क्या ग़रीब देशों की सुनेंगे अमीर देश?

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- Author, मैट मैक्ग्रा
- पदनाम, पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी न्यूज़, पेरिस
दुनिया भर के देश पहले से ही जीवाश्म ईंधन जलाने जैसी जलवायु को नुक़सान पहुंचाने वाली गतिविधियां बंद करने पर सहमत हैं. लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है.
मुश्किल तब होती है जब आप 195 देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के मुद्दे पर सहमत करने की कोशिश करते हैं.
1992 से हर साल एक कारगर योजना बनाने की क़वायद चल रही है. इस साल भी फ्रांस की राजधानी पेरिस में शुरू हुआ संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन आख़िरी मौक़ा है.
वार्ताकारों ने 2011 में इस पर सहमति जताई थी कि 2015 के आख़िरी तक इस पर समझौता कर लिया जाएगा.

आलोचकों का कहना है कि अगर 20 साल तक कोई समाधान नहीं निकलता है तो इसका मतलब है कि जलवायु परिवर्तन के मसले को गंभीरता से नहीं लिया गया.
लेकिन इसके बचाव में यह दलील दी जाती है कि चूंकि फ़ैसला आम सहमति से लिया जा रहा है इसलिए इतना वक़्त लग रहा है.
इसका मतलब यह है कि जब तक हर बात पर सहमति नहीं है तब तक किसी भी बात पर सहमति नहीं है.
रियो में 1992 में संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में सारे चिंतित देश जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर विचार करने के लिए इकट्ठा हुए थे.
उन्होंने एक समझौते पर दस्तख़त किए थे जो 1994 में प्रभाव में आया और अब 195 देशों के द्वारा उसको मंज़ूर कर लिया गया है.
इसका मुख्य मक़सद "वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों के स्तर को स्थिर करना है ताकि जलवायु में इंसान के ख़तरनाक दख़ल को रोका जा सके."

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दुनिया भर के क़रीब 40000 लोग इस बार के सम्मेलन में शिरकत कर रहे हैं. इसमें मुख्य तौर पर सरकारी प्रतिनिधि शामिल हैं.
इसके अलावा व्यापार, उद्योग, कृषि और पर्यावरण पर काम करने वाले समूहों से जुड़े हुए प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं.
आज की दुनिया में आप चारों तरफ़ से फ़ोन, लैपटॉप, खाना और कपड़े जैसी जिन भी चीज़ों से घिरे हुए हैं, वह सब ऊर्जा से चलती है.
ये सारी चीज़ें दुनिया का विकास कर रही हैं, लाखों लोगों को ग़रीबी से बाहर निकाल रही हैं. लेकिन इनसे पैदा होने वाली कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैस 'ग्रीनहाउस प्रभाव' को लगातार बढ़ा रही है.
इससे धरती का तापमान बढ़ता जा रहा है.

औद्योगिक काल से पहले की तुलना में अब तापमान दो डिग्री सेल्सियस ज़्यादा के दर से बढ़ रहा है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका हमारे जलवायु पर ख़तरनाक और अप्रत्याशित असर पड़ेगा.
और हम पहले से ही इस ख़तरनाक बिंदु तक पहुंचने का आधा सफर तय कर चुके हैं.
पेरिस जलवायु सम्मेलन का मक़सद 1850 से लेकर 1899 तक के तापमान स्तर से ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना है.
इस पर लगभग सभी देशों की सहमति है. लेकिन समस्या इस बात को लेकर है कि इस मक़सद को पाया कैसे जाए.
विकासशील देशों का कहना है कि वे अपनी देश की ग़रीबी दूर करने के लिए जीवाश्म ईंधन जैसे तेल, कोयला, और गैस के इस्तेमाल का अधिकार चाहते हैं.
वो दलील देते हैं कि अमीर देश 200 सालों से निर्बाध गति से इसका इस्तेमाल करते आए हैं अब उनकी बारी है.

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इसलिए पेरिस समझौते की सबसे बड़ी चुनौती इनकी ज़रूरत और इनके इस्तेमाल के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की है.
सबसे बड़ा सवाल है कि कौन इसके लिए तैयार होगा.
कौन ग़रीब देशों की मदद के लिए सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर रूख़ करेगा.
क्या तापमान बढ़ने से भविष्य में प्रभावित होने वाले ग़रीब देश अमीर देशों को पूर्व में बड़े पैमाने पर गैस उत्सर्जित करने के लिए कठघरे में खड़ा कर सकते हैं?
ये सभी ऐसे मुद्दे हैं जो मुश्किल, विवादास्पद और विभाजनकारी है.
हालांकि एक बड़ा सवाल निष्पक्ष होने का है. अमीर देशों का कहना है कि दुनिया 1992 के जलवायु सम्मेलन के बाद काफ़ी बदल चुकी है. उससे पहले दुनिया विकासशील और विकसित देशों में बंटी हुई थी.

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लेकिन अब यह बंटवारा उतना स्पष्ट नहीं है और अमीर देश चाहते हैं कि उभरती हुई आर्थिक शक्तियां भविष्य में होने वाली जलवायु परिवर्तन की बराबर क़ीमत चुकाए.
1980 में वैज्ञानिकों ने ओज़ोन स्तर में एक बड़ा छेद ढूंढ़ा था. सभी देशों ने इस समस्या से निपटने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय समझौते पर सहमति जताई थी.
इसे मोंट्रियल प्रोटोकॉल कहते हैं.
तुरंत दुनिया ने उन हानिकारक गैसों का इस्तेमाल बंद कर दिया जिससे यह समस्या पैदा हो रही थी. आज यह छेद फिर से भर रहा है.
जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए ऐसे ही तरीक़ों के इस्तेमाल की ज़रूरत है लेकिन बड़े पैमाने पर.
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