'लो अब कटोरा भी नज़र नहीं आ रहा'

रियो ओलंपिक

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    • Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, इस्लामाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए

कोई बता रहा था कि दूर बहुत दूर तक दक्षिणी अमरीका के किसी ब्राज़ील नामक देश के एक शहर रियो डी जनेरियो में ओलंपिक हो रहे हैं.

और यह भी बता रहा था कि पाकिस्तान से कुल मिलाकर सात एथलीट और खेलों के ग्यारह कर्मचारी जिनमें एक मंत्री जी भी शामिल हैं, जूडो, स्वीमिंग, शूटिंग और एथलेटिक्स में हिस्सा लेने के लिए रियो गए हैं.

अब मीडिया क्या करे. आख़िर जब तक मीडिया गेम चल रहे हैं तब तक रोज़ कुछ ना कुछ कहना-बताना पड़ेगा ही.

लेकिन अतीत की अलमारी से पुराने कारनामे झाड़-पोछ कर निकाले जा रहे हैं. बिल्कुल ऐसे जैसे पुराने लुटे-पिटे नवाब नीलामी से बच जाने वाले सोने-चांदी के बर्तन दिखाकर वाह साहब वाह की दाद समेटा करते थे.

ये है सोने के तमगों से भरी अलमारी जो हमारे यहां की टीम ने 1960 के रोम ओलंपिक, 1968 के मैक्सिको ओलंपिक और 1984 के लांस एंजिल्स ओलंपिक में जीते थे.

और जनाब ये चांदी के तमगे हमारी यहां की टीम ने 1956 में मेलबर्न में जीते हैं. और यह है तांबे का तमगा जो मोहम्मद शेर पहलवान ने रोम ओलंपिक में और फिर बॉक्सर हुसैन शाह ने 1988 के सोल ओलंपिक में और फिर हमारी हॉकी टीम ने 1992 में बार्सिलोना में जीता था.

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इसके बाद से किसी ओलंपिक में अब तक कुछ भी ना जीत पाए. इस बार तो रियो में हॉकी टीम भी ना भेज पाए. 68 साल में पहली बार ऐसा हुआ है.

हाय क्या दिन थे जब एक साल तो ऐसा भी गुजरा कि हॉकी के सारे वर्ल्ड टाइटल पाकिस्तान के पास थे.

स्कवॉश के हम बेताज़ बादशाह थे. अब तो हम ऐसे बच्चों को जिसकी उम्र बीस साल से कम हो, कभी नहीं बताया कि हम ओलंपिक हो कि वर्ल्ड कप कि एशियन गेम्स या कॉमनवेल्थ गेम, हर जगह खेलों की दुनिया के कितने बड़े तुर्रमख़ान हुआ करते थे.

क्या फ़ायदा यह सब बताने का. वो दिल में यही कहेगा ना कि बाबा जी पगला गए हैं. इस उम्र में भी सपनों को सच करने से बाज नहीं आते.

अरे कोई बता रहा था कि पाकिस्तान ने इस बार के ओलंपिक में अपने खेलों के इतिहास का जहां सबसे छोटा दस्ता भेजा है वहीं भारत ने अब तक का सबसे बड़ा अपना दस्ता मैदान में उतारा है.

क्या फ़ायदा इतना बड़ा दस्ता भेजने का? फिजूलखर्ची है ये. प्रधानमंत्रियों की विदेश यात्रा में सौ-डेढ़ सौ आदमियों का जाना तो समझ में आता है.

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पर खेलों के नाम पर हम जैसे गरीब देशों का इतनी बेदर्दी से पैसे लुटा देना निरीह खिलवाड़ है. हां तो मैं बता रहा था कि जब हमारी टीम 1960 के ओलंपिक गेम्स में हॉकी के विक्ट्री स्टैंड पर आई तो पूरा स्टेडियम खड़ा हो गया था.

प्यास लग रही है. ये कमबख़्त मटका भी तो इतनी दूर धड़ौची पर धड़ा हुआ है.

तो भाई जब हम मैक्सिको में जीते हैं तो सच बताता हूं पूरा देश मारे खुशी के आसमान में उड़ रहा था.

लगता है पानी ख़ुद ही उठ कर पीना पड़ेगा. लो अब कटोरा भी नज़र नहीं आ रहा.

कहां है भाई कटोरा? एक तो कमबख़्त बिजली को अभी ही जाना था.

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