72 वर्षीय कट्टरपंथी नेता की सज़ा-ए-मौत बरक़रार

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बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामी कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख अपनी मौत सज़ा के ख़िलाफ़ अपील हार गए हैं.

72 वर्षीय मोतिउर रहमान निज़ामी को ये सज़ा 1971 में पाकिस्तान से आज़ादी की जंग के दौरान युद्ध अपराधों के सिलसिले में सुनाई गई थी.

उन्होंने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, लेकिन सर्वोच्च अदालत ने युद्ध अपराध ट्राइब्यूनल के फ़ैसले को बरक़रार रखा.

उन पर नरसंहार, बलात्कार और उत्पीड़न के आरोप थे हालांकि बचाव पक्ष का कहना है कि ये आरोप साबित नहीं हुए.

अगर निज़ामी राष्ट्रपति के सामने माफ़ी की अपील नहीं करते हैं, तो उन्हें चंद दिनों के भीतर फांसी पर लटकाया जा सकता है.

उनकी पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद रविवार को देश भर में हड़ताल बुलाई है और सड़कों पर प्रदर्शन करनी भी उसकी योजना है.

ऐसे में देश भर में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है.

निज़ामी के वकील ने पत्रकारों से कहा, "सारी क़ानूनी लड़ाई अब ख़त्म हो चुकी है. ये अब उन पर निर्भर है कि वो राष्ट्रपति से माफी की अपील करते हैं या नहीं."

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