'देवबंदियों को जोड़ने में जुटा' अल क़ायदा

इमेज स्रोत, Getty
- Author, साजिद इक़बाल
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
चरमपंथी गुट 'इस्लामिक स्टेट' के दक्षिण एशिया में बढ़ते प्रभाव के बीच अल क़ायदा मुसलमानों के एक प्रभावशाली वर्ग के बीच नई ज़मीन तलाशने की कोशिश में नज़र आता है.
अल क़ायदा में देवबंद समुदाय से कुछ नए चेहरों के शामिल होने से ज़ाहिर होता है कि ये संगठन इस्लामिक स्टेट के ख़तरे को रोकने की कोशिश में है.
तमाम देवबंदी संगठन 9/11 के हमले के बाद अल क़ायदा के साथ मिलकर काम करते रहे हैं.
लेकिन हालिया सबूतों से संकेत मिलता है कि अल क़ायदा नेतृत्व मज़हबी आधार पर देवबंदियों के साथ रिश्ते मज़बूत करने को ज़ोर लगा रहा है.

इमेज स्रोत, PA
दक्षिण एशिया में इस्लामिक स्टेट के एक आला नेता ने इस रणनीति पर ग़ौर किया.
उसने अल क़ायदा के गैर सल्फी नेताओं को 'सूफी' कहते हुए ख़ारिज किया. सल्फियों के बीच सूफ़ी कहने का मतलब ताना मारना है.
इससे ज़ाहिर होता है कि अल क़ायदा देवबंदी नेताओं के लिखे आलेखों का क्यों प्रचार कर रहा है.
एक प्रभावशाली देवबंदी नेता के लेखन को हाईलाइट करके ये संगठन उनके समर्थकों को भी लुभाता है.
संख्या अहम

इमेज स्रोत, AP
इस्लामिक स्टेट और अल क़ायदा दोनों के बीच दक्षिण एशिया में अपनी संख्या बढ़ाने के लिए ज़्यादा लोगों तक पैठ बनाने का संघर्ष जारी है.
ऐसा लगता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में अल क़ायदा (आईक्यूआईएस) का नया नेतृत्व इस्लामिक स्टेट की ओर से भर्ती में लगे लोगों को पीछे छोड़ने की कोशिश में है और देवबंदी समुदाय के सदस्यों के बीच पुराने स्कॉलरों के लिए ज़बरदस्त आस्था को भुनाने की कोशिश कर रहा है.
ये नया घटनाक्रम है और इस्लामिक स्टेट के दक्षिण एशिया केंद्रित खोरासन चैप्टर के एलान से मिलता-जुलता है.
अल क़ायदा के कथित उर्दू प्रकाशन नवा-ए-अफ़गान जिहाद की शुरुआत जनवरी 2009 में हुई थी और इसमें सिर्फ़ जिहादी सामग्री ही होती थी.
इस पत्रिका ने जनवरी 2015 से अहम देवबंदी विद्वानों को स्थान देना शुरू किया है.
इसने प्रभावशाली देवबंदी स्कॉलर शाह अबरार उल हक के आलेखों को प्रकाशित किया.
हक मौलाना अशरफ़ अली थानवी के अनुयायी हैं जो दुनिया भर के देवबंदियों में सबसे ज़्यादा मान्यता रखने वाले शेख हैं.
अहम बदलाव

इमेज स्रोत, Reuters
आईक्यूआईएस ने मार्च 2015 में एक अन्य प्रभावशाली देवबंदी स्कॉलर हकीम अख़्तर को जगह दी.
अख़्तर प्रतिबंधित अल अख़्तर ट्रस्ट के संस्थापक हैं.
असल बदलाव की ओर सितंबर 2014 में ध्यान गया जब अल क़ायदा के प्रमुख अयमान अल जवाहिरी ने संगठन की भारतीय उपमहाद्वीप शाखा के गठन का एलान किया.
संगठन की इस नई शाखा में तमाम गैरसल्फियों को आला जगह दी गई.
एक्यूआईएस के प्रमुख बनाए गए मौलाना असीम उमर कराची के बिनोरिया मदरसे से स्नातक हैं और उनका एक देवबंदी चरमपंथी संगठन से जुड़ाव रहा है.
एक अन्य स्थानीय चरमपंथी उस्ताद अहमद फारुक़ को अल क़ायदा का उर्दू प्रवक्ता बनाया गया. मुल्तान के खैर उल मदरिस के स्नातक कारी इस्लाम शूरा (परिषद) के सदस्य बने.
लेकिन ये बदलाव अबू जिरार अल शमाली जैसे अल क़ायदा के कुछ पूर्व नेताओ को रास नहीं आए.
इस्लामिल स्टेट ग्रुप मैगज़ीन 'दाबिक' के छठे अंक में छपे अपने आलेख "अल क़ायदा ऑफ वजीरिस्तान: ए टेस्टिमनी फ्रॉम विद इन (वज़ीरिस्तान का अल क़ायदा: एक अंदरुनी साक्ष्य) " में उन्होंने पंजाबी 'सूफियों' को कमान सौंपने के लिए संगठन नेतृत्व की आलोचना की.
साझेदारी से आगे

अल क़ायदा दक्षिण एशिया के लिए बाहरी संगठन है.
अरब दुनिया से जुदा मज़हबी और जिहादी वातावरण में गतिविधियां चलाने के लिए ये 1990 से ही समझौते कर रहा है.
खाड़ी के अरब देशों की तुलना में दक्षिण एशिया में सल्फीवाद का बहुत ही कम प्रभाव है.
ज़्यादातर चरमपंथी गुट देवबंदी के नाम से पहचाने जाने वाले सुन्नी के उपसमुदाय से आते हैं.
उपमहाद्वीप में अस्तित्व बचाए रखने के लिए इस संगठन ने तालिबान से गठजोड़ किया.
लेकिन अब लगता है कि अल क़ायदा साझेदारी से आगे बढ़ना चाहता है और देवबंदियों को बड़ी संख्या में सीधे संगठन में लाना चाहता है.
मुख्यधारा की देवबंदी सामग्री को प्रकाशित करने का फ़ैसला चतुराई भरा लगता है कि क्योंकि ये देवबंदी मस्जिदों में जाने वालों से सीधे संवाद की कोशिश लगता है.
कराची में रहने वाले पाकिस्तानी पत्रकार ज़िया उर रहमान के मुताबिक कराची की मस्जिदों में जुमे की नमाज के बाद जिहादी नवा-ए-अफगान जिहाद की प्रतियां मुफ्त बांटते हैं.
<bold>(<link type="page"><caption> बीबीसी मॉनिटरिंग</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/monitoring" platform="highweb"/></link> दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की खबरें <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/international/2015/07/(https://twitter.com/bbcmonitoring%20)" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/BBCMonitoring" platform="highweb"/></link> पर भी पढ़ सकते हैं.) </bold>
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>













