भारत को लिखी चिट्ठी पर पाकिस्तान में हंगामा

- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पाकिस्तान में एमक्यूएम पार्टी की तरफ़ से भारत समेत 55 देशों के राजनयिकों को लिखे गए एक पत्र की मीडिया में ख़ूब चर्चा हो रही है.
अख़बार ‘जसारत’ के संपादकीय का विषय है- 'अब ख़त पर विवाद.' अख़बार के मुताबिक एमक्यूएम की तरफ़ से एक पत्र लिखा गया है जिसमें बाक़ायदा भारत से मदद मांगी गई है.
अख़बार कहता है कि पत्र में पार्टी ने कराची में जारी अभियान के तहत अपने कार्यकर्ताओं के लापता होने और उनकी गिरफ्तारियों को मानवाधिकारों का हनन क़रार दिया गया है.
'जसारत' के अनुसार जिन पार्टियों और गुटों ने पाकिस्तान को 'दहशतगर्दी की आग में झोंका है, उसमें एमक्यूएम सबसे आगे है, बल्कि विडंबना तो ये है कि ये पार्टी आज अपने समर्थकों के लिए ही मुसीबत बन गई है.'
‘दुश्मन के दरवाज़े पर दस्तक’

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वहीं ‘नवा-ए-वक़्त’ ने लिखा है कि एमक्यूएम कहता है कि पत्र सिर्फ भारत को नहीं बल्कि दूसरे कई देशों को भी लिखा गया है, लेकिन भारत को लिखे गए पत्र को ही सार्वजनिक करना, सरकार की बदनियती है.
अख़बार कहता है कि ये पहला मौक़ा नहीं है, जब एमक्यूएम ने भारत से मदद मांगी है. पार्टी के मुखिया अल्ताफ़ हुसैन न जाने कितनी बार भारत से मदद की गुहार लगा चुके हैं.
अख़बार के मुताबिक़, उन्होंने पिछले हफ़्ते भी अपने एक भाषण में भारत को 'कायर होने का ताना दिया था कि वो मुहाजिरों के कत्ल-ए-आम पर चुप बैठा है.'
अख़बार का आरोप है कि अल्ताफ़ हुसैन के ऐसे बयान इसलिए भी चिंता का कारण हैं क्योंकि कराची में पाकिस्तान रेंजर्स के अभियान में एमक्यूएम मुख्यालय पर छापे में भारत में बने हथियार मिले हैं.
अख़बार के मुताबिक़, कई गिरफ़्तार एमक्यूएम कार्यकर्ताओं ने भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी ‘रॉ’ के अधिकारियों से अपने रिश्ते कबूले और भारत में ट्रेनिंग हासिल करने की बात भी मानी.
‘उम्मत’ लिखता है कि अपने मुल्क में हालात कैसे भी हों, लेकिन दुश्मन के दरवाज़े पर दस्तक नहीं देनी चाहिए.
बलूचिस्तान को पैकेज
उधर रोज़नामा ‘वक़्त’ ने नाराज़ बलूचियों को मनाने के लिए प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की तरफ़ से शुरू किए गए ‘पुरअमन बलूचिस्तान’ कार्यक्रम को स्वागतयोग्य कदम बताया है.
अख़बार लिखता है कि प्राकृतिक संसाधनों से मालामाल बलूचिस्तान पाकिस्तान का वो प्रांत है जिस पर न तो राजनीतिक सरकारों ने और न ही सैन्य सरकारों ने कोई ध्यान दिया जबकि पाकिस्तान का भविष्य खुशहाल तभी होगा, जब बलूचिस्तान शांतिपूर्ण और विकसित होगा.
रोज़नामा ‘एक्सप्रेस’ ने चरमपंथी मामलों से निपटने के लिए बनी सैन्य अदालतों को बरक़रार रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सकारात्मक फ़ैसला बताया है.
अख़बार लिखता है कि जब सामने असाधारण हालात हों तो उनसे निपटने के लिए असाधारण फैसले भी लेने पड़ते हैं.
अख़बार के मुताबिक़ सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला इसलिए अहम है क्योंकि कुछ लोग इन अदालतों के गठन को संवैधानिक मानते थे.
‘जुर्म तो जुर्म है’

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रुख़ भारत के उर्दू मीडिया का करें तो ललितगेट मामले में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की भूमिका पर 'हमारा समाज' संपादकीय लिखता है- जुर्म का बचाव.
अख़बार लिखता है कि जुर्म तो जुर्म होता है, चाहे वो इंसानियत की रौ में बहकर किया जाए या फिर उसके पीछे कोई और वजह हो.
संसद में गतिरोध का ज़िक्र करते हुए अख़बार कहता है कि अड़ियल रवैये से न तो सरकारें चलती हैं और न ही मुल्क, इसलिए सरकार को मान लेना चाहिए कि सुषमा स्वराज ने जुर्म किया है.

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उधर ‘जदीद ख़बर’ ने एक कथित पाकिस्तानी चरमपंथी की गिरफ़्तारी पर लिखा है- सनसनीखेज गिरफ़्तारी.
अख़बार के मुताबिक़ पाकिस्तान ने फिर ‘ना ना’ करने वाला रवैया अख्तियार कर लिया है और गिरफ्तार व्यक्ति को अपना नागरिक मानने से भी इनकार किया है.
अख़बार लिखता है कि बेशक भारत पाकिस्तान को इस बारे में सबूत देगा, लेकिन पाकिस्तान तो मुंबई हमलों के सिलसिले में सबूत देने के बावजूद कहता रहा कि उसे ठोस सबूत नहीं मिले.
अख़बार के मुताबिक़ जरूरत इस बात की है कि पाकिस्तान टालमटोल की बजाय वास्तविकताओं पर ध्यान दे.
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