'भाई किस देश के एक-एक इंच के लिए कट मरेंगे'

नवाज़ शरीफ़

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    • Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, इस्लामाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए

जब नवाज़ शरीफ़ कहते हैं कि एक दिन पूरा कश्मीर पाकिस्तान को मिल जाएगा तो वो उतना ही ग़लत है जिस तरह सुषमा स्वराज का यह कहना कि पाकिस्तान का यह सपना कभी पूरा नहीं होगा.

सपना तो कोई भी, कभी भी, कहीं भी देख सकता है. सपना देखना जुर्म तो नहीं.

कुछ पूरे हो जाते हैं. कुछ आधे पूरे होते हैं. अक्सर नहीं भी होते हैं.

जब से दुनिया बनी है तब से जाने कितनी सल्तनतें बनीं और बिगड़ी. जाने कितनी उठती और मिटती रहेंगी.

मगर दुनिया के हर बादशाह का यही ख्याल होता है कि उसकी बादशाहत हमेशा रहेगी. जो दूसरों के साथ हुआ है वो मेरे या मेरी पीढियों के साथ नहीं होगा.

मगर मैं दुनिया के किसी ऐसे देश को नहीं जानता जो यह दावा कर सके कि उसकी सीमा उतनी ही है जितनी सौ साल पहले थी.

सुषमा स्वराज

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मैं किसी भी ऐसी नदी को नहीं जानता जो हमेशा से एक ही रास्ते पर बहती चली आ रही हो. सीमाएं और नदियों की लकीरें इंसानों के रहमोकरम पर नहीं बल्कि इंसान इन रेखाओं के रहमोकरम पर है.

इसलिए हंसी आती है ये सुन-सुनकर कि हम अपने दरिया के एक-एक कतरे के लिए अपने खून का आख़िरी कतरा बहा देंगे.

या हम अपने देश के एक-एक इंच की रक्षा करेंगे...वगैरह...वगैरह.

मगर भाई किस देश के एक-एक इंच के लिए कट मरेंगे. अंग्रेज से पहले का भारत कुछ और था. विभाजन के बाद का कुछ और है.

पाकिस्तान की सीमा 1947 में कुछ और बनी थी और 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद कुछ और हो गई.

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धरती भी हंसती होगी कि देखो तो सही मैं तो लाखों साल से हूं और जाने कब तक रहूंगी.

और वो आदमी जो मुश्किल से सौ साल भी ज़िंदा नहीं रह सकता, वो मेरी रक्षा करने की सौगंध खा रहा है.

ये जाने बिना कि मरने के बाद मैं ही अपने पेट में उसे दोबारा छुपाऊंगी भी.

जानता हूं कि आजकल भारत और पाकिस्तान में कड़ाके की गर्मी पड़ रही है और इसका असर नेताओं के दिमागों पर भी पड़ रहा है.

इसलिए उनका कहा-सुना माफ़ कर दीजिए. ये भी वैसे ही गुजर जाएंगे जैसे कि वे गुजर गए.

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