आखिर क्या हो गया है चीन को?

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- Author, कैरी ग्रेसी
- पदनाम, बीबीसी चीन संपादक
चीन जलवायु परिवर्तन पर हो रहे पेरिस सम्मेलन के केंद्र में है. वजह है बढ़ते कार्बन उत्सर्जन को लेकर कठिन वादे और वैकल्पिक ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ाने की महत्वाकांक्षी योजनाएं.
किंघई तिब्बत पठार एशिया का दिल और फेफड़ा है. यहीं पर महाद्वीप का मौसम बनता है और विशाल नदियां यहीं से बहना शुरू होती हैं.
समंदर की सतह से इसकी ऊंचाई और ठंड इस भूक्षेत्र को पृथ्वी का सबसे कठिन मौसम वाला इलाक़ा बनाते हैं.
जब मैं यहां पहुँची तो बर्फ़ीली हवाएं 80 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रही थीं और क्वी कुन जिया रेतीली आंधी के थपेड़ों से बचते हुए अपनी भेड़ों के झुंड को सुरक्षित घर ले जाने की कोशिश कर रहे थे.

इस 28 वर्षीय तिब्बती खानाबदोश आदमी ने ज़िंदगी को इसी रूप में देखा है. मगर जलवायु परिवर्तन घास के मैदानों को रेगिस्तान में बदल रहा है.
अब क्वी कुन जिया के पास केवल भेड़ों का झुंड भर रह गया है. क्यू कहते हैं, ''जब मैं छोटा था तो घास बड़ी-बड़ी होती थी और पूरा पहाड़ फूलों से ढका रहता था.''
''गर्मियों में गर्मी होती थी और जाड़ों में ठंड अधिक होती थी. हाल के सालों में रेतीली आंधियां बढ़ गई हैं, फूल ग़ायब हो रहे हैं और पशु चराना साल दर साल कठिन हो रहा है.''
वह बताते हैं, ''इसलिए भेड़ों के हमारे झुंड सिकुड़ रहे हैं. हम उनका पेट भरने के लिए घास नहीं खरीद सकते.''
असल में चीन जलवायु परिवर्तन पैदा करने वाला और इसका शिकार दोनों ही है.

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क़रीब साढ़े नौ दशक तक कोयले के दम पर ऊंची औद्योगिक विकास दर हासिल करने वाला चीन दुनिया का सबसे अधिक प्रदूषण पैदा करने वाला देश है और अब वह इसकी क़ीमत अदा कर रहा है.
उत्तर और पश्चिम में रेगिस्तान फैलने का ख़तरा है तो दक्षिण और पूरब में बाढ़ का.
इसकी आबादी दुनिया के सबसे प्रदूषित हवा, ज़मीन और पानी का शिकार हैं.

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संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में जलवायु परिवर्तन पर पिछला वैश्विक सम्मेलन 2009 में हुआ था. तब बीजिंग कार्बन उत्सर्जन को लेकर कोई वादा करने का अनिच्छुक था. तबसे स्थितियां बदली हैं और अब उसे लग रहा है कि उसे जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी.
चीन के रुख में ये बदलाव, जलवायु परिवर्तन से उपजे ख़तरनाक हालात और प्रदूषण के कारण नहीं आया बल्कि इसमें भी उसे अवसर दिख रहा है.
चीन मानता है कि दुनिया ऊर्जा क्रांति के कगार पर है और वह इसे अपना दबदबा बढ़ाने के मौक़े के रूप में भी देख रहा है.
हरित शताब्दी की नई तकनीकों को लेकर होने वाले फ़ायदों पर उसकी नज़र है. चीनी सरकार को अब लग रहा है कि टिकाऊ विकास केवल पर्यावरण बचाने से पाया जा सकता है.
उसे लगने लगा है कि जलवायु परिवर्तन का मुक़ाबला राष्ट्रहित में है.
किंघाई पठार में बने हाउंगे सोलर फ़ार्म का दावा है कि यह दुनिया में अपनी तरह का सबसे बड़ा सोलर प्लांट है.

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यहां क़रीब 40 लाख सोलर पैनलों का रुख विस्तृत नीले आसमान की ओर है.
जब मैं वरिष्ठ इंजीनियर शेन योउगोउ के साथ इन पैनलों की क़तारों के बीच थी तो तेज़ हवा के साथ रेत और घासफूस का झोंका आया. हवा बहुत सर्द थी, लेकिन शेन बहुत उत्साहित लग रहे थे.
वो कहते हैं, ''इस समय जो कुछ हम कर रहे हैं वो आसमान को और अधिक नीला करना और पानी और साफ़ बनाने का काम है. हम हरेक के लिए बेहतर भविष्य चाहते हैं. इसलिए हम इस अभियान का हिस्सा बनने के लिए प्रतिबद्ध हैं.''
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी का अनुमान है कि इस सदी के मध्य तक सौर ऊर्जा दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा स्रोत होगा.
शेन बताते हैं कि चीन इसी तरह से वैकल्पिक ऊर्जा की तकनीक में अपना दबदबा बनाना चाहता है और इसके निर्माताओं में बढ़ती प्रतिद्वंद्विता से सोलर पैनलों की क़ीमत केवल चीन ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में घट रही है.

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वे कहते हैं, ''जैसे तकनीक विकसित हो रही है, हमारी सौर बैटरियों की क्षमता बढ़ रही है और क़ीमत कम. एक दिन ऐसा आएगा जब सौर ऊर्जा पारंपरिक ऊर्जा से सस्ती हो जाएगी.''
पर्यावरण कार्यकर्ता भी इससे प्रभावित हैं.
ग्रीनपीस के यूआन यिंग कहते हैं कि चीन के नेशनल ग्रिड से वैकल्पिक ऊर्जा को जोड़ने में अभी कई चुनौतियां हैं लेकिन तैयारी सकारात्मक है.
युआन यिंग के मुताबिक़, ''हमें उम्मीद है कि चीन की यह कोशिश अन्य देशों को भी प्रेरित करेगी.''
किंघाई पठार में क्वी कुन जिया जैसे लोग टैंटों में रहते थे लेकिन सौर ऊर्जा क्रांति में अब ऐसे लोगों की भी भागीदारी बढ रही है.
आज उनके पास दो कमरों का घर है और इसके बाहर सोलर पैनल लगे हैं. उनके घर में घत से लटका बल्ब और टीवी भी इसी सौर ऊर्जा से चल रहे हैं.

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वे कहते हैं, “हम मुक्त होकर बड़े हुए और पशु चराने के लिए विशाल घास के मैदान थे. हर दिन खुशी से भरा होता था. अब हमारे बच्चे इतनी कठिन ज़िंदगी नहीं जी सकते. इससे आगे जाने का उनके सामने कोई रास्ता नहीं है और यही बात चिंता पैदा करती है.”
अर्थव्यवस्था के केंद्र में कोयले को रखने की आदत छोड़ने और इसकी जगह वैकल्पिक ऊर्जा अपनाने में चीन की कई पीढ़ियां गुज़र जाएंगी.
इन सबके बीच घास के मैदान तेज़ी से सिकुड़ रहे हैं.
पेरिस में समझौता और भविष्य के मज़बूत इरादों के बावजूद चीन के खुद तैयार किए जलवायु परिवर्तन के घाव भरने से पहले और गहरे हो सकते हैं.
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