वो फूल जिनकी क़ीमत मकानों से भी ज़्यादा थी

ट्यूलिप्स

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लंदन की नेशनल गैलेरी में इन दिनों एक ख़ास नुमाइश लगी है. इस प्रदर्शनी का नाम है डच फ्लावर्स. महज़ एक कमरे में लगी इस नुमाइश में पिछली दो सदियों में नीदरलैंड के फूलों की पेंटिंग का सफ़र बयां करने की कोशिश की गई है.

दुनिया भर में हॉलैंड को वहां के ट्यूलिप्स के लिए जाना जाता है. यहां इन फूलों की ख़ूब खेती होती है. सदियों पुराने इस कारोबार को वहां के बहुत से कलाकारों ने अलग-अलग तरह से उकेरा है.

इसकी शुरुआत सत्रहवीं सदी में हुई थी. बेल्जियम के चित्रकार, जैन ब्रुघेल द एल्डर ने गुलदान की एक पेंटिंग बनाई. इसमें कई तरह के रंग-बिरंगे फूल दिखाए गए हैं. मगर इनमें सबसे ख़ास हैं दो ट्यूलिप.

ऐसी चित्रकारी बनाने वाले जैन इकलौते बेल्जियन पेंटर नहीं. नीदरलैंड के बहुत से कलाकारों ने सिर्फ़ ट्यूलिप ही नहीं, नर्गिस, गुलदाऊदी जैसे फूलों की भी पेंटिंग्स बनाई हैं.

लेकिन सत्रहवीं सदी में ट्यूलिप का डच कलाकारों के बीच कुछ ज़्यादा ही क्रेज़ था. उस वक़्त इस फूल का कारोबार भी उरूज़ पर था.

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हालांकि एक दिन अचानक ही बिना किसी चेतावनी के ये कारोबार मंदा हो गया. सत्रहवीं सदी का ट्यूलिप मैनिया इकोनॉमिक बबल या तेज़ आर्थिक विकास की पहली मिसाल बना.

जब जैन ब्रुघेल पेंटिंग बना रहे थे तो उस वक़्त ये कारोबार बुलंदी पर था. जैन और उनके दौर के दूसरे कलाकार जैसे एब्रॉसियस बॉसचर्ट, फूलों की पेटिंग बना रहे थे. ताकि वो उस दौर की फूलों की चित्रकारी की भारी मांग को पूरा कर सकें.

मशहूर वैज्ञानिक कैरोलस क्लूसियस ऐसे शौक़ीन लोगों के अगुवा थे.

क्लूसियस ने 1590 में लीडेन यूनिवर्सिटी में एक बॉटैनिकल गार्डेन की बुनियाद रखी थी. वहां पर अपने निजी बागीचे में क्लूसियस ने ट्यूलिप की कई नस्लों के पौधे रोप रखे थे.

उस वक़्त ही ट्यूलिप के पौधों को पामीर और टिएन शान से लाकर यूरोप में ओटोमान साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों में लगाया जा रहा था.

यूरोपीय लोगों को उस दौर में ट्यूलिप मुश्किल से मिलते थे. इस वजह से ये ख़ूब डिमांड में आ गए. कैरोलस क्लूसियस ने अपनी ज़िंदगी के कई बरस ट्यूलिप्स की पढ़ाई करने में लगाए.

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वो ख़ास तौर से ये समझना चाहते थे कि कैसे ट्यूलिप की एक गांठ से पहले तो एक ही रंग का फूल निकलता है. मगर अगले ही साल उसके फूटते ही उसमें से तरह-तरह के रंगों वाले फूल निकल आते हैं.

ये बात तो उन्नीसवीं सदी में समझ में आई कि असल में ये ट्यूलिप की गांठों का जादू नहीं, एक वायरस का असर था.

मगर सत्रहवीं सदी में ट्यूलिप के इस रोग को इसकी ख़ूबी माना जाता था. तरह-तरह के रंगों वाले ट्यूलिप्स की भारी मांग थी. इस तरह के फूल ज़्यादा उगाए जाते थे क्योंकि इनकी ज़्यादा क़ीमत मिल जाती थी.

ट्यूलिप में बढ़ती दिलचस्पी से इसका कारोबार बढ़ा. उस वक़्त के यूरोपीय देश यूनाइटेड प्रॉविंसेज का ये सबसे सुनहरा दौर था. हॉलैंड को उस वक़्त इसी नाम से जाना जाता था. इसका पूरी दुनिया में डंका बज रहा था.

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दुनिया के कारोबार पर उसकी पकड़ थी. वो उस दौर का यूरोप का सबसे अमीर मुल्क़ था. उस दौर में यहां के रईस ही नहीं, कारोबारी और यहां तक कि आम लोग भी फूलों के इस महंगे शौक़ के लिए पैसे ख़र्च करने को राज़ी थे.

इसका अंदाज़ा 1623 की एक घटना से लगा सकते हैं जब, एम्सटर्डम शहर में आज के टाउनहाउस के बराबर की क़ीमत में उस वक़्त ट्यूलिप की एक ख़ास क़िस्म की दस गांठें ख़रीदी गई थीं.

लेकिन, उस पैसे पर भी ट्यूलिप की गांठों के मालिक ने सौदा नहीं किया था. जब सत्रहवीं सदी में इस सौदे की चर्चा दूर-दराज़ तक फैली तो बाज़ार में नई-नई ख़ूबियों वाले ट्यूलिप्स की और गांठें भी आने लगीं.

इस क़िस्से को 1999 में आई माइक डैश की क़िताब ट्यूलिपोमैनिया में बख़ूबी बयां किया गया है.

सत्रहवीं सदी के ट्यूलिप के कारोबार की सबसे बड़ी ख़ूबी ये थी कि लोग उस वक़्त फूल का नहीं, इसकी गांठों का कारोबार करते थे. यानी ट्यूलिप्स को पैसे की तरह लेन-देन में इस्तेमाल किया जाता था.

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संपत्ति को ट्यूलिप की गांठों के बदले में बेचे जाने के कई क़िस्से सुने गए थे. 1633 के आते-आते इसकी इतनी मांग बढ़ गई थी कि ट्यूलिप की एक किस्म, सेम्पर ऑगस्टन की ए गांठ 5500 गिल्डर में बिकी.

गिल्डर उस वक़्त हॉलैंड की करेंसी थी. अगले चार सालों में इसकी क़ीमत दोगुनी हो गई. ये इतनी रकम थी कि उस वक़्त एक परिवार की आधी ज़िंदगी के खाने-कपड़े का ख़र्च इससे निकल आता.

मगर 1637 के आते-आते ये कारोबार बुलंदी पर पहुंच चुका था. उस वक़्त बड़े कारोबारी ही नहीं, मोची, बढ़ई और दर्ज़ी तक ट्यूलिप के धंधे में लग गए थे.

ट्यूलिप की कई गांठें तो एक दिन में दस बार तक बिक जाती थीं. इतने कारोबार में मंदी आनी ही थी. 1637 में ही एक दिन अचानक ट्यूलिप का बाज़ार ध्वस्त हो गया. वजह साफ़ थी. रईस से रईस लोग, सस्ते से सस्ते ट्यूलिप नहीं ख़रीद पा रहे थे.

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कारोबार बैठा तो तमाम तरह की दिक़्क़तें खड़ी हो गईं. कर्ज़ लेकर कारोबार करने वालों के लिए सबसे ज़्यादा मुसीबत हो गई.

दिलचस्प बात ये रही कि ट्यूलिप का कारोबार तो ठप हुआ, मगर हॉलैंड के लोगों के बीच फूलों का शौक़ कम नहीं हुआ. असली फूल गायब हुए तो फूलों की पेंटिंग का कारोबार चल निकला.

अगली दो सदियों तक ये कारोबार ख़ूब फला फूला. मगर उस दौर की ज़्यादातर पेंटिंग्स आज देखने को नहीं मिलतीं. शायद फूलों के कारोबार में घाटे से मिला सदमा लोगों को इस कदर लगा कि वो पेंटिंग्स में भी फूलों को देखना बर्दाश्त नहीं कर पाते थे.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख <link type="page"><caption> यहां पढ़ें</caption><url href="http://www.bbc.com/culture/story/20160419-tulip-mania-the-flowers-that-cost-more-than-houses" platform="highweb"/></link>, जो बीबीसी <link type="page"><caption> कल्चर</caption><url href="http://www.bbc.com/culture" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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