमरीका के राजदूत थे, जिन्हें मैक्सिको के इतिहास में सबसे बुरा अमरीकी राजदूत माना जाता है."

केवल 45 मिनट के लिए राष्ट्रपति पद को संभालना, उस धोखे को भी दिखाता है, जिसने हमेशा लस्कुरिन को परेशान रखा.

एक अन्य शोधकर्ता इतिहासकार गुआदलुप विला के अनुसार, "ये एक ऐसा कलंक है जिसे भी मिटाया नहीं जा सकता और इस प्रकरण के बाद उन्होंने अपने जीवन के कई साल खुद को सही ठहराने और लोगों को ये बताने में बिताए कि आख़िर वास्तव में क्या हुआ था."

45 मिनट के राष्ट्रपति

इमेज स्रोत, INAH

इमेज कैप्शन, पेड्रो लस्कुरिन सिर्फ़ 45 मिनट के लिए मेक्सिको के राष्ट्रपति रहे

वो दस दिन

पेड्रो लस्कुरिन जिस समय मेक्सिको के राष्ट्रपति बने, वे देश के लिए सबसे मुश्किल दिन थे. 1913 में 9 से 19 फ़रवरी के बीच ही राष्ट्रपति फ्रैंसिसो आई. मदेरो के ख़िलाफ़ सैन्य तख़्तापलट हुआ और उनके हाथ से सत्ता गई.

इस पूरे घटनाक्रम को "ट्रैजिक टेन" के नाम से जाना जाता है.

उस साल, मदेरो की सरकार के ख़िलाफ़ सैन्य शासन मुखर होने लगा था. मदेरो मेक्सिको के 30 सालों के इतिहास में पहली बार लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर सत्ता में पहुंचे थे. उनसे पहले जनरल पोरफ़िरियो डियाज़ ने देश पर तीन दशक तक राज किया.

सेना और सरकार के बीच जारी संघर्ष के दौरान अपने गहरे राजनीतिक मकसदों के लिए पहचाने जाने वाले मेक्सिको में अमरीकी राजदूत हेनरी एल. विल्सन ने सिलसिलेवार तरीके से मेक्सिको में रह रहे अमरीकी नागरिकों और उनके कारोबार की सुरक्षा से जुड़ी कई मांगे रखीं.

उस समय लस्कुरिन विदेश मंत्री थे. इस नाते विल्सन की मांगों और गतिविधियों के कारण उनपर सबसे ज़्यादा दबाव था. विल्सन कई बार खुलेआम तत्कालीन राष्ट्रपति मदेरो का इस्तीफ़ा तक मांगा था और मेक्सिको में सैन्य कार्रवाई की धमकी भी दी थी.

इतिहासकार अल्तामिरानो कहते हैं, "विदेश मंत्री के तौर पर उनकी भूमिक सबसे अहम रही, क्योंकि ये वो समय था जब मेक्सिको के इतिहास में कोई राजदूत पहली बार खुलेआम सैन्य कार्रवाइयों की धमकियां दे रहा था."

दशक भर पहले ही मेक्सिको का आधे से ज़्यादा क्षेत्र पड़ोसी देश के पास जा चुका था. इसलिए अमरीका की धमकियों को वहां गंभीरता से लिया जा रहा था.

अल्तामिरानो कहते हैं, "फ़रवरी में जब संघर्ष बढ़ा तो विल्सन के साथ ही उस समय मेक्सिको में मौजूद बाकी देशों के राजदूतों में राष्ट्रपति के इस्तीफ़े को ही समाधान का एकमात्र रास्ता बताया."

वॉशिंगटन की मंज़ूरी लिए बिना ही, राजदूत विल्सन ने अपने सहयोगी राजदूतों को ये जानकारी दे दी थी कि मेक्सिको की सीमा पर पहले से ही अमरीकी सैनिक तैनात हैं.

अल्तामिरानो ने बताया, "उस समय विल्सन ने बाकी राजदूतों से कहा था कि सैनिकों को इसलिए तैनात रखा गया है क्योंकि ख़तरा है. अगर राष्ट्रपति इस्तीफ़ा नहीं देते तो हमला किया जाएगा. हमें राष्ट्रपति का इस्तीफ़ा लेना ही होगा."

45 मिनट के राष्ट्रपति

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, मदेरो 20वीं सदी में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए मेक्सिको के पहले राष्ट्रपति थे

वो चर्चित 45 मिनट...

मदेरो ने उस समय आरोप लगाया था कि जनरल विक्टोरियानो हुअर्ता देश में बढ़ते संघर्ष की जड़ हैं. जनरल विक्टोरियानो राष्ट्रपति मदेरो के समर्थक नहीं थे.

हालांकि, बाद में ये बात सबके सामने आ गई कि जनरल विक्टोरियानो ने जनरल फ़ेलिक्स डियाज़ (पूर्व राष्ट्रपति पोरफ़िरियो डियाज़ के भतीजे) और अमरीकी राजदूत विल्सन के साथ मिलकर मदेरो को राष्ट्रपति पद से हटाने के लिए साजिश रची थी. उनका मकसद था कि कुछ समय के लिए ही सही लेकिन सत्ता उनके हाथ में आ जाए.

उन्होंने इसे "एंबेसी पैक्ट" नाम दिया.

इस मक़सद को पूरा करने के लिए लस्कुरिन का इस्तेमाल किया गया. लेकिन उन्हें इस बारे में ज़रा भी भनक नहीं थी.

18 फ़रवरी, 1913 को जब समर्थकों और विद्रोहियों के बीच संघर्ष जारी ही था, तब मदेरो और उनके उपराष्ट्रपति जोसे मारिया पीनो सुआरेज़ को जनरल हुअर्ता के बलों ने पकड़ लिया.

मेक्सिको राष्ट्रपति

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, एंबेसी पैक्ट को अमरीकी राजदूत रहे हेनरी एल. विल्सन की ही रणनीति का हिस्सा माना जाता है.

सबकुछ अपने ख़िलाफ़ देखकर और अपने पतन को भांपते हुए अगले ही दिन राष्ट्रपति ने अपना इस्तीफ़ा लिखकर विदेश मंत्री लस्कुरिन को दिया और उसे संसद पहुंचाने के लिए कहा.

इसके बदले में दोनों नेताओं ने सुरक्षित तौर पर देश से बाहर भेजे जाने की शर्त रखी.

इतिहासकार विला कहते हैं, "मदेरो और पीनो सुआरेज़ दोनों के ही जीवन पर ख़तरा पहले से ही था. उनसे विक्टरियानो हुअर्ता ने वादा किया लेकिन बावज़ूद इसके दोनों को मौत की सज़ा दी गई."

लस्कुरिन ने संसद में मदेरो के इस्तीफ़े को पढ़ा और इसके बाद, उस समय के संविधान के मुताबिक, ये उनपर निर्भर था कि वे सरकार चलाना चाहते हैं या नहीं.

और इस तरह से लस्कुरिन उस समय राष्ट्रपति बन गए.

मेक्सिको तख्तापलट

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, जनरल विक्टरियानो हुअर्ता

हुअर्ता के साथ समझौते पर भरोसा रखते हुए, लस्कुरिन ने विद्रोही जनरल को गृह मंत्री बनाया और महज़ 45 मिनट के भीतर अपना इस्तीफ़ा भी सौंप दिया.

हालांकि, बाद में हुअर्ता ही मेक्सिको के नए राष्ट्रपति बने.

इस बीच 22 फ़रवरी को मदेरो और सुआरेज़ को लेकंबरी जेल के बाहर कत्ल कर दिया गया. ऐसा बताया गया कि दोनों ने जेल से भागने की कोशिश की जिसके कारण उनकी हत्या करनी पड़ी.

लस्कुरिन को उस समय मदेरो का "ग़द्दार" बताया गया.

अल्तामिरानो बताते हैं, "ये बहुत ही विवादास्पद है और इसको लेकर कई परस्पर विरोधी विचार हैं. कुछ ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि लस्कुरिन बेहद भोले थे और राजदूत विल्सन ने उनका फ़ायदा उठाया. कुछ कहते हैं कि हुअर्ता ने उनका इस्तेमाल किया."

ग़द्दार थे लस्कुरिन?

लस्कुरिन उस स्थिति को अच्छे से जानते थे, जिसमें उन्होंने अपना इस्तीफ़ा लिखा.

इस्तीफ़े में अमरीकी हमले के ख़तरे का हवाला देते हुए उन्होंने लिखा, "जो घटनाएं हम देख रहे हैं उन्होंने मुझे ऐसी स्थिति में ला दिया है कि मैं क़ानून के दायरे में रहते हुए वो कदम उठाऊं जिससे हालात सुलझ सकें अन्यथा इससे देश के अस्तित्व के लिए संकट पैदा हो जाएगा."

45 मिनट के राष्ट्रपति

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, लस्कुरिन को हुअर्ता सरकार में शामिल नहीं किया गया था.

लेकिन अल्तामिरानो के पास जो दस्तावेज़ हैं वे ये संकेत देते हैं कि कैसे कम समय के लिए राष्ट्रपति बनने वाले लस्कुरिन को पता था कि उनकी लोकप्रियता कम हो गई है.

अल्तामिरानो बताते हैं, "लस्कुरिन अपने घर पर हताश-निराश होकर लौटे और एक पत्र लिखा. इसमें वो कहते हैं कि मुझे बुरी तरह धोखा दिया गया. मैं जिस राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को बचाने की कोशिश कर रहा था, उन्होंने मुझे धोखा दिया."

वो बताते हैं, "कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि उन्हें इस्तीफ़ा नहीं देना चाहिए था. लेकिन चैंबर सैनिकों से घिरा हुआ था. उन्हें धमकी दी गई थी. वहां पहले से ही लोग पेन लेकर इस्तीफ़े पर उनके हस्ताक्षर करने का इंतज़ार कर रहे थे. सबकुछ पहले ही तय था."

इतिहासकार गुआदलुपे का मानना है कि उस समय क्या हुआ इसका विश्लेषण करने की ज़रूरत है क्योंकि सबकुछ "एक ही आदमी पर निर्भर नहीं करता."

वो कहते हैं, "ये एक बड़ी साजिश थी. और सच्चाई ये है कि हेनरी एल. विल्सन का हस्तक्षेप वास्तव में घृणा के लायक था."

45 मिनट के राष्ट्रपति

इमेज स्रोत, Getty Images

विदेश में ख़ुद को निर्वासित रखने के बाद, लस्कुरिन मैक्सिको लौटे और जीवन के कई साल अपने नाम पर लगे धब्बे को साफ़ करने की कोशिश में बिता दिए.

विला बताते हैं, "उन्हें लगातार कई सफ़ाई देनी पड़ी, क्योंकि बहुत से लोग उन्हें ग़द्दार मानते थे."

"शायद वो थोड़े भोले थे, क्योंकि उन्होंने दूसरों के कहे पर भरोसा किया. एक राजनेता बनने के लिए आपका बहुत तेज़ होना ज़रूरी है और यही वो नहीं बन सके."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)