'तालिबान को पाकिस्तानी आवाम की परवाह नहीं'

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- Author, रहीमुल्लाह यूसुफ़ज़ई
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, पाकिस्तान
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के प्रमुख मुल्ला फ़जलुल्लाह ने हमले की ज़िम्मेदारी ली है और अब इसे लेकर कोई संदेह नहीं रह गया है.
इस हमले में अबतक 133 लोग मारे गए हैं जिनमें अधिकांश बच्चे हैं. मरने वालों में महिला और पुरुष टीचर भी हैं.
इस दौरान कुल तीन फ़ौजी मारे गए, जो वहां सिक्योरिटी गार्ड थे और कुछ सिविलियन सुरक्षा गार्ड भी मारे गए हैं.
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इस तरह के ज़ालिमाना हमले में मासूम बच्चों को निशाना बनाने को जायज ठहराना नामुमकिन है. तालिबान भले ही हमले से संबंधित दावे कर लें, लेकिन वे कभी भी इसे जायज़ नहीं ठहरा पाएंगे.
इससे पहले भी ऐसे हमले हो चुके हैं. रावलपिंडी में स्थित पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय में एक मस्जिद पर भी इसी तरह का हमला हुआ था.
इस मस्जिद में फ़ौजी और उनके बच्चे आते थे. इसमें भी 30-40 लोग मारे गए थे.
इस घटना के बाद ऐसा लगा कि सारे फ़ौजी, उनके परिवार और उनके बच्चे तक तालिबान के निशाने पर हैं.
यहां तक कि फ़ौज और पुलिस से रिटायर लोगों को भी निशाना बनाया गया.
अभूतपूर्व

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इससे पहले भी पेशावर में हमले हुए थे. एक बाज़ार में हुए हमले में क़रीब 120 लोग मारे गए थे, लेकिन इस तरह का हमला पहले कभी नहीं हुआ था.
प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने पूरी क़ौम को एक करने का आह्वान किया है लेकिन इससे पहले भी ऐसी बातें कही गई लेकिन ऐसा कभी होता नहीं है.
अधिकारी इस बात लेकर कभी एकमत नहीं रहे कि कौन सा रास्ता अख़्तियार किया जाए.
हालांकि आगे बातचीत से इनकार नहीं किया जा सकता.
फ़ौजी कार्रवाई

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सुना है आज भी उत्तरी वज़ीरिस्तान में पाकिस्तानी फ़ौज ने कार्रवाई की है.
यह जंग अभी चलेगी और तालिबान और उसके साथी जवाबी कार्रवाई करेंगे.
जहां तक पाकिस्तानी तालिबान की बात है, उनका जनता के बीच बिल्कुल भी समर्थन नहीं है.
इस तरह के निर्दोष नागरिकों पर हमले करने से उनकी स्वीकार्यता और भी घटेगी.
मेरे ख़्याल से उन्हें आवाम के समर्थन की परवाह भी नहीं है, वरना ऐसे हमले नहीं करते.
कमज़ोर पड़े तालिबान

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असल में जो इलाक़े उनके हाथ में थे वो भी निकल गए हैं. अब उनके पास केवल चरमपंथी हमले की क्षमता ही बची रह गई है.
इस हमले से तालिबान को तो कोई फ़ायदा नहीं होगा लेकिन इतना तय है कि उत्तरी वज़ीरिस्तान के बाद ख़ैबर और स्वात इलाक़ों पर फ़ौजी कार्रवाई होगी, जहां तालिबान लड़ाके चले गए हैं.
तालिबान की यह कार्रवाई शुद्ध रूप से बदले की भावना से की गई है. जब भी फ़ौजी कार्रवाई होती है वे बदले में हमले करते हैं.
हालांकि वो कहते रहे हैं कि वे शरिया के लिए लड़ रहे हैं और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ इसलिए जंग कर रहे हैं क्योंकि वो अमरीका का साथ दे रहा है.
फ़ौज की बजाय आसान निशानों पर हमला करने से पता चलता है कि उनकी ताक़त कम हो गई है और वे फ़ौज से मुकाबला नहीं कर सकते.
मरने मारने की जंग

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मुल्ला फ़जलुल्लाह, उनके प्रवक्ता या इससे पहले बेतुल्लाह महसूद से जब भी मेरी मुलाक़ात हुई, उनका दावा था कि वो लोग पाकिस्तान में शरियत लागू करने के लिए जंग कर रहे हैं.
या वो ये कहते थे कि पाकिस्तान अमरीका का साथ न दे, तो हम उसके ख़िलाफ़ जंग रोक देंगे.
लेकिन ये बात बहुत पहले की है. लेकिन अब हालात काफ़ी अलग हैं. अब शरिया और अमरीका पीछे चला गया है. पाकिस्तानी सरकार और समाज के साथ उनकी जंग हो रही है.
इतना सब होने के बाद भी तालिबान लड़ाके यह मानने को तैयार नहीं हैं कि वो कुछ ग़लत कर रहे हैं.
इस जंग में उनके परिवार भी तबाह हुए हैं और उनके सामने कोई चारा भी नहीं है. उनकी वापसी के सारे रास्ते बंद हो गए हैं. उन्हें तो माफ़ी भी नहीं मिलेगी. वे अभी लड़ते रहेंगे.
इस हमले से तो यही लग रहा है कि अब उनके सामने बस एक ही रास्ता बचा है कि वो लोगों को मारें और ख़ुद भी मर जाएं.
(रहीमुल्लाह यूसुफ़ज़ई से बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी की बातचीत के आधार पर)
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