‘इमरान के तलाक़ पर कोई कुछ नहीं बोलेगा’

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी के मुखिया इमरान ख़ान और उनकी पत्नी रेहाम ख़ान का तलाक़ पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों में छाया है.
रोज़नामा 'एक्सप्रेस' लिखता है कि दोनों के बीच कई महीनों से तलाक़ की अफ़वाहें चल रही थीं लेकिन वो इन्हें मानने को तैयार नहीं थे. आख़िरकार शुक्रवार को दोनों ने तलाक़ की पुष्टि कर दी.
इमरान और रेहाम ख़ान की शादी इसी साल 8 जनवरी को हुई थी और इस तरह लगभग दस महीने बाद ही दोनों ने अपने रास्ते अलग कर लिए.

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अख़बार लिखता है कि किसी की निजी ज़िंदगी और उससे जुड़ी परेशानी को सार्वजनिक तौर पर उछालना ठीक नहीं है, इसलिए प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने अपनी पार्टी के नेताओं को हिदायत दी है कि वो इस मुद्दे पर किसी भी तरह की बहस से गुरेज करें.
वहीं 'नवा-ए-वक़्त' ने जहां नवाज़ शरीफ़ की सोच को सकारात्मक बताया है, वहीं पूर्व राष्ट्रपति और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सह अध्यक्ष आसिफ अली ज़रदारी का भी ज़िक्र किया है जिन्होंने इसे इमरान और रेहाम का निजी मामला बताते हुए इस मुद्दे पर कुछ भी कहने से परहेज किया है.

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लेकिन 'एक्सप्रेस' कहता है कि एक राजनेता की जिंदगी और किरदार हमेशा जनता की नज़रों में रहता है, इसलिए एक लोकप्रिय नेता होने के नाते इमरान ख़ान की निजी जिंदगी भी आम लोगों के लिए चर्चा का मुद्दा तो है ही.
रोज़नामा ‘वक़्त’ लिखता है कि पंजाब और सिंध में स्थानीय निकाय के चुनावों से ठीक एक दिन पहले तलाक़ के एलान ने तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को मुश्किल में डाल दिया है.
अख़बार लिखता है कि बड़े फ़ैसले की ग़लत टाइमिंग ने कई बार पार्टी को सियासी नुक़सान पहुंचाया है.
अख़बार के मुताबिक़ ऐसा ही फ़ैसला वो था जब पेशावर में आर्मी स्कूल पर हमले के बाद इमरान ख़ान ने अपनी शादी का एलान किया था, जिसके कारण पार्टी को बहुत आलोचना झेलनी पड़ी थी.

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पाकिस्तान में हालिया भूकंप के बाद के हालात पर 'जंग' का संपादकीय है- राहत कार्य तेज़ करने की ज़रूरत.
अख़बार लिखता है कि भूकंप के बाद पंजाब और संघीय सरकार ने तेज़ी से क़दम उठाए लेकिन यह भी हक़ीक़त है कि 26 अक्तूबर को आई प्राकृतिक आपदा के बावजूद कई प्रभावित इलाक़ों में भोजन, तंबू और ज़रूरत का दूसरा सामान नहीं पहुंचा है.
अख़बार की टिप्पणी है कि चूंकि पाकिस्तान के ज़्यादातर इलाक़े भूकंप के लिहाज़ से फॉल्ट लाइन पर स्थित हैं जिसके देश में छोटे बड़े भूकंप आते रहेंगे.
अख़बार के मुताबिक़ ऐसे में ज़रूरत इस बात की है कि जापान, तुर्की और अन्य देशों की तरह नुक़सान से बचाव के लिए अग्रिम योजना बनाई जाए.
वहीं 'जसारत' में अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के इस बयान पर आपत्ति जताई गई कि पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के क़बायली इलाके अब भी चरमपंथियों की शरणस्थली बने हुए हैं.

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रुख़ भारत का करें तो 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' ने बीजेपी नेता अरुण शौरी के उस बयान को तवज्जो दी है जिसमें उन्होंने मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की है.
अख़बार की राय है कि शौरी भारतीय जनता पार्टी के उन नेताओं में से एक हैं जो मोदी सरकार बनने के बाद से ही हाशिए पर हैं, लेकिन उनकी ताज़ा टिप्पणियों को नजरअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता.
अख़बार के मुताबिक अरुण शौरी ने एक कार्यक्रम में कहा कि मोदी सरकार की नीतियां कांग्रेस जैसी ही हैं, बस इनमें गाय और जुड़ गई है.
अख़बार की टिप्पणी है कि शौरी की बातों से भारतीय जनता पार्टी को तो झटका लगा ही है, साथ ही विपक्ष को इससे एक सुनहरा मौक़ा हाथ लगा है.
वहीं 'हमारा समाज' ने बरसों बाद पाकिस्तान से लौटने वाली युवती गीता पर संपादकीय लिखा है.
अख़बार कहता है कि अगर पाकिस्तान में बिल्कीस गीता की परवरिश और देखभाल कर रही थीं तो भारत में भी भोपाल का एक फाउंडेशन पाकिस्तान के 15 वर्षीय रमजान की देखभाल कर रहा है जो अपने परिजनों के पास अपने वतन जाना चाहता है.

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अख़बार लिखता है कि गीता की वापसी से दोनों देशों के बीच जो सौहार्द्र का माहौल बना है, उससे रिश्तों को बेहतर बनाने में यक़ीनन मदद मिलेगी.
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