मधेसियों पर आंदोलन ख़त्म करने का दबाव?

मधेसी आंदोलन

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मधेसियों और सरकार के बीच जारी गतिरोध को दूर करने के लिए नेपाल सरकार ने मधेसियों के सामने तीन बिंदुओं वाला एक प्रस्ताव पेश किया है.

सरकार ने प्रोपोशनल रिप्रजेंटेशन (समानुपातिक प्रतिनिधित्व) और निर्वाचन क्षेत्र के परिसीमन से संबंधित संविधान में संशोधन को आगे बढ़ाने की बात कही है.

दूसरे प्रस्ताव में प्रदेशों के सीमांकन को तीन महीने के अंदर एक उच्च स्तरीय राजनीतिक प्रक्रिया के ज़रिए हल करने बात कही गई है.

तीसरे में नागरिकता संबंधी संबोधन में बदलाव की बात कही गई है.

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हालाँकि बीबीसी नेपाली सेवा के महेश आचार्य का कहना है कि मधेसी मोर्चा इन प्रस्तावों से ख़ुश नहीं है क्योंकि वो चाहता है कि सीमांकन का मुद्दा तुरंत हल होना चाहिए.

उनके मुताबिक़, मधेसी आंदोलन इन प्रस्तावों के मद्देनज़र ख़त्म नहीं होने जा रहा है, लेकिन उनके ऊपर आंदोलन ख़त्म करने का एक दबाव ज़रूर बना है.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी नेपाल के तमाम राजनीतिक दलों से लचीला रुख़ अपनाने और संवैधानिक तरीक़े से मामले को हल करने की अपील की है.

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उधर, सत्तारूढ़ पार्टी सीपीएन (यूएमएल) के नेता प्रदीम गेवाली ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि मधेसी मोर्चा के नेताओं से एक अनौपचारिक बातचीत में सकारात्मक संदेश मिले हैं और मोर्चे के नेता बातचीत से हल निकालने को तैयार हैं.

मधेसियों ने अपने आंदोलन के दौरान भारत से लगी सीमा को बंद कर रखा है, जिसके चलते नेपाल की सप्लाई लाइन कट जाने से देशवासियों का ख़ासी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

एक अनुमान के मुताबिक़, नेपाल के निचले हिस्से यानी तराई में रहने वाले मधेसियों की आबादी नेपाल की कुल आबादी की 52 फ़ीसदी है.

(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन और वात्सल्य राय के साथ बातचीत पर आधारित)

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