ब्लॉग: 'मेरे बच्चों की कॉल क्यों नहीं आती'

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    • Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, इस्लामाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए

जब मैं और मेरे बच्चे एक छत तले रहते थे तब दुनिया भी इस छत के बराबर थी. इस छत ने दो इंसानों से चार आत्माओं को जन्म लेते, उन्हें बढ़ते, हंसते, रोते, खिलखिलाते और रूठते देखा.

और उनकी दुनियाएं उनके साथ उठते देखीं. इन दुनियाओं में मेरे बच्चों के हमउम्र दोस्त, मसरूफियात, फ़राग़त, मोहब्बत, नफरत सभी कुछ लहलहाता था.

और फिर एक दिन लगा जैसे सर्कस का शो ख़त्म हो गया, जैसे किसी ख़ूबसूरत फ़िल्म के मुकम्मल होने के बाद अचानक से सिनेमा के पट खुल गए.

जैसे कोई ख्वाब नींद के बिस्तर से नीचे गिर पड़ा. छत के नीचे फिर से दो इंसान रह गए.

बच्चों और उनकी हमजोलियों को उनकी मशगूलियत गले में बांहे डालकर अपने साथ ले गई. कुछ दिन तो अंदर-बाहर सन्नाटा रहा लेकिन अब नहीं है.

क्योंकि हम दोनों ने सन्नाटे को ही गोद ले लिया है. अब हम उसके नाज़ उठाते हैं, बाते करते हैं. सन्नाटा डिस्टर्ब हो जाता है अगर कभी-कभार कोई कार्ड, कोई ख़त, कोई पैगाम किसी के हाथों आ जाए.

उसमें वही एक तरह की बातें- 'अब्बा कैसे हो? मैं जल्दी आऊंगा. आई मिस यू एंड अम्मा ए लॉट...वगैरह, वगैरह.'

एक तो ये नई पीढ़ी जितना टाइम मिस यू लिखने में खपाती है, उससे आधा टाइम लगाकर अगर चाहे तो हम से मिल भी सकती है.

पर नई दुनिया के झंझट शायद हम बूढ़ों की समझ से बाहर हैं. वर्ना जी तो चाहता ही होगा.

अच्छा है कि पश्चिम वालों ने फास्ट फूड और जीन्स के साथ-साथ हैप्पी फादर्स डे, मदर्स डे भी इजाद कर लिया.

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साल में एक दिन याद रखने की सहूलियत हो गई. 364 दिन अगर हैप्पी फादर्स या मदर्स डे रहता तो किसे याद रहता.

अब मैं वो वाला रोतू, घिसा-पिटा चिरानी बूढ़ा तो हूं नहीं जिसकी कहानी मैंने साल भर पहले किसी से सुनी थी कि एक मोबाइल रिपेयरिंग शॉप पर अपना मोबाइल फोन लेकर गया और मैकेनिक से कहा कि ठीक कर दें.

मैकेनिक ने उलट-पुलट कर देखा और बूढ़े से कहा कि अंकल ये मोबाइल तो बिल्कुल ठीक है और सिग्नल भी पूरा है.

बूढ़े ने कहा, "बेटा अगर ठीक है तो पिछले दो महीने से मेरे बच्चों की कॉल क्यों नहीं आती. "

जिस चीज़ की जानकारी ना हो उस चीज़ के होने ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. सारे जज़्बे जानने से जुड़े हैं. जैसे यही कि मैं एक बाप हूं और मेरे चार बच्चे हैं और इनमें से कोई न कोई ज़रूर फोन करेगा.

ना भी करें तो क्या फर्क पड़ता है. यही क्या कम है कि वो जहां भी हैं अपनी दुनिया में मस्त हैं.

इन ख्यालों के साथ रात मुझे बहुत अच्छी नींद आई और अभी-अभी जब मैं उठा तो सिरहाने पड़े मोबाइल फोन पर नज़र पड़ी.

कोई मिस्ड कॉल नहीं थी. मगर आएगी ज़रूर... ऐसा भी क्या उतावलापन? न्यूयॉर्क और कराची के दरम्यान वैसे भी दस घंटे का फर्क है. अभी तो न्यूयॉर्क में मंडे शुरू होने में कई घंटे बाकी हैं.

ना भी कॉल आई तो ख़ुद को हैप्पी फादर्स डे कहने में जबान घिस जाएगी क्या ?

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