चरमपंथियों को समझेगी आर्टीफ़ीशियल इंटेलिजेंस

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अमरीका में वैज्ञानिक इस्लामिक स्टेट की रणनीति को समझने के लिए आर्टीफ़ीशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का इस्तेमाल कर रहे हैं.
विश्लेषकों ने हवाई हमलों, सड़क किनारे होने वाले धमाकों और जेहादियों की सैन्य रणनीति के बीच संबंध स्थापित करने की कोशिश की.
इस शोध के नतीजे अगले सप्ताह एक कांफ़्रेंस में पेश किए जाएंगे.
विश्लेषकों ने 2014 के मध्य के बाद से इस्लामिक स्टेट की 2200 वारदातों का विश्लेषण किया.
विश्लेषकों को आईईडी के इस्तेमाल में उछाल नज़र आया.

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शोधपत्र के एरिज़ोना यूनिवर्सिटी से जुड़े सह-लेखक और 2006 में इराक़ तैनात रह चुके पूर्व अमरीकी सैन्य अधिकारी पाउलो शाकारियन ने बीबीसी को बताया, "जब उन पर हवाई हमलों में तेज़ी आई तो उन्होंने बड़े और भारी हथियारों के बजाए आईईडी का इस्तेमाल ज़्यादा किया."
उन्होंने यह भी पाया कि लड़ाकों के भारी सैन्य वाहनों के अभियानों से पहले वाहनों पर लगाए गए बमों के इस्तेमाल में भी बढ़ावा हुआ.
इसका उदाहरण इराक़ में देखने को मिला.
सुरक्षाबलों के लिए मददगार
डॉक्टर शाकारियन कहते हैं, "हमें लगता है कि वे ऐसा इराक़ी सेना को बग़दाद से बाहर निकलने से रोकने के लिए करते हैं."
सीरिया में हवाई हमलों के बाद इस्लामिक स्टेट द्वारा ज़्यादा गिरफ़्तारियां की जाने ने भी शोधकर्ताओं को चौंकाया.

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डॉक्टर शाकारियन को लगता है कि ये हवाई हमलों के बाद ख़ुफ़िया एजेंटों के सफ़ाए का अभियान हो सकता है.
रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टीट्यूट में सैन्य विज्ञान की निदेशक एलिज़ाबेथ क्विंटाना कहती हैं कि ये इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ लड़ रहे बलों के लिए ये शोध मददगार हो सकता है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ शेफ़ील्ड के कंप्यूटर विज्ञानी नोएल शार्की कहते हैं कि इस शोध से संभावित हमलों का अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है.
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