कैसे बंद होगा जेलों में ड्रग्स का इस्तेमाल?- दुनिया जहान

बात दो महीने पहले की है. 31 अक्तूबर की रात थी. स्कॉटलैंड के हाई सिक्योरिटी जेल में सब कुछ सामान्य दिनों की तरह ही था.
क़रीब आधी रात को अचानक हालात बिगड़ने लगे. पहले एक कैदी बेहोश हुआ, फिर दूसरा और फिर तीसरा. अधिक नशा करने के कारण एक ही दिन में छह कैदियों को अस्पताल में भर्ती कराया गया.
अगले दिन इसी जेल से तीन और कैदियों को अस्पताल पहुंचाया गया. तीन सप्ताह बाद पास की एक और जेल से 20 और कैदियों को अस्पताल में भर्ती कराया गया.
अमेरिकी सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2001 से लेकर 2018 के बीच राज्यों की जेलों में नशे से होने वाली मौतों में 611 फीसदी इज़ाफा हुआ है. एक शोध में पाया गया था कि जेलों से छूट कर आने वालों में मौतों की एक बड़ी वजह ड्रग ओवरडोज़ था.
भारतीय जेलों में भी नशे के कारण कैदियों की मौत कोई नई ख़बर नहीं. 2020 में दिल्ली के तिहाड़ जेल में ड्रग्स पाए गए थे जिसके बाद इस मामले की जांच शुरू की गई थी. हालांकि इससे पहले यहां नशे के कारण कैदियों की मौत की ख़बर आती रही है.
जेलों में ड्रग्स केवल स्कॉटलैंड या अमेरिका के जेलों की समस्या नहीं है. दुनियाभर में न्याय व्यवस्था इस सवाल से जूझ रहा है कि जेलों में अवैध तरीके से पहुंच रहे ड्रग्स पर रोक कैसे लगाई जाए.
कई मुल्कों की जेलों में नशीले पदार्थों का लेनदेन बढ़ा है. जेलों से ड्रग्स को बाहर रखना एक तरह से असंभव हो गया है. तो बीबीसी दुनिया में इस सप्ताह पड़ताल इसी सवाल की जेलों में ड्रग्स को पहुंचने से कैसे रोका जाए.

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नशा और नशे से मुक्ति
स्टूअर्ट जे कोल लेखक हैं और लंदन में नशामुक्ति कार्यकर्ता हैं. लंबे वक्त तक उन्होंने जेलों में नशे की लत छोड़ना चाह रहे कैदियों के साथ काम किया है. वो कहते हैं कि वो खुद छोटी उम्र में नशा करने लगे थे.
वो कहते हैं, "मुझे जन्म के बाद छोड़ दिया गया था. मैं इग्लैंड में नर्सरी में रहा फिर अनाथालय में. बाद में मुझे मेरी दादी के पास जमैका भेज दिया गया. वहां पर हिंसा का माहौल था. मैंने अपने दोस्त की मौत देखी जिसे चोरी के दौरान चेहरे पर गोली लगी."
अपराध के एक मामले में स्टूअर्ट को सज़ा मिली और वो सेंट लूशिया की जेल पहुंचे. उन्हें लगा कि जेल में उनकी ज़िंदगी बेहतर हो सकेगी, लेकिन ऐसा नहीं था. वहां जेलों के भीतर ड्रग्स मिलना आम था.
वो कहते हैं, "अगर आप चीज़ें रिपोयर करना जानते हैं तो आपको ड्रग्स मिल सकता था. मैंने लोगों के लिए कविताएं लिखना शुरू किया. रोज़ेज़ आर रेड, वायलेट्स आर ब्लू, आई मिस यू, होप यू मिस मी ठू... जैसी सामान्य कविताएं. लोग कहते- ये अंग्रेज़ी जानता है. और मुझे ड्रग्स मिल जाता."

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दो साल बाद स्टूअर्ट जेल से छूटे और ब्रिटेन पहुंचे. वक्त के साथ वो अपनी ज़िंदगी की कमान अपने हाथों में लेना सीख गए. अब वो दूसरों को नशा छोड़ने के लिए प्रेरित करते .
लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आख़िर ड्रग्स जेल के भीतर कैसे पहुंचता है.
स्टूअर्ट कहते हैं, "हम उस मुमकिन तरीके से जो आप सोच सकते हैं. मेरे हिसाब से अगर बाहरी दुनिया में किसी से आपका मिलना-जुलना है, आप लिखकर या फिर तकनीक के ज़रिए किसी तक संदेश पहुंचा सकते हैं तो आपको जेल में भी ड्रग्स मिल सकता है. मिठाईयों के बीच में ड्रग्स भरकर पहुंचाने के बारे में आपको पता होगा."
ऐसा है तो फिर ड्रग्स को जेलों तक पहुंचने से रोका कैसे जाए?
वो कहते हैं, "निजी तौर पर मैं मानता हूं कि आप जेलों में ड्रग्स रोक नहीं सकते. अगर जेल में रहने वालों को ड्रग्स चाहिए तो वो हासिल कर लेते हैं. जेल के जो हालात होते है उसमें कैदी अपने नियम खुद बना लेते हैं. मैंने नशामुक्ति अभियान देखे हैं. कुछ कैदी जानबूझ कर इसमें शामिल होते हैं क्योंकि वो यहीं पर ड्रग्स का लेनदेन करते हैं."
स्टूअर्ट मानते हैं कि जेलों में ड्रग्स के ख़िलाफ़ जंग तभी जीती जा सकती है जब इस समस्या को व्यापक तौर पर देखा जाए और कैदियों को ऐसे बीमार समझा जाए जिन्हें मदद की ज़रूरत है.
समाधान कैसे हो
मार्टिन हॉर्न पेन्सिल्वेनिया सुधार विभाग के सचिव रह चुके हैं. पेन्सिल्वेनिया के गवर्नर ने उन्हें राज्य के जेलों में ड्रग्स से जुड़ी जानकारी इकट्ठा करने को कहा था.
वो कहते हैं, "हमने ड्रग्स का पता लगाने के लिए एक बड़ा अभियान चलाया. हमने एक ही दिन सभी कैदियों के बालों के नमूने लिए और उनकी फोरेन्सिक जांच की. पता चला कि कम से कम 10 फीसदी कैदी या तो नशे में थे या फिर उन्होंने बीते 30 दिनों में नशा किया था. उस वक्त जेलों में क़रीब 30 हज़ार कैदी थे."
अब मार्टिन के लिए सबसे बड़ा काम ये पता करना था कि आख़िर जेल के भीतर ड्रग्स आता कैसे है. इसके लिए उन्होंने दो कदम उठाए. पहला, जेल के भीतर आने वाले सभी सामान की जांच और दूसरा कैदियों के फ़ोन कॉल्स की निगरानी के लिए क़ानून में बदलाव की गुज़ारिश.
अगर ये पता चल सके कि ड्रग्स कौन पहुंचाता है और कौन इसे खरीदता है, तो इस पर लगाम लगाना आसान था.
वो कहते हैं, "हर फ़ोन पर एक नोटिस दिया गया कि इससे किए जाने वाले हर कॉल की निगरानी होगी, अगर आप ऐसा नहीं चाहते तो इसका इस्तेमाल न करें. बात करने वाले दोनों ही पक्षों को ये जानकारी दी जाती थी. ये एक बड़ा बदलाव था."
"हमने ये देखना शुरू किया कि कौन कितना खर्च करता है, किसके अकाउंट में ज़्यादा पैसे हैं. कैदियों के परिवारवाले उनको पैसे भेजते थे, वो खुद भी काम कर के पैसे कमाते थे. इससे वो जेल की कैंटीन से सामान खरीद सकते थे. हमने देखना शुरू किया कि कैदी कहां पैसा खर्च कर रहे हैं. हमने पाया कि कई कैदी एक ही जगह पैसा भेज रहे थे."
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जेल के भीतर आने वाले ड्रग्स को पकड़ने के लिए उन्होंने स्निफर कुत्ते रखना शुरू किया. इस बीच कैदियों की जांच भी जारी रही.
मार्टिन कहते हैं, "अगर किसी का टेस्ट पॉज़िटिव आता तो वो हमारे लिए जानकारी जुटाने का मौक़ा होता. हम पूछते कि उसे ड्रग्स कहां और किस से मिले. जो कैदी जवाब दे देते हम उन्हें पाबंदियों में छूट देते. सबसे असरदार तरीका था उनपर विज़िटर्स से मिलने को लेकर पाबंदी लगाना. हम कहते कि अगर उन्होंने बता दिया कि ड्रग्स कहां से मिले तो पाबंदी कम कर दी जाएगी."
इसके साथ ही कैदियों के पुनर्वास के लिए भी कार्यक्रम चलाया गया.
वो कहते हैं, "स्टिंग का नतीजा ये रहा कि हम बड़े पैमाने पर आंकड़े इकट्ठा कर सके थे. करीब छह साल बाद जब मैंने पेन्सिल्वेनिया छोड़ा तब तक हमें कैदियों में ड्रग्स के इस्तेमाल में गिरावट दिखने लगी थी. पहले जहां 10 फीसदी कैदी पॉज़िटिव थे, अब ये आंकड़ा 2 फीसदी रह गया था."
लेकिन इस कार्यक्रम को लेकर पुलिस कर्मचरियों की क्या प्रतिक्रिया थी.
मार्टिन कहते हैं, "जो ईमानदार कर्मचारी थे उन्हें ये अभियान पसंद आया, लेकिन जो कर्मचारी इसका नेटवर्क का हिस्सा थे वो इसके ख़िलाफ़ थे. कई कर्मचारी जो पकड़े गए और उन्हें बर्ख़ास्त किया गया. कैदियों के बीच झगड़े कम हो गए, कैदियों के कर्मचारियों पर हमले भी कम हो गए. जेल पहले की अपेक्षा सुरक्षित होने लगे थे, मैं मानता हूं कि ये अभियान कैदियों को भी पसंद आया था."
ड्रग्स को जेलों से दूर रखने की इस कोशिश का नतीजा अभूतपूर्व था. लेकिन मार्टिन खुद मानते हैं कि इस समस्या को वो पूरी तरह हल नहीं कर सके और अब वक्त के साथ नई चुनौतियां सामने आ रही हैं.
मुश्किल रास्ता
हाइडी बोटोल्फ़्स, नॉर्व के सुधार विभाग की निदेशिका हैं. जेलों में ड्रग्स के इस्तेमाल का पता लगाने के लिए उनका विभाग आधुनिक तरीके काम में लाता है.
वो कहती हैं, "हम स्निफर डॉग्स का और स्कैनर्स का इस्तेमाल करते हैं और खुफ़िया विभाग के साथ मिलकर काम करते हैं. जेल में आने वाली सभी चिट्ठियों की जांच की जाती है, सभी फ़ोन कॉल्स की भी निगरानी होती है. साथ ही ड्रग्स के लिए हम टेस्टिंग भी करते हैं. हम ड्रग्स की सप्लाई पूरी तरह बंद करना चाहते हैं लेकिन ये लगभग असंभव है. ऐसा करने के लिए आपको जेल को सील करना पड़ेगा."
हाइडी कहती हैं कि जेल को सील करना जेल के उद्देश्य के विरुद्ध है, क्योंकि इसका काम आम जीवन में लौटने में कैदियों की मदद करना है.
हाइडी कहती हैं, "रिश्तेदारों से उनका मेलजोल ज़रूरी है. उन्हें इसका हक है और फिर जेल से निकलने पर उनके पास एक ऐसा नेटवर्क होना चाहिए जिसमें आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग न हों. हम चाहते हैं कि कैदी बाहर की ज़िंदगी देखें, नहीं तो जेल से निकलने के बाद उनके फिर से अपराध करने की संभावना बढ़ जाएगी. हम कोशिश करते हैं कि हम उनपर उतनी ही पाबंदियां लगाएं जितना उनके सुधार के लिए ज़रूरी है. जो कैदी नशा करते पकड़े जाते हैं हम उनसे बात करते हैं ताकि वो अपनी समस्या खुद समझ सकें."
हाइडी और मार्टिन दोनों मानते हैं कि नशे की लत का असर कैदी के जेल के बाहर की ज़िंदगी पर हो सकता है. वो फिर से अपराध न करे इसके लिए उसका नशे की लत छोड़ना बेहद ज़रूरी है. लेकिन ये प्रक्रिया भी आसान नहीं.
वो कहती हैं, "जो कैदी टेस्ट में पॉज़िटिव पाए जाते हैं उन्हें सज़ा दी जा सकती है, लेकिन हम कोशिश करते हैं कि उनके साथ नशे को लेकर चर्चा शुरू की जाए ताकि वो अपनी समस्या खुद समझ सकें. ये लंबी अवधि का कार्यक्रम होता है और कई कैदी इससे बचते हैं."
"नशा छोड़ना चाह रहे कैदियों को क़ानूनी तौर पर डॉक्टर के प्रेस्क्रिप्शन पर दवा मिलती है और वो इस ग़ैरकानूनी तरीके से दूसरों को दे देते हैं. अब हम इस कारण उनका इलाज तो नहीं रोक सकते, लेकिन हमें दूसरों तक ये दवा पहुंचने से रोकने के रास्ते तलाशने होंगे. एक समस्या ये भी है कि क़रीब 65 फ़ीसदी कैदियों को इस तरह के इलाज की ज़रूरत है, जबकि हम केवल 20 फीसदी की ही मदद कर पा रहे हैं."
2016 में नॉर्वे ने एक क्रांतिकारी योजना लॉन्च की जो कारगर साबित हो रही है. नशे की लत वाले अपराधियों को यहां जेल की बजाय पुनर्वास के लिए भेजा जा रहा है.
हाइडी कहती हैं, "ये एक निलंबित सज़ा की तरह है, जिसकी निगरानी जज के अधीन होती है. ये ऐसे लोगों के लिए है जो बार-बार अपराध करते हैं और जिन्हें नशे की लत है. हर कैदी के लिए अलग कार्यक्रम होता है. ये उसकी मर्ज़ी पर है, अगर वो चाहे तो जेल में सज़ा काट सकते हैं या फिर पुनर्वास कार्यक्रम का हिस्सा बन सकते हैं."
हाइडी कहती हैं कि इस कार्यक्रम के शुरू होने के बाद बार-बार अपराध करने वालों की संख्या अब घटकर आधी हो गई है. इससे पैसा तो बचता ही है, ये तरीका जेल से बेहतर है.
नॉर्वे ने दवा के तौर पर ड्रग्स के इस्तेमाल को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया है. लेकिन क्या नशे को वैध करना इस समस्या का हल हो सकता है?
जानते हैं पुर्तगाल की कहानी, जिसने दो दशक पहले अपने ड्रग्स क़ानून को बदला.
नशे के दलदल को ख़त्म करना
डॉक्टर शीमेन ख़ेगो, पुर्तगाल के यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिन्हो के स्कूल ऑफ़ लॉ में शोधकर्ता हैं.
90 के दशक के आख़िर में पुर्तगाल ड्रग्स संकट से जूझ रहा था. एक अनुमान के अनुसार देश की 1 फीसदी आबादी हेरोइन के इंजेक्शन लेती थी, जिससे एचआईवी के मामलों में तेज़ी से बढ़ोतरी देखी गई.
वो कहती हैं, "सामाजिक और राजनीतिक तौर पर ये मुश्किल वक्त था. 1999 में जेल की सज़ा पाने वालों में अधिकतर मामले नशे से जुड़े अपराध थे. और साल 2000 में हेरोइन के इस्तेमाल के मामले में पूरे यूरोप में पुर्तगाल दूसरे नंबर पर था. इसे लेकर चिंता बढ़ रही थी."
सरकार को लगा कि ड्रग्स लेने को अपराध मानने से नशा करने वाले डॉक्टरी मदद के लिए सामने नहीं आएंगे और समस्या हल नहीं होगी.
सरकार ने एक बड़ा फ़ैसला लिया. 2001 में सीमित मात्रा में हेरोइन और कोकीन समेत दूसरे ड्रग्स रखने या इस्तेमाल करने को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया. आशंका थी कि इससे ड्रग्स का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ेगा, पर ऐसा नहीं हुआ.
हालांकि फिर भी जेलों तक ड्रग्स का पहुंचना नहीं रुका.
डॉक्टर शीमेन ख़ेगो कहती हैं, "जेल के बाहर की दुनिया की तरह जेल के भीतर भी गांजा, हेरोइन और कोकीन आम ड्रग्स हैं. पूर्व कैदियों के बयानों पर आधारित रिपोर्ट से पता चलता है कि जेलों के भीतर ड्रग्स की सप्लाई में कभी कमी नहीं आई."
लेकिन अहम बात ये है कि जेलों में नशे का इस्तेमाल कम होने लगा.
वो कहती हैं, "ड्रग्स के इस्तेमाल में थोड़ी कमी ज़रूर आ रही है. उदाहरण के तौर पर 2001 में जेल के बाहर 87 फीसदी और जेल के भीतर 60 फीसदी लोग गांजे का इस्तेमाल करते थे. 2007 में ये आंकड़ा 47 फीसदी तक आ गया और 2014 में ये 41 फीसदी तक पहुंच गया."
डॉक्टर शीमेन कहती हैं कि इस मामले में और बेहतर परिणाम के लिए प्रशासन को सबसे पहले ये समझना होगा कि जेलों में ड्रग्स की समस्या को झुठलाया नहीं जा सकता.
वो कहती हैं, "नशामुक्ति के लिए जेल के बाहर जो कार्यक्रम हैं, वही जेल के भीतर भी हैं. कैदी या तो पारंपरिक नशामुक्ति केंद्रों में जा सकते हैं या फिर वैकल्पिक चिकित्सा ले सकते हैं. लेकिन जिस चीज़ की कमी है वो है नुक़सान से बचने की कोशिशें, जैसे एक ही सीरिंज और सुई के इस्तेमाल को रोकना. और फिर जेल के भीतर ड्रग्स के इस्तेमाल पर पाबंदी है और इससे संबंधित योजना लाने का मतलब होगा इसे स्वीकार करना."
लौटते हैं अपने सवाल पर- जेलों के भीतर में ड्रग्स का इस्तेमाल हम कैसे रोक सकेंगे.
जवाब ये है कि इसे पूरी तरह रोक पाना असंभव है. हालांकि जेल में ड्रग्स मिलने को मुश्किल ज़रूर बनाया जा सकता है.
लेकिन सबसे ज़रूरी ये है कि ड्रग्स के इस्तेमाल को अपराध की तरह देखने की बजाय एक बीमारी की तरह देखा जाए और लोगों को नशे की लत से बाहर निकालने पर ध्यान केंद्रित किया जाए.
स्टूअर्ट जे कोल के अनुसार इसके लिए जिस चीज़ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, वो है नशे के दलदल से निकलने की व्यक्ति की इच्छाशक्ति.
स्टूअर्ट जे कोल के शब्दों में "मैं अपनी पहचान भूलाना चाहता था, अपनी ज़िंदगी को स्वीकर नहीं कर पा रहा था. ड्रग्स से मुझे मदद मिली. लेकिन फिर चीजें काबू से बाहर होने लगीं और मैं नशे के दलदल में फंसने लगा. फिर मैंने अपने डर को खुद भगाने और खुद को स्वीकार करने की कोशिश की."
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